शारदा अध्याय 1 अभ्यासाद् जायते सिद्धिः

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
विद्वांसः …………………… भवन्ति।
उत्तर

उत्तरम् — विद्वांसः तेजोराशयः भवन्ति। (हिन्दी — विद्वान् तेज के पुञ्ज होते हैं।)

कर्ता — विद्वांसः (पुंलिङ्ग · प्रथमा · बहुवचन)
क्रिया — भवन्ति (लट्, प्रथमपुरुष, बहुवचन)
अतः विधेय-विशेषण भी बहुवचन में चाहिए → तेजोराशयः
सन्धिः — तेजस् + राशयः → विसर्ग → ओ (विसर्गसन्धि)
यही पद क्यों: मञ्जूषा के छह पदों में केवल ‘तेजोराशयः’ ही बहुवचन में है — ‘उल्लासः, किरणः, अनुपमा, मानम्, जगत्’ सब एकवचन हैं। कर्ता ‘विद्वांसः’ बहुवचन है और क्रिया ‘भवन्ति’ भी, इसलिए वचन का मेल केवल यही पद बैठाता है। यह पर्यायपद किसका है ? — पाठ के ‘ज्ञानपुञ्जप्रभा’ का; ‘पुञ्ज’ = राशि और ‘प्रभा’ = तेज, दोनों मिलकर ‘तेजोराशिः’ बनते हैं।
प्र2.
सूर्यस्य …………………… सर्वेषां प्राणिनां कृते हितकरः भवति।
उत्तर

उत्तरम् — सूर्यस्य किरणः सर्वेषां प्राणिनां कृते हितकरः भवति। (हिन्दी — सूर्य की किरण सब प्राणियों के लिए हितकारी होती है।)

विधेय-विशेषण — हितकरः (पुंलिङ्ग · प्रथमा · एकवचन)
अतः कर्ता भी पुंलिङ्ग एकवचन → किरणः
‘सर्वेषां प्राणिनां कृते’ — ‘कृते’ के योग में षष्ठी (‘के लिए’)
यही पद क्यों: ‘सूर्यस्य’ के साथ अर्थ की दृष्टि से ‘किरणः’ ही जुड़ता है। व्याकरण भी यही कहता है — विशेषण ‘हितकरः’ पुंलिङ्ग है, इसलिए कर्ता ‘अनुपमा’ (स्त्री.) या ‘मानम्’ (नपुं.) नहीं हो सकता। पर्याय: ‘किरणः’ पाठ के ‘प्रभा’ (= दीप्तिः) का पर्यायवाची है।
प्र3.
ईश्वरं स्मृत्वा …………………… उपजायते।
उत्तर

उत्तरम् — ईश्वरं स्मृत्वा उल्लासः उपजायते। (हिन्दी — ईश्वर का स्मरण करके आनन्द उत्पन्न होता है।)

‘स्मृत्वा’ — क्त्वा-प्रत्ययान्त पूर्वकालिक क्रिया (‘स्मरण करके’)
कर्ता — उल्लासः (पुंलिङ्ग · प्रथमा · एकवचन)
क्रिया — उपजायते (आत्मनेपद, लट्, प्रथमपुरुष एकवचन)
यही पद क्यों: ‘उपजायते’ का अर्थ है ‘उत्पन्न होता है’ — जो उत्पन्न होता है वह कोई भाव होना चाहिए, वस्तु नहीं। मञ्जूषा में भाववाचक पद ‘उल्लासः’ और ‘मानम्’ हैं; ईश्वर-स्मरण से ‘मान’ (सम्मान) नहीं, आनन्द उपजता है — इसलिए ‘उल्लासः’। पर्याय: यह पाठ के ‘आनन्द’ (सर्वदानन्दसन्दोहदं) का पर्यायवाची है।
प्र4.
विद्यायाः …………………… अजरं भवति।
उत्तर

उत्तरम् — विद्यायाः मानम् अजरं भवति। (हिन्दी — विद्या का सम्मान कभी बूढ़ा नहीं होता / सदा बना रहता है।)

विधेय-विशेषण — अजरम् (नपुंसकलिङ्ग · प्रथमा · एकवचन)
अतः कर्ता भी नपुंसकलिङ्ग एकवचन चाहिए → मानम्
‘विद्यायाः’ — सम्बन्धे षष्ठी (आकारान्त स्त्री. : विद्या → विद्यायाः)
यही पद क्यों: मञ्जूषा में नपुंसकलिङ्ग के दो पद हैं — ‘मानम्’ और ‘जगत्’। पर ‘विद्यायाः जगत्’ का कोई अर्थ नहीं बनता, जबकि ‘विद्यायाः मानम्’ = विद्या का सम्मान — सार्थक है। इसलिए लिङ्ग और अर्थ दोनों ‘मानम्’ को चुनते हैं। पर्याय: यह पाठ के ‘यशः’ (पूर्वजानां यशः स्मारकम्) का पर्यायवाची है।
‘अजरम्’ का अर्थ: अ + जर = जिसे जरा (बुढ़ापा) न आए। नीति-वचन है — ‘विद्या ही ऐसा धन है जो न चोरी होता है, न घटता है, न पुराना पड़ता है।’
प्र5.
प्रकृतेः शोभा …………………… विद्यते।
उत्तर

उत्तरम् — प्रकृतेः शोभा अनुपमा विद्यते। (हिन्दी — प्रकृति की शोभा अनुपम — जिसकी कोई उपमा न हो, ऐसी — है।)

कर्ता — शोभा (स्त्रीलिङ्ग · प्रथमा · एकवचन)
अतः विशेषण भी स्त्रीलिङ्ग एकवचन → अनुपमा
‘प्रकृतेः’ — इकारान्त स्त्रीलिङ्ग, षष्ठी एकवचन
यही पद क्यों: मञ्जूषा में केवल ‘अनुपमा’ ही स्त्रीलिङ्ग है, और यहाँ विशेष्य ‘शोभा’ स्त्रीलिङ्ग है — विशेषण-विशेष्य-भाव का नियम कहता है कि दोनों का लिङ्ग-वचन-विभक्ति समान हो। इसलिए उत्तर निश्चित है। पर्याय: ‘अनुपमा’ पाठ के ‘चारु’ / ‘सुन्दर’ का पर्यायवाची है।
शब्द-निर्माण: न + उपमा = अनुपमा (नञ्-तत्पुरुष) — ‘जिसकी उपमा न दी जा सके’। इसी ढंग से अ + जरम् = अजरम् (ऊपर घ में), अ + हिंसा = अहिंसा।
प्र6.
यत्र …………………… एकनीडं भवति।
उत्तर

उत्तरम् — यत्र जगत् एकनीडं भवति। (हिन्दी — जहाँ सारा संसार एक घोंसला बन जाता है।)

विधेय — एकनीडम् (नपुंसकलिङ्ग · प्रथमा · एकवचन)
अतः कर्ता भी नपुंसकलिङ्ग एकवचन → जगत् (तकारान्त नपुंसकलिङ्ग)
‘यत्र’ — अव्यय (जहाँ)
यही पद क्यों: ‘मानम्’ इस वाक्य में शेष नहीं बचता (वह घ में लग चुका), और लिङ्ग की दृष्टि से भी ‘एकनीडम्’ नपुंसकलिङ्ग है, इसलिए कर्ता ‘जगत्’ ही बनेगा। पर्याय: ‘जगत्’ पाठ के ‘विश्व’ (विश्वबन्धुत्व, विश्वकल्याण, विश्वचेतः) का पर्यायवाची है।
बिम्ब पहचानिए: ‘नीडम्’ = घोंसला। ‘सारा संसार एक घोंसला बन जाए’ — यही रवीन्द्रनाथ ठाकुर के प्रसिद्ध वाक्य ‘यत्र विश्वं भवत्येकनीडम्’ (विश्वभारती का ध्येयवाक्य) का भाव है, और यही तीसरे श्लोक के ‘विश्वबन्धुत्वविस्तारकम्’ का भी।
वाक्यम्चयनितं पदम्चयन का कारणपाठ का कौन-सा शब्द
(क) विद्वांसः … भवन्तितेजोराशयःएकमात्र बहुवचन पदज्ञानपुञ्जप्रभा
(ख) सूर्यस्य … हितकरःकिरणःपुंलिङ्ग विशेषण ‘हितकरः’प्रभा
(ग) ईश्वरं स्मृत्वा … उपजायतेउल्लासः‘उपजायते’ के साथ भाववाचक पदआनन्दः
(घ) विद्यायाः … अजरं भवतिमानम्नपुंसक विशेषण ‘अजरम्’ + अर्थसङ्गतियशः
(ङ) प्रकृतेः शोभा … विद्यतेअनुपमाएकमात्र स्त्रीलिङ्ग पदचारु / सुन्दरम्
(च) यत्र … एकनीडं भवतिजगत्नपुंसक ‘एकनीडम्’ + शेष पदविश्वम्
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