श्लोकः १
एतद्देशप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मनः।
स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्वमानवाः॥
पदच्छेदः — एतद्-देश-प्रसूतस्य + सकाशात् + अग्रजन्मनः + स्वम् + स्वम् + चरित्रम् + शिक्षेरन् + पृथिव्याम् + सर्वमानवाः।
अन्वयः — पृथिव्यां सर्वमानवाः एतद्देशप्रसूतस्य अग्रजन्मनः सकाशात् स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन्।
अर्थः — इस देश (भारत) में उत्पन्न श्रेष्ठ पुरुष के समीप से पृथ्वी के सभी मनुष्य अपना-अपना चरित्र सीखें।
भावः: यह मनुस्मृति (२.२०) का प्रसिद्ध श्लोक है और उसे यहाँ रखने का प्रयोजन स्पष्ट है — भारत को कवि ‘चरित्र की पाठशाला’ मानता है। ध्यान दीजिए, श्लोक ‘सब मेरा अनुकरण करें’ नहीं कहता; वह कहता है ‘स्वं स्वं चरित्रम्’ — अपना-अपना चरित्र सीखें। अर्थात् सीख यहाँ से लीजिए, पर उसे अपने ढंग से जिएँ। यही उदार दृष्टि तीसरे श्लोक के ‘विश्वबन्धुत्व’ का आधार है।
व्याकरण: ‘शिक्षेरन्’ — √शिक्ष् (आत्मनेपद), विधिलिङ् लकार, प्रथमपुरुष, बहुवचन (‘सीखना चाहिए / सीखें’)। ‘सकाशात्’ अव्ययवत् प्रयुक्त पञ्चमी है (‘के पास से’) और उसके योग में ‘अग्रजन्मनः’ षष्ठी में है। ‘अग्रजन्मन्’ = अग्रे जन्म यस्य सः — जो पहले जन्मा, अर्थात् श्रेष्ठ/विद्वान्।
श्लोकः २
संस्कृतं संस्कृतेर्मूलं ज्ञानविज्ञानवारिधिः।
वेदतत्त्वार्थसंजुष्टं लोकाऽऽलोककरं शिवम्॥
पदच्छेदः — संस्कृतम् + संस्कृतेः + मूलम् + ज्ञान-विज्ञान-वारिधिः + वेद-तत्त्व-अर्थ-संजुष्टम् + लोक-आलोक-करम् + शिवम्।
अन्वयः — संस्कृतं संस्कृतेः मूलम् (अस्ति), ज्ञानविज्ञानवारिधिः (अस्ति), वेदतत्त्वार्थसंजुष्टं लोकालोककरं शिवं च (अस्ति)।
अर्थः — संस्कृत संस्कृति की जड़ है, ज्ञान और विज्ञान का समुद्र है, वेद के तत्त्व तथा अर्थ से भरी हुई है, संसार को आलोकित करने वाली और कल्याणकारी है।
भावः: यह श्लोक गीत के पाँचवें श्लोक का ही सार दोहराता है। ‘संस्कृतं संस्कृतेर्मूलम्’ में एक सुन्दर शब्द-क्रीडा है — ‘संस्कृत’ और ‘संस्कृति’ दोनों एक ही धातु (सम् + √कृ) से बने हैं, इसलिए भाषा और संस्कृति का सम्बन्ध केवल भाव का नहीं, शब्द का भी है। ‘वारिधिः’ रूपक कहता है कि इस भाषा में ज्ञान बूँद-बूँद नहीं, समुद्र-भर है — जितना उतरिए उतना गहरा।
सन्धि तथा छपाई: ‘संस्कृतेर्मूलम्’ = संस्कृतेः + मूलम् (विसर्गसन्धि — विसर्ग का ‘र्’)। पुस्तक में ‘लोकाऽऽलोककरम्’ अवग्रह-चिह्न के साथ छपा है, जो ‘लोक + आलोक’ की सन्धि को दिखाने के लिए है; सामान्य लेखन में इसे लोकालोककरम् लिखा जाता है। कुछ विद्वान् इसे ‘लोक-अलोक-करम्’ (इस लोक तथा परलोक — दोनों को प्रकाशित करने वाला) भी पढ़ते हैं, जो गीत के ‘ऐहिकामुष्मिकोत्कर्षदम्’ से मेल खाता है।
श्लोकः ३
सत्याहिंसागुणैः श्रेष्ठा विश्वबन्धुत्वशिक्षिका।
विश्वशान्तिसुखाधात्री भारतीया हि संस्कृतिः॥
पदच्छेदः — सत्य-अहिंसा-गुणैः + श्रेष्ठा + विश्व-बन्धुत्व-शिक्षिका + विश्व-शान्ति-सुख-आधात्री + भारतीया + हि + संस्कृतिः।
अन्वयः — भारतीया संस्कृतिः हि सत्याहिंसागुणैः श्रेष्ठा, विश्वबन्धुत्वशिक्षिका, विश्वशान्तिसुखाधात्री च (अस्ति)।
अर्थः — भारतीय संस्कृति सत्य तथा अहिंसा के गुणों के कारण श्रेष्ठ है; वही विश्वबन्धुत्व की शिक्षिका है; और वही विश्व की शान्ति तथा सुख को धारण करने वाली — पोषण करने वाली — है।
भावः: तीनों श्लोक एक सीढ़ी बनाते हैं — पहला कहता है चरित्र यहाँ से सीखो, दूसरा बताता है उस चरित्र का स्रोत संस्कृत है, और तीसरा उस स्रोत से बनी संस्कृति का फल गिनाता है : सत्य, अहिंसा, विश्वबन्धुत्व और विश्वशान्ति। यही चारों बातें गीत के तीसरे श्लोक में भी थीं — इसलिए यह श्लोक पाठ का समापन-वाक्य जैसा है।
व्याकरण: ‘गुणैः’ में तृतीया है — हेतु के अर्थ में (‘इन गुणों के कारण श्रेष्ठ’)। ‘शिक्षिका’ तथा ‘आधात्री’ दोनों स्त्रीलिङ्ग हैं, क्योंकि विशेष्य ‘संस्कृतिः’ स्त्रीलिङ्ग है। ‘आधात्री’ = आ + √धा + तृच् + ङीप् — धारण/पोषण करने वाली। ‘हि’ अव्यय यहाँ निश्चय के अर्थ में है — ‘निश्चय ही’।