प्र1.
‘सर्वं शब्देन भासते’ इति तालिकायाः अन्तिमः स्तम्भः — ‘मातृभाषया अर्थं लिखत’ — रिक्तः अस्ति। पाठे प्रयुक्तानां शब्दानाम् अर्थान् ज्ञात्वा तं स्तम्भं पूरयत।
उत्तर
पुस्तक में यह अन्तिम स्तम्भ जान-बूझकर खाली छोड़ा गया है — विद्यार्थी को हर शब्द का अर्थ अपनी मातृभाषा में लिखना है। नीचे की तालिका में वह स्तम्भ हिन्दी (हमारी माध्यम-भाषा) में भर दिया गया है; जिनकी मातृभाषा मराठी, बाङ्ग्ला, गुजराती, तमिऴ, तेलुगु, ओड़िआ या कोई अन्य भारतीय भाषा है, वे इसी अर्थ के आधार पर अपनी भाषा का शब्द रखें।
| शब्दः | अर्थः (संस्कृतम्) | हिन्दी | English | मातृभाषया अर्थम् (भरा हुआ — हिन्दी) |
|---|---|---|---|---|
| आमुष्मिकम् (नपुं.प्र.ए.व.) | परलोकस्य | परलोक का | Of the other world | परलोक-सम्बन्धी, मरने के बाद के लोक का |
| उत्कर्षदम् (नपुं.प्र.ए.व.) | उत्कर्षं ददाति इति | उन्नति को देने वाली | Bestower of excellence | उन्नति देने वाला, ऊपर उठाने वाला |
| उद्वेलनम् (उद् + √वेल + ल्युट्, नपुं.प्र.ए.व.) | उदयकृत् | उत्थान करने वाला | Awakener | उभारने वाला, जगाने वाला |
| ऐहिकम् (नपुं.प्र.ए.व.) | इह लोके भवम्, संसारस्य | संसार का | Of this world | इस लोक का, इसी जीवन से जुड़ा |
| कर्मदम् (नपुं.प्र.ए.व.) | कर्म ददाति इति | पुरुषार्थ को देने वाली | Bestower of righteous action | सत्कर्म की प्रेरणा देने वाला |
| चारु (नपुं.प्र.ए.व.) | सुन्दरम् | मनोहर | Beautiful | सुन्दर, मन को हरने वाला |
| परिष्कारकम् (नपुं.प्र.ए.व.) | संस्कारकम् | शुद्ध करने वाली | Refiner | माँजकर निखारने वाला, शुद्ध करने वाला |
| पुञ्जः (पुं.प्र.ए.व.) | राशिः | समूह | Clump | ढेर, राशि |
| प्रभा (स्त्री.प्र.ए.व.) | दीप्तिः | प्रकाश | Light | आभा, चमक |
| भक्तिदम् (नपुं.प्र.ए.व.) | भक्तिं ददाति इति | भक्ति को देने वाली | Bestower of Bhakti | भक्ति-भाव जगाने वाला |
| माधुर्यधारा (स्त्री.प्र.ए.व.) | माधुर्यस्य धारा इति | मधुर रस की धारा | Flow of Sweetness | मिठास की बहती धारा |
| विस्तारकम् (नपुं.प्र.ए.व.) | विस्तारं करोति / वितनोति यत् | विस्तार करने वाली | Expander | फैलाने वाला, बढ़ाने वाला |
| लीलावनम् (नपुं.प्र.ए.व.) | लीलायाः वनम् | क्रीडा का उद्यान | Garden for play | खेलने का बगीचा |
| सत्पथः (पुं.प्र.ए.व.) | सन्मार्गः | सत्य मार्ग | Noble Path | अच्छाई का रास्ता, सन्मार्ग |
| सन्दोहः (पुं.प्र.ए.व.) | समूहः | समूह | Group | समुच्चय, ढेर |
नमूना उत्तर (अन्य मातृभाषाओं में) — मराठी: प्रभा = ‘तेज / प्रकाश’, पुञ्जः = ‘राशी’, चारु = ‘सुंदर’, सत्पथः = ‘सन्मार्ग’। बाङ्ग्ला: प्रभा = ‘आलो’, सन्दोहः = ‘समूह’, लीलावनम् = ‘खेलार बागान’। गुजराती: माधुर्यधारा = ‘मीठाश नी धारा’, विस्तारकम् = ‘फेलावनार’। तमिऴ: प्रभा = ‘ओळि’, सत्पथः = ‘नल्ल वऴि’। अपनी भाषा में लिखते समय ध्यान रखिए कि अर्थ वही रहे जो संस्कृत स्तम्भ में दिया है।
यह स्तम्भ क्यों रखा गया: संस्कृत का शब्द जब अपनी मातृभाषा के शब्द से जुड़ जाता है, तब वह याद रहता है — क्योंकि तब वह ‘नया शब्द’ नहीं, ‘पहचाना हुआ शब्द’ बन जाता है। ‘प्रभा’, ‘पुञ्ज’, ‘सन्तोष’, ‘सत्पथ’ जैसे अनेक शब्द तो अधिकांश भारतीय भाषाओं में ज्यों के त्यों चलते हैं — यही पाठ के गद्यांश की बात सिद्ध करता है कि भारतीय भाषाओं के अध्ययन के लिए संस्कृत ‘नितराम् अपेक्षितम्’ है।
पुस्तक में छपी दो छोटी अशुद्धियाँ: ‘उद्वेलनम्’ के सामने अंग्रेज़ी में Awakene छपा है — शुद्ध रूप Awakener होना चाहिए; तथा ‘भक्तिदम्’ के सामने Bestover छपा है — शुद्ध रूप Bestower है (जैसा ‘उत्कर्षदम्’ के सामने ठीक छपा है)।