शारदा अध्याय 1 सर्वं शब्देन भासते

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
‘सर्वं शब्देन भासते’ इति तालिकायाः अन्तिमः स्तम्भः — ‘मातृभाषया अर्थं लिखत’ — रिक्तः अस्ति। पाठे प्रयुक्तानां शब्दानाम् अर्थान् ज्ञात्वा तं स्तम्भं पूरयत।
उत्तर

पुस्तक में यह अन्तिम स्तम्भ जान-बूझकर खाली छोड़ा गया है — विद्यार्थी को हर शब्द का अर्थ अपनी मातृभाषा में लिखना है। नीचे की तालिका में वह स्तम्भ हिन्दी (हमारी माध्यम-भाषा) में भर दिया गया है; जिनकी मातृभाषा मराठी, बाङ्ग्ला, गुजराती, तमिऴ, तेलुगु, ओड़िआ या कोई अन्य भारतीय भाषा है, वे इसी अर्थ के आधार पर अपनी भाषा का शब्द रखें।

शब्दःअर्थः (संस्कृतम्)हिन्दीEnglishमातृभाषया अर्थम् (भरा हुआ — हिन्दी)
आमुष्मिकम् (नपुं.प्र.ए.व.)परलोकस्यपरलोक काOf the other worldपरलोक-सम्बन्धी, मरने के बाद के लोक का
उत्कर्षदम् (नपुं.प्र.ए.व.)उत्कर्षं ददाति इतिउन्नति को देने वालीBestower of excellenceउन्नति देने वाला, ऊपर उठाने वाला
उद्वेलनम् (उद् + √वेल + ल्युट्, नपुं.प्र.ए.व.)उदयकृत्उत्थान करने वालाAwakenerउभारने वाला, जगाने वाला
ऐहिकम् (नपुं.प्र.ए.व.)इह लोके भवम्, संसारस्यसंसार काOf this worldइस लोक का, इसी जीवन से जुड़ा
कर्मदम् (नपुं.प्र.ए.व.)कर्म ददाति इतिपुरुषार्थ को देने वालीBestower of righteous actionसत्कर्म की प्रेरणा देने वाला
चारु (नपुं.प्र.ए.व.)सुन्दरम्मनोहरBeautifulसुन्दर, मन को हरने वाला
परिष्कारकम् (नपुं.प्र.ए.व.)संस्कारकम्शुद्ध करने वालीRefinerमाँजकर निखारने वाला, शुद्ध करने वाला
पुञ्जः (पुं.प्र.ए.व.)राशिःसमूहClumpढेर, राशि
प्रभा (स्त्री.प्र.ए.व.)दीप्तिःप्रकाशLightआभा, चमक
भक्तिदम् (नपुं.प्र.ए.व.)भक्तिं ददाति इतिभक्ति को देने वालीBestower of Bhaktiभक्ति-भाव जगाने वाला
माधुर्यधारा (स्त्री.प्र.ए.व.)माधुर्यस्य धारा इतिमधुर रस की धाराFlow of Sweetnessमिठास की बहती धारा
विस्तारकम् (नपुं.प्र.ए.व.)विस्तारं करोति / वितनोति यत्विस्तार करने वालीExpanderफैलाने वाला, बढ़ाने वाला
लीलावनम् (नपुं.प्र.ए.व.)लीलायाः वनम्क्रीडा का उद्यानGarden for playखेलने का बगीचा
सत्पथः (पुं.प्र.ए.व.)सन्मार्गःसत्य मार्गNoble Pathअच्छाई का रास्ता, सन्मार्ग
सन्दोहः (पुं.प्र.ए.व.)समूहःसमूहGroupसमुच्चय, ढेर
नमूना उत्तर (अन्य मातृभाषाओं में) — मराठी: प्रभा = ‘तेज / प्रकाश’, पुञ्जः = ‘राशी’, चारु = ‘सुंदर’, सत्पथः = ‘सन्मार्ग’। बाङ्ग्ला: प्रभा = ‘आलो’, सन्दोहः = ‘समूह’, लीलावनम् = ‘खेलार बागान’। गुजराती: माधुर्यधारा = ‘मीठाश नी धारा’, विस्तारकम् = ‘फेलावनार’। तमिऴ: प्रभा = ‘ओळि’, सत्पथः = ‘नल्ल वऴि’। अपनी भाषा में लिखते समय ध्यान रखिए कि अर्थ वही रहे जो संस्कृत स्तम्भ में दिया है।
यह स्तम्भ क्यों रखा गया: संस्कृत का शब्द जब अपनी मातृभाषा के शब्द से जुड़ जाता है, तब वह याद रहता है — क्योंकि तब वह ‘नया शब्द’ नहीं, ‘पहचाना हुआ शब्द’ बन जाता है। ‘प्रभा’, ‘पुञ्ज’, ‘सन्तोष’, ‘सत्पथ’ जैसे अनेक शब्द तो अधिकांश भारतीय भाषाओं में ज्यों के त्यों चलते हैं — यही पाठ के गद्यांश की बात सिद्ध करता है कि भारतीय भाषाओं के अध्ययन के लिए संस्कृत ‘नितराम् अपेक्षितम्’ है।
पुस्तक में छपी दो छोटी अशुद्धियाँ: ‘उद्वेलनम्’ के सामने अंग्रेज़ी में Awakene छपा है — शुद्ध रूप Awakener होना चाहिए; तथा ‘भक्तिदम्’ के सामने Bestover छपा है — शुद्ध रूप Bestower है (जैसा ‘उत्कर्षदम्’ के सामने ठीक छपा है)।
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