शारदा अध्याय 1 अभ्यासाद् जायते सिद्धिः

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
ज्ञानपुञ्जप्रभादर्शकम्
उत्तर

विग्रहः — ज्ञानपुञ्जप्रभायाः दर्शकम्। (विस्तार से — ज्ञानस्य पुञ्जः = ज्ञानपुञ्जः; ज्ञानपुञ्जस्य प्रभा = ज्ञानपुञ्जप्रभा; ज्ञानपुञ्जप्रभायाः दर्शकम् = ज्ञानपुञ्जप्रभादर्शकम्।)

(हिन्दी — ज्ञान की राशि की आभा को दिखाने वाला।)

समासः — षष्ठी-तत्पुरुषः
कारण — विग्रह में पूर्वपद षष्ठी विभक्ति में आता है (प्रभायाः), और अर्थ की प्रधानता उत्तरपद (दर्शकम्) में है
यह षष्ठी-तत्पुरुष ही क्यों: यदि यह कर्मधारय होता तो दोनों पद एक ही विभक्ति में और एक ही वस्तु के होते (जैसे ‘नीलकमलम्’ = नीलं कमलम्)। यहाँ ‘प्रभा’ और ‘दर्शक’ दो अलग वस्तुएँ हैं और उनमें का/की का सम्बन्ध है — इसीलिए षष्ठी-तत्पुरुष। नमूने ‘भारतीयैकतासाधकम् = भारतीयैकतायाः साधकम्’ का साँचा भी यही है।
तीन स्तरों का समास: यह पद तीन शब्दों से बना है, इसलिए विग्रह भी तीन चरणों में खोला जा सकता है (ऊपर कोष्ठक में दिखाया गया)। परीक्षा में अन्तिम चरण — ‘ज्ञानपुञ्जप्रभायाः दर्शकम्’ — लिखना पर्याप्त है; प्रश्न ८ (घ) में पुस्तक ने स्वयं यही जोड़ी दी है।
प्र2.
सर्ववाणीपरिष्कारकम्
उत्तर

विग्रहः — सर्ववाणीनां परिष्कारकम्। (विस्तार से — सर्वाः च ताः वाण्यः = सर्ववाण्यः; सर्ववाणीनां परिष्कारकम्।)

(हिन्दी — सब वाणियों को शुद्ध करने वाला।)

समासः — षष्ठी-तत्पुरुषः (भीतर ‘सर्ववाणी’ में कर्मधारयः)
‘वाणी’ ईकारान्त स्त्रीलिङ्ग → षष्ठी बहुवचन वाणीनाम्
बहुवचन क्यों: ‘सर्व’ का अर्थ ही ‘सब’ है, इसलिए विग्रह एकवचन में नहीं हो सकता — ‘सर्ववाण्याः’ अशुद्ध है। भावार्थ २ भी बहुवचन देता है — ‘वचनानि परिष्करोति’। यही उत्तर प्रश्न २ (घ) में एकपद के रूप में आया था।
ध्यान दें: ‘सर्ववाणी’ में ‘सर्व’ विशेषण है और ‘वाणी’ विशेष्य — दोनों एक ही विभक्ति में हैं, इसलिए यह भीतरी समास कर्मधारय है। बाहरी समास ‘परिष्कारकम्’ के साथ षष्ठी-तत्पुरुष रहता है।
प्र3.
विश्वबन्धुत्वविस्तारकम्
उत्तर

विग्रहः — विश्वबन्धुत्वस्य विस्तारकम्। (विस्तार से — विश्वस्य बन्धुत्वम् = विश्वबन्धुत्वम्; विश्वबन्धुत्वस्य विस्तारकम्।)

(हिन्दी — विश्वबन्धुत्व का विस्तार करने वाला।)

समासः — षष्ठी-तत्पुरुषः (भीतरी ‘विश्वबन्धुत्वम्’ भी षष्ठी-तत्पुरुष)
‘बन्धुत्वम्’ नपुंसकलिङ्ग → षष्ठी एकवचन बन्धुत्वस्य
दोनों स्तर एक ही समास के: यहाँ बाहरी और भीतरी — दोनों समास षष्ठी-तत्पुरुष हैं। ऐसे ‘समास के भीतर समास’ को पहचानने का तरीका यह है कि पद को अन्त से खोलिए — पहले ‘विस्तारकम्’ अलग कीजिए, फिर बचे ‘विश्वबन्धुत्व’ को खोलिए।
जोड़कर देखिए: यही जोड़ी प्रश्न ८ (ङ) के मेलन में भी है — ‘विश्वबन्धुत्वस्य → विस्तारकम्’, और प्रश्न २ (ङ) में एकपद-उत्तर के रूप में। एक ही पद तीन प्रश्नों में तीन ढंग से पूछा गया है।
प्र4.
सर्वभूतैकताकारकम्
उत्तर

विग्रहः — सर्वभूतैकतायाः कारकम्। (विस्तार से — सर्वाणि च तानि भूतानि = सर्वभूतानि; सर्वभूतानाम् एकता = सर्वभूतैकता; सर्वभूतैकतायाः कारकम्।)

(हिन्दी — समस्त प्राणियों की एकता को करने वाला।)

समासः — षष्ठी-तत्पुरुषः
सन्धिः — सर्वभूत + एकता → अ + ए = ऐ (वृद्धि सन्धि)
‘एकता’ आकारान्त स्त्रीलिङ्ग → षष्ठी एकवचन एकतायाः
‘भूत’ का अर्थ: यहाँ ‘भूत’ का अर्थ प्रेत नहीं, प्राणी है — जो हो चुका है, जो अस्तित्व में है। इसीलिए भावार्थ ३ इसे ‘सर्वेषां प्राणिनाम् अपि ऐक्यं बोधयति’ कहकर खोलता है। ‘सर्वभूतेषु’, ‘भूतदया’ जैसे प्रयोग इसी अर्थ में हैं।
सन्धि की जाँच: विग्रह लिखते समय सन्धि खोलना न भूलिए — ‘सर्वभूतैकतायाः’ में ‘ऐ’ है क्योंकि ‘सर्वभूत’ का अन्तिम ‘अ’ और ‘एकता’ का आदि ‘ए’ मिलकर वृद्धि ‘ऐ’ बने हैं। यही सन्धि नमूने ‘भारतीयैकता’ में भी है।
प्र5.
शान्तिसंस्थापकम्
उत्तर

विग्रहः — शान्तेः संस्थापकम्। (हिन्दी — शान्ति की स्थापना करने वाला।)

समासः — षष्ठी-तत्पुरुषः
‘शान्तिः’ इकारान्त स्त्रीलिङ्ग → षष्ठी एकवचन शान्तेः
(मति → मतेः, बुद्धि → बुद्धेः के समान)
रूप की सावधानी: ‘शान्तिस्य’ लिखना अशुद्ध है। इकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्दों की षष्ठी एकवचन में ‘-एः’ आता है, ‘-स्य’ नहीं (‘-स्य’ अकारान्त पुंलिङ्ग/नपुंसकलिङ्ग का रूप है)। यही उत्तर प्रश्न ३ (क) में पूर्ण वाक्य के रूप में आ चुका है।
पाठ की पंक्ति: ‘सर्वतः शान्तिसंस्थापकं संस्कृतम्’ (श्लोक ३)। ‘सर्वतः’ अव्यय है, इसलिए वह समास के भीतर नहीं आता — विग्रह में भी उसे बाहर ही रखा जाता है।
प्र6.
ज्ञानविज्ञानसम्मेलनम्
उत्तर

विग्रहः — ज्ञानविज्ञानयोः सम्मेलनम्। (अथवा — ज्ञानस्य विज्ञानस्य च सम्मेलनम्।)

(हिन्दी — ज्ञान और विज्ञान — दोनों का मेल।)

समासः — षष्ठी-तत्पुरुषः, जिसका पूर्वपद ‘ज्ञानविज्ञान’ स्वयं इतरेतर-द्वन्द्वः है
द्वन्द्व का विग्रह — ज्ञानं च विज्ञानं च = ज्ञानविज्ञाने
दो वस्तुएँ हैं, अतः षष्ठी द्विवचन — ज्ञानविज्ञानयोः
दो समास एक पद में: पहले ‘ज्ञान’ और ‘विज्ञान’ बराबरी से जुड़े — यह द्वन्द्व है (दोनों पद प्रधान)। फिर वह जुड़ा जोड़ा ‘सम्मेलन’ के साथ ‘का’ के सम्बन्ध से जुड़ा — यह षष्ठी-तत्पुरुष है (उत्तरपद प्रधान)। किसी लम्बे समास को खोलते समय हमेशा यही देखिए कि कौन-सा पद प्रधान है — वही समास का नाम तय करता है।
जोड़कर देखिए: प्रश्न ३ (ग) — ‘कयोः सम्मेलनं संस्कृतम् ?’ का उत्तर ‘ज्ञानविज्ञानयोः’ इसी विग्रह से निकलता है। ‘कयोः’ द्विवचन है और ‘ज्ञानविज्ञानयोः’ भी — दोनों का मेल बैठ जाता है।
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