शारदा अध्याय 1 गीतम्

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
प्रथमस्य श्लोकस्य पदच्छेदम् अन्वयं शब्दार्थं भावार्थं च लिखत — “भारतीयैकतासाधकं संस्कृतम् / भारतीयत्वसम्पादकं संस्कृतम् / ज्ञानपुञ्जप्रभादर्शकं संस्कृतम् / सर्वदानन्दसन्दोहदं संस्कृतम्॥ १॥”
उत्तर
भारतीयैकतासाधकं संस्कृतम्
भारतीयत्वसम्पादकं संस्कृतम्
ज्ञानपुञ्जप्रभादर्शकं संस्कृतम्
सर्वदानन्दसन्दोहदं संस्कृतम्॥ १॥

पदच्छेदः — भारतीय-ऐकता-साधकम् + संस्कृतम् + भारतीयत्व-सम्पादकम् + संस्कृतम् + ज्ञान-पुञ्ज-प्रभा-दर्शकम् + संस्कृतम् + सर्वदा + आनन्द-सन्दोह-दम् + संस्कृतम्।

अन्वयः — संस्कृतं भारतीयैकतासाधकम् (अस्ति)। संस्कृतं भारतीयत्वसम्पादकम् (अस्ति)। संस्कृतं ज्ञानपुञ्जप्रभादर्शकम् (अस्ति)। संस्कृतं सर्वदा आनन्दसन्दोहदम् (अस्ति)।

पदम्शब्दार्थः
भारतीयैकतासाधकम्भारतीयानाम् ऐक्यस्य साधकम् — भारतीयों की एकता को सिद्ध करने वाली
भारतीयत्वसम्पादकम्भारतीयत्वं सम्पादयति इति — भारतीयता को अर्जित कराने वाली
पुञ्जःराशिः — समूह, ढेर
प्रभादीप्तिः — प्रकाश, आभा
ज्ञानपुञ्जप्रभादर्शकम्ज्ञानपुञ्जस्य प्रभां दर्शयति इति — ज्ञान-राशि की आभा दिखाने वाली
सर्वदासदैव — हमेशा
सन्दोहःसमूहः — समूह
सन्दोहदम्सन्दोहं ददाति इति — समूह को देने वाली

हिन्दी अर्थ — संस्कृत भारतीयों की एकता को सिद्ध करने वाली है; वही भारतीयता (भारतीय होने के भाव) को अर्जित कराने वाली है; वही ज्ञान की विशाल राशि की आभा दिखाने वाली है; और वही सदा आनन्द का समूह — अर्थात् आनन्द की अटूट परम्परा — देने वाली है।

भावः (पुस्तक का अपना भावार्थ १):संस्कृतभाषा भारतीयानाम् ऐक्यं साधयति, भारतीयत्वं सम्पादयति, ज्ञानसमूहस्य प्रभां दर्शयति, सर्वदा आनन्दस्य परम्परामेव जनयति च।” — भारत में भाषाएँ अनेक हैं, पर उनका शब्दभण्डार, विचार और साहित्यिक परम्परा एक ही स्रोत से आती है। इसीलिए संस्कृत उत्तर से दक्षिण तक की भाषाओं को जोड़ने वाली कड़ी है — वह ‘एकता को बनाती’ नहीं, ‘एकता को सिद्ध (साधयति) करती’ है, क्योंकि एकता पहले से भीतर है, संस्कृत उसे प्रकट कर देती है।
सन्धि-सङ्केत: भारतीयैकता = भारतीय + ऐकता → अ + ऐ = ऐ (वृद्धि सन्धि)। सर्वदानन्द = सर्वदा + आनन्द → आ + आ = आ (दीर्घ सन्धि)। दोनों ही सन्धियाँ इसी गीत में बार-बार आती हैं, इसलिए इन्हें यहीं पकड़ लीजिए।
प्र2.
द्वितीयस्य श्लोकस्य पदच्छेदम् अन्वयं शब्दार्थं भावार्थं च लिखत — “सर्वमस्तिष्कसंस्कारकं संस्कृतम् / सर्ववाणीपरिष्कारकं संस्कृतम् / सत्पथप्रेरणादायकं संस्कृतम् / सद्गुणग्रामसन्धायकं संस्कृतम्॥ २॥”
उत्तर
सर्वमस्तिष्कसंस्कारकं संस्कृतम्
सर्ववाणीपरिष्कारकं संस्कृतम्
सत्पथप्रेरणादायकं संस्कृतम्
सद्गुणग्रामसन्धायकं संस्कृतम्॥ २॥

पदच्छेदः — सर्व-मस्तिष्क-संस्कारकम् + संस्कृतम् + सर्व-वाणी-परिष्कारकम् + संस्कृतम् + सत्पथ-प्रेरणा-दायकम् + संस्कृतम् + सद्गुण-ग्राम-सन्धायकम् + संस्कृतम्।

अन्वयः — संस्कृतं सर्वमस्तिष्कसंस्कारकम् (अस्ति)। संस्कृतं सर्ववाणीपरिष्कारकम् (अस्ति)। संस्कृतं सत्पथप्रेरणादायकम् (अस्ति)। संस्कृतं सद्गुणग्रामसन्धायकम् (अस्ति)।

पदम्शब्दार्थः
मस्तिष्कम्मानसम्, बुद्धिः — मन, मस्तिष्क
संस्कारकम्संस्कारं करोति इति — संस्कार देने वाली, शुद्ध करने वाली
वाणीवचनम्, भाषा — वाणी
परिष्कारकम्संस्कारकम् — शुद्ध करने वाली, माँजने वाली
सत्पथःसन्मार्गः — सत्य का, अच्छाई का मार्ग
प्रेरणादायकम्प्रेरणां ददाति इति — प्रेरणा देने वाली
ग्रामःसमूहः — समूह (यहाँ ‘गाँव’ नहीं)
सन्धायकम्सन्धानं करोति इति — जोड़ने वाली, एकत्र करने वाली

हिन्दी अर्थ — संस्कृत सब लोगों के मस्तिष्क (मन) को संस्कारित करने वाली है; सबकी वाणी को परिष्कृत — शुद्ध और सुन्दर — करने वाली है; सन्मार्ग की ओर प्रेरणा देने वाली है; और सद्गुणों के समूह को एक साथ जोड़ने वाली है।

भावः (पुस्तक का भावार्थ २):संस्कृतं सर्वेषां जनानां मानसं शोधयति, वचनानि परिष्करोति, सन्मार्गं दर्शयति, सद्गुणानां समूहमेव उत्पादयति।” — ध्यान दीजिए, श्लोक का क्रम भीतर से बाहर की ओर है : पहले मन सुधरता है, फिर वाणी सुधरती है, फिर आचरण (सत्पथ) बनता है, और अन्त में वह आचरण जमकर सद्गुणों का समूह बन जाता है। यही किसी भी शिक्षा की सच्ची कसौटी है — जो पढ़ाई मन और वाणी को न बदले, वह केवल सूचना है, संस्कार नहीं।
ध्यान दें: ‘ग्राम’ शब्द यहाँ गाँव नहीं, समूह है — जैसे संगीत में ‘स्वरग्राम’ का अर्थ स्वरों का समूह होता है। यही अर्थ ‘सद्गुणग्राम’ में लीजिए। ‘सद्गुण’ = सत् + गुण (व्यञ्जनसन्धि — त् + ग → द्)।
प्र3.
तृतीयस्य श्लोकस्य पदच्छेदम् अन्वयं शब्दार्थं भावार्थं च लिखत — “विश्वबन्धुत्वविस्तारकं संस्कृतम् / सर्वभूतैकताकारकं संस्कृतम् / सर्वतः शान्तिसंस्थापकं संस्कृतम् / पञ्चशीलप्रतिष्ठापकं संस्कृतम्॥ ३॥”
उत्तर
विश्वबन्धुत्वविस्तारकं संस्कृतम्
सर्वभूतैकताकारकं संस्कृतम्
सर्वतः शान्तिसंस्थापकं संस्कृतम्
पञ्चशीलप्रतिष्ठापकं संस्कृतम्॥ ३॥

पदच्छेदः — विश्व-बन्धुत्व-विस्तारकम् + संस्कृतम् + सर्व-भूत-ऐकता-कारकम् + संस्कृतम् + सर्वतः + शान्ति-संस्थापकम् + संस्कृतम् + पञ्च-शील-प्रतिष्ठापकम् + संस्कृतम्।

अन्वयः — संस्कृतं विश्वबन्धुत्वविस्तारकम् (अस्ति)। संस्कृतं सर्वभूतैकताकारकम् (अस्ति)। संस्कृतं सर्वतः शान्तिसंस्थापकम् (अस्ति)। संस्कृतं पञ्चशीलप्रतिष्ठापकम् (अस्ति)।

पदम्शब्दार्थः
विश्वबन्धुत्वम्विश्वस्य बन्धुत्वम् — सारे संसार से भाईचारा
विस्तारकम्विस्तारं करोति / वितनोति यत् — फैलाने वाली
सर्वभूतैकतासर्वेषां भूतानाम् (प्राणिनाम्) ऐक्यम् — सब प्राणियों की एकता
कारकम्करोति इति — करने वाली
सर्वतःसर्वत्र, सर्वप्रकारेण — सब ओर, हर तरफ़
संस्थापकम्संस्थापयति इति — भली-भाँति स्थापित करने वाली
पञ्चशीलम्प्रसिद्धानि पञ्च शीलानि — अस्तेय, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, सत्य, मादकद्रव्य-परिहार
प्रतिष्ठापकम्प्रतिष्ठां नयति इति — प्रतिष्ठित करने वाली

हिन्दी अर्थ — संस्कृत विश्वबन्धुत्व का विस्तार करने वाली है; समस्त प्राणियों में एकता का भाव उत्पन्न करने वाली है; सब ओर शान्ति की स्थापना करने वाली है; और पञ्चशील (पाँच सदाचारों) को प्रतिष्ठित करने वाली है।

भावः (पुस्तक का भावार्थ ३):संस्कृतं विश्वबन्धुत्वं वर्धयति, सर्वेषां प्राणिनामपि ऐक्यं बोधयति, सर्वत्रापि शान्तिं प्रतिष्ठापयति, प्रसिद्धानां पञ्चानां शीलानां रीतिं गमयति।” — पहला श्लोक भारत की एकता की बात करता था; यह तीसरा श्लोक उसी वृत्त को बढ़ाकर विश्व तक ले जाता है, और फिर मनुष्य से भी आगे सर्वभूत — हर प्राणी — तक। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ तथा ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ जैसे वाक्य इसी भाषा से निकले हैं, इसीलिए कवि संस्कृत को विश्वशान्ति का साधन कहता है।
सन्धि तथा सन्दर्भ: सर्वभूतैकता = सर्वभूत + एकता → अ + ए = ऐ (वृद्धि सन्धि)। ‘पञ्चशील’ क्या है — यह पुस्तक स्वयं पृष्ठ ७ के ‘स्वाध्यायान्मा प्रमदः’ खण्ड में बताती है; उसे इसी श्लोक के साथ पढ़िए।
प्र4.
चतुर्थस्य श्लोकस्य पदच्छेदम् अन्वयं शब्दार्थं भावार्थं च लिखत — “त्यागसन्तोषसेवाव्रतं संस्कृतम् / विश्वकल्याणनिष्ठायुतं संस्कृतम् / ज्ञानविज्ञानसम्मेलनं संस्कृतम् / भुक्तिमुक्तिद्वयोद्वेलनं संस्कृतम्॥ ४॥”
उत्तर
त्यागसन्तोषसेवाव्रतं संस्कृतम्
विश्वकल्याणनिष्ठायुतं संस्कृतम्
ज्ञानविज्ञानसम्मेलनं संस्कृतम्
भुक्तिमुक्तिद्वयोद्वेलनं संस्कृतम्॥ ४॥

पदच्छेदः — त्याग-सन्तोष-सेवा-व्रतम् + संस्कृतम् + विश्व-कल्याण-निष्ठा-युतम् + संस्कृतम् + ज्ञान-विज्ञान-सम्मेलनम् + संस्कृतम् + भुक्ति-मुक्ति-द्वय-उद्वेलनम् + संस्कृतम्।

अन्वयः — संस्कृतं त्यागसन्तोषसेवाव्रतम् (अस्ति)। संस्कृतं विश्वकल्याणनिष्ठायुतम् (अस्ति)। संस्कृतं ज्ञानविज्ञानसम्मेलनम् (अस्ति)। संस्कृतं भुक्तिमुक्तिद्वयोद्वेलनम् (अस्ति)।

पदम्शब्दार्थः
त्यागःदानम्, परित्यागः — छोड़ना, देना
सन्तोषःहर्षः, तृप्तिः — सन्तोष, तृप्ति
व्रतम्नियमः, सङ्कल्पः — व्रत, संकल्प
निष्ठायुतम्निष्ठया युतम् — निष्ठा से युक्त
सम्मेलनम्सङ्गमः, मिलनम् — मेल, संगम
भुक्तिःभोगः — सांसारिक भोग
मुक्तिःमोक्षः — मुक्ति, मोक्ष
उद्वेलनम्उदयकृत् (उद् + √वेल + ल्युट्) — उठाने वाला, उभारने वाला

हिन्दी अर्थ — संस्कृत त्याग, सन्तोष तथा सेवा का व्रत है; विश्व के कल्याण की निष्ठा से युक्त है; ज्ञान और विज्ञान — दोनों का संगम है; तथा भुक्ति (भोग) और मुक्ति (मोक्ष) — इन दोनों को ही ऊपर उठाने वाली है।

भावः (पुस्तक का भावार्थ ४):त्यागस्य, हर्षस्य, सेवाबुद्धेश्च व्रतं, प्रपञ्चस्य मङ्गलमेव कर्तव्यम् इति ज्ञानं, विज्ञानञ्च सङ्गमनीयम् इति विचारः, भोगस्य मोक्षस्य च मार्गः च संस्कृतेन लभ्यः।” — यहाँ श्लोक का सबसे बड़ा सन्देश तीसरी और चौथी पंक्ति में है। संस्कृत ज्ञान (तत्त्वज्ञान) और विज्ञान (व्यावहारिक शास्त्र — आयुर्वेद, गणित, ज्योतिष) को अलग-अलग खानों में नहीं रखती, दोनों को एक ही परम्परा में मिलाकर चलती है। इसी तरह वह भोग और मोक्ष को एक-दूसरे का शत्रु नहीं मानती — गृहस्थ जीवन भी उतना ही धर्म है जितना संन्यास।
सन्धि-सङ्केत: द्वयोद्वेलनम् = द्वय + उद्वेलनम् → अ + उ = ओ (गुण सन्धि)। तथा ‘उद्वेलनम्’ की व्युत्पत्ति पुस्तक स्वयं देती है — उद् + √वेल + ल्युट्; ‘ल्युट्’ प्रत्यय से बने शब्द नपुंसकलिङ्ग में ‘-अनम्’ पर समाप्त होते हैं (जैसे गम् + ल्युट् = गमनम्)।
प्र5.
पञ्चमस्य श्लोकस्य पदच्छेदम् अन्वयं शब्दार्थं भावार्थं च लिखत — “धर्मकामार्थमोक्षप्रदं संस्कृतम् / ऐहिकामुष्मिकोत्कर्षदं संस्कृतम् / कर्मदं ज्ञानदं भक्तिदं संस्कृतम् / सत्यनिष्ठं शिवं सुन्दरं संस्कृतम्॥ ५॥”
उत्तर
धर्मकामार्थमोक्षप्रदं संस्कृतम्
ऐहिकामुष्मिकोत्कर्षदं संस्कृतम्
कर्मदं ज्ञानदं भक्तिदं संस्कृतम्
सत्यनिष्ठं शिवं सुन्दरं संस्कृतम्॥ ५॥

पदच्छेदः — धर्म-काम-अर्थ-मोक्ष-प्रदम् + संस्कृतम् + ऐहिक-आमुष्मिक-उत्कर्ष-दम् + संस्कृतम् + कर्मदम् + ज्ञानदम् + भक्तिदम् + संस्कृतम् + सत्यनिष्ठम् + शिवम् + सुन्दरम् + संस्कृतम्।

अन्वयः — संस्कृतं धर्मकामार्थमोक्षप्रदम् (अस्ति)। संस्कृतम् ऐहिकामुष्मिकोत्कर्षदम् (अस्ति)। संस्कृतं कर्मदं ज्ञानदं भक्तिदं च (अस्ति)। संस्कृतं सत्यनिष्ठं शिवं सुन्दरं च (अस्ति)।

पदम्शब्दार्थः
धर्म-काम-अर्थ-मोक्षचत्वारः पुरुषार्थाः — चार पुरुषार्थ
प्रदम्प्रयच्छति इति — देने वाली
ऐहिकम्इह लोके भवम्, संसारस्य — इस लोक का
आमुष्मिकम्परलोकस्य — परलोक का
उत्कर्षदम्उत्कर्षं ददाति इति — उन्नति देने वाली
कर्मदम्कर्म ददाति इति — पुरुषार्थ/सत्कर्म देने वाली
भक्तिदम्भक्तिं ददाति इति — भक्ति देने वाली
सत्यनिष्ठम्सत्ये निष्ठा यस्य तत् — सत्य में निष्ठा रखने वाली

हिन्दी अर्थ — संस्कृत धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष — चारों पुरुषार्थों को देने वाली है; इस लोक और परलोक — दोनों में उत्कर्ष देने वाली है; कर्म देने वाली, ज्ञान देने वाली तथा भक्ति देने वाली है; और वह स्वयं सत्य में निष्ठ, कल्याणकारी (शिव) तथा सुन्दर है।

भावः (पुस्तक का भावार्थ ५):इहलोके परलोके च संस्कृतेन उत्कर्षः लभ्यते। धर्मस्य, कामानाम्, अर्थस्य, मोक्षस्यापि साधनानि संस्कृतेन लभ्यन्ते। भक्तिम् आचरितुं ज्ञानं प्राप्तुं कर्म कर्तुं च संस्कृतं साधनम्। अतः संस्कृतं सत्यं शिवं सुन्दरं च अस्ति।” — यही श्लोक पूरे पाठ का शीर्षक-श्लोक है : ‘सत्यं शिवं सुन्दरम्’ पाठ का नाम इसी अन्तिम पंक्ति से बना है। तीसरी पंक्ति भारतीय परम्परा के तीनों मार्गों — कर्ममार्ग, ज्ञानमार्ग तथा भक्तिमार्ग — को एक साथ रखती है और कहती है कि तीनों के ग्रन्थ संस्कृत में ही मिलते हैं।
सन्धि-सङ्केत: ऐहिकामुष्मिकोत्कर्षदम् में दो सन्धियाँ एक साथ हैं — ऐहिक + आमुष्मिक → अ + आ = आ (दीर्घ सन्धि), फिर आमुष्मिक + उत्कर्षदम् → अ + उ = ओ (गुण सन्धि)। इसी प्रकार धर्मकामार्थ = काम + अर्थ → अ + अ = आ (दीर्घ सन्धि)।
Did you know? ‘सत्यं शिवं सुन्दरम्’ भारतीय सौन्दर्यशास्त्र का प्रसिद्ध सूत्र है — जो सत्य है वही कल्याणकारी है, और जो कल्याणकारी है वही सचमुच सुन्दर है। कवि यही तीनों कसौटियाँ संस्कृत पर लगाता है और तीनों पर वह खरी उतरती है।
प्र6.
षष्ठस्य श्लोकस्य पदच्छेदम् अन्वयं शब्दार्थं भावार्थं च लिखत — “शब्दलालित्यलीलावनं संस्कृतम् / चारुमाधुर्यधारागृहं संस्कृतम् / विश्वचेतश्चमत्कारकं संस्कृतम् / पूर्वजानां यशः स्मारकं संस्कृतम्॥ ६॥”
उत्तर
शब्दलालित्यलीलावनं संस्कृतम्
चारुमाधुर्यधारागृहं संस्कृतम्
विश्वचेतश्चमत्कारकं संस्कृतम्
पूर्वजानां यशः स्मारकं संस्कृतम्॥ ६॥

पदच्छेदः — शब्द-लालित्य-लीलावनम् + संस्कृतम् + चारु-माधुर्य-धारा-गृहम् + संस्कृतम् + विश्व-चेतः + चमत्कारकम् + संस्कृतम् + पूर्वजानाम् + यशः + स्मारकम् + संस्कृतम्।

अन्वयः — संस्कृतं शब्दलालित्यलीलावनम् (अस्ति)। संस्कृतं चारुमाधुर्यधारागृहम् (अस्ति)। संस्कृतं विश्वचेतश्चमत्कारकम् (अस्ति)। संस्कृतं पूर्वजानां यशःस्मारकम् (अस्ति)।

पदम्शब्दार्थः
लालित्यम्माधुर्यम्, सौकुमार्यम् — कोमलता, लालित्य
लीलावनम्लीलायाः वनम् — क्रीडा का उद्यान
चारुसुन्दरम् — मनोहर
माधुर्यधारामाधुर्यस्य धारा — मधुर रस की धारा
गृहम्आवासः, शीतलगृहम् — घर, आश्रय
विश्वचेतःविश्वस्य चेतः (चित्तम्) — संसार का मन
चमत्कारकम्चमत्कारं करोति इति — चकित करने वाली
स्मारकम्स्मारयति इति, द्योतकम् — स्मरण कराने वाली

हिन्दी अर्थ — संस्कृत शब्दों के लालित्य का क्रीडा-उद्यान है; मनोहर माधुर्य की धारा का घर है; समस्त संसार के चित्त को चमत्कृत कर देने वाली है; और पूर्वजों के यश की स्मारक — उनकी कीर्ति को याद दिलाने वाली — है।

भावः (पुस्तक का भावार्थ ६):ललितपद्यानि संस्कृतवने वृक्षाः इव सन्ति। अन्वेषकस्य संस्कृतं माधुर्यस्य सौन्दर्यस्य शीतलगृहमिव आह्लादकम् अस्ति। संस्कृतस्य श्रवणेन अखिलस्यापि प्रपञ्चस्य जनाः चमत्कारं लभन्ते। अत एव एतादृशं संस्कृतम् अस्माकं भारतीयानां पूर्वजैः सम्पादितस्य कीर्तिराशेः द्योतकम् अस्ति।” — पहले पाँच श्लोक संस्कृत के उपयोग गिनाते थे; यह अन्तिम श्लोक उसके सौन्दर्य की बात करता है। कवि दो सुन्दर रूपक देता है — संस्कृत एक लीलावन (क्रीडा-उद्यान) है जिसमें ललित पद्य वृक्षों की तरह खड़े हैं, और वह माधुर्य की धारा का शीतल गृह है, जहाँ खोजी मन को विश्राम मिलता है।
सन्धि तथा अलङ्कार: विश्वचेतश्चमत्कारकम् = विश्वचेतः + चमत्कारकम् — विसर्ग के बाद ‘च्’ आने पर विसर्ग ‘श्’ हो जाता है (विसर्गसन्धि — श्चुत्व)। ‘लीलावनम्’ तथा ‘माधुर्यधारागृहम्’ में रूपक अलङ्कार है — संस्कृत पर वन और गृह का आरोप किया गया है। छहों श्लोकों की हर पंक्ति ‘संस्कृतम्’ पर समाप्त होती है — यह पदावृत्ति गीत को उसकी लय देती है।
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