प्र1.
अधोलिखितानां मेलनं कुरुत — (क) भारतीयैकतायाः (ख) सत्पथे (ग) त्यागसन्तोषसेवारूपम् (घ) ज्ञानपुञ्जप्रभायाः (ङ) विश्वबन्धुत्वस्य ॥ १. विस्तारकम् २. साधकम् ३. दर्शकम् ४. प्रेरणादायकम् ५. व्रतम्
उत्तर
शुद्धं मेलनम् — (क)–२, (ख)–४, (ग)–५, (घ)–३, (ङ)–१।
| क्रमः | ‘क’ स्तम्भः | ‘ख’ स्तम्भः | पूर्णं पदम् / पाठ की पंक्ति | मेल का कारण |
|---|---|---|---|---|
| (क) | भारतीयैकतायाः | २. साधकम् | भारतीयैकतासाधकं संस्कृतम् (श्लोक १) | एकता ‘सिद्ध’ की जाती है — साधने का कर्म |
| (ख) | सत्पथे | ४. प्रेरणादायकम् | सत्पथप्रेरणादायकं संस्कृतम् (श्लोक २) | मार्ग ‘पर’ प्रेरणा दी जाती है — अधिकरणे सप्तमी |
| (ग) | त्यागसन्तोषसेवारूपम् | ५. व्रतम् | त्यागसन्तोषसेवाव्रतं संस्कृतम् (श्लोक ४) | ‘-रूपम्’ विशेषण है, उसे संज्ञा ‘व्रतम्’ चाहिए |
| (घ) | ज्ञानपुञ्जप्रभायाः | ३. दर्शकम् | ज्ञानपुञ्जप्रभादर्शकं संस्कृतम् (श्लोक १) | प्रभा ‘दिखाई’ जाती है — दर्शन का कर्म |
| (ङ) | विश्वबन्धुत्वस्य | १. विस्तारकम् | विश्वबन्धुत्वविस्तारकं संस्कृतम् (श्लोक ३) | बन्धुत्व ‘फैलाया’ जाता है — विस्तार का कर्म |
मेलन कैसे जाँचें: दो कसौटियाँ एक साथ लगाइए। पहली — व्याकरण: ‘क’ स्तम्भ के चार पद षष्ठी में हैं (एकतायाः, प्रभायाः, बन्धुत्वस्य) और एक सप्तमी में (सत्पथे); जो पद सप्तमी में है उसे वही जोड़ीदार चाहिए जो ‘पर/में’ का भाव सम्भाले — ‘सत्पथे प्रेरणादायकम्’। दूसरी — पाठ: जोड़ी बनाकर पद जोड़ दीजिए और देखिए कि वह गीत की किसी पंक्ति में सचमुच है या नहीं। दोनों कसौटियों पर उतरने वाली जोड़ी ही शुद्ध है।
ध्यान दें (ग) की बारीकी: पुस्तक ने यहाँ पाठ का ‘त्यागसन्तोषसेवा-’ नहीं, ‘त्यागसन्तोषसेवारूपम्’ दिया है — अर्थात् ‘त्याग-सन्तोष-सेवा के रूप वाला’। ‘-रूपम्’ लगते ही पद विशेषण बन जाता है, और विशेषण को कोई संज्ञा चाहिए; ‘विस्तारकम्, साधकम्, दर्शकम्, प्रेरणादायकम्’ — ये चारों स्वयं कृदन्त-विशेषण हैं, केवल ‘व्रतम्’ संज्ञा है। इसलिए (ग) का जोड़ीदार ५ ही बनेगा।