विग्रहः — ज्ञानपुञ्जप्रभायाः दर्शकम्। (विस्तार से — ज्ञानस्य पुञ्जः = ज्ञानपुञ्जः; ज्ञानपुञ्जस्य प्रभा = ज्ञानपुञ्जप्रभा; ज्ञानपुञ्जप्रभायाः दर्शकम् = ज्ञानपुञ्जप्रभादर्शकम्।)
(हिन्दी — ज्ञान की राशि की आभा को दिखाने वाला।)
समासः — षष्ठी-तत्पुरुषः
कारण — विग्रह में पूर्वपद षष्ठी विभक्ति में आता है (प्रभायाः), और अर्थ की प्रधानता उत्तरपद (दर्शकम्) में है
यह षष्ठी-तत्पुरुष ही क्यों: यदि यह कर्मधारय होता तो दोनों पद एक ही विभक्ति में और एक ही वस्तु के होते (जैसे ‘नीलकमलम्’ = नीलं कमलम्)। यहाँ ‘प्रभा’ और ‘दर्शक’ दो अलग वस्तुएँ हैं और उनमें का/की का सम्बन्ध है — इसीलिए षष्ठी-तत्पुरुष। नमूने ‘भारतीयैकतासाधकम् = भारतीयैकतायाः साधकम्’ का साँचा भी यही है।
तीन स्तरों का समास: यह पद तीन शब्दों से बना है, इसलिए विग्रह भी तीन चरणों में खोला जा सकता है (ऊपर कोष्ठक में दिखाया गया)। परीक्षा में अन्तिम चरण — ‘ज्ञानपुञ्जप्रभायाः दर्शकम्’ — लिखना पर्याप्त है; प्रश्न ८ (घ) में पुस्तक ने स्वयं यही जोड़ी दी है।