शारदा अध्याय 1 स्वाध्यायान्मा प्रमदः

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
पञ्चशीलं किम् ? बौद्धधर्मे कानि पञ्च शीलानि सन्ति ? तेषाम् आचरणेन कः लाभः ?
उत्तर

उत्तरम् — बौद्धधर्मे सदाचरणस्य परिपालनाय पञ्च शीलानि सन्ति, येषाम् आचरणं मनुष्याणाम् अत्यन्तं लाभाय अस्ति। तानि सन्ति — अस्तेयम्, अहिंसा, ब्रह्मचर्यम्, सत्यम्, मादकद्रव्याणां परिहारः च।

(हिन्दी — बौद्ध धर्म में सदाचरण के पालन के लिए पाँच शील हैं, जिनका आचरण मनुष्यों के लिए अत्यन्त लाभकारी है। वे हैं — चोरी न करना, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, सत्य तथा नशीले पदार्थों का त्याग।)

क्रमःशीलम्अर्थःआचरणस्य लाभः
अस्तेयम्न स्तेयम् — चोरी न करना, दूसरे का धन न लेनासमाज में विश्वास बना रहता है; मन निर्भय रहता है
अहिंसामनसा वाचा कर्मणा किसी को पीड़ा न देनावैर समाप्त होता है; ‘सर्वभूतैकता’ का भाव जागता है
ब्रह्मचर्यम्इन्द्रिय-संयम तथा विद्या में निष्ठाशरीर स्वस्थ, बुद्धि तीव्र तथा अध्ययन सफल होता है
सत्यम्यथार्थ ही बोलना, वचन का पालनवाणी में बल आता है; लोग विश्वास करते हैं
मादकद्रव्याणां परिहारःनशीले पदार्थों का पूर्ण त्यागविवेक जागा रहता है; परिवार तथा स्वास्थ्य सुरक्षित रहते हैं
यह खण्ड यहाँ क्यों दिया गया: गीत के तीसरे श्लोक की अन्तिम पंक्ति है — ‘पञ्चशीलप्रतिष्ठापकं संस्कृतम्’, और पुस्तक का भावार्थ ३ कहता है ‘प्रसिद्धानां पञ्चानां शीलानां रीतिं गमयति’। पर ‘पञ्चशील’ है क्या — यह श्लोक नहीं बताता। इसीलिए ‘स्वाध्यायान्मा प्रमदः’ में उसकी व्याख्या दी गई है। दोनों को साथ पढ़िए, तभी श्लोक पूरा खुलता है।
ध्यान दें: यह ‘पञ्चशील’ बौद्ध धर्म का सदाचार-नियम है। आधुनिक इतिहास में ‘पञ्चशील’ नाम से भारत-चीन के बीच १९५४ का पाँच-सूत्री समझौता भी प्रसिद्ध है — पर पाठ में जिसकी बात है, वह बौद्ध शील ही है। दोनों को मिलाइए मत। साथ ही ध्यान दीजिए कि ये पाँचों नियम पातञ्जल योगसूत्र के पञ्च यमों (अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह) से बहुत मिलते-जुलते हैं — भारतीय परम्परा की यही साझी नैतिक भूमि संस्कृत ने सुरक्षित रखी है।
प्र2.
‘स्वाध्यायान्मा प्रमदः’ खण्डे प्रदत्तानां त्रयाणां श्लोकानाम् अन्वयम् अर्थं भावं च लिखत — “एतद्देशप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मनः। स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्वमानवाः॥ संस्कृतं संस्कृतेर्मूलं ज्ञानविज्ञानवारिधिः। वेदतत्त्वार्थसंजुष्टं लोकाऽऽलोककरं शिवम्॥ सत्याहिंसागुणैः श्रेष्ठा विश्वबन्धुत्वशिक्षिका। विश्वशान्तिसुखाधात्री भारतीया हि संस्कृतिः॥”
उत्तर

श्लोकः १

एतद्देशप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मनः।
स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्वमानवाः॥

पदच्छेदः — एतद्-देश-प्रसूतस्य + सकाशात् + अग्रजन्मनः + स्वम् + स्वम् + चरित्रम् + शिक्षेरन् + पृथिव्याम् + सर्वमानवाः।

अन्वयः — पृथिव्यां सर्वमानवाः एतद्देशप्रसूतस्य अग्रजन्मनः सकाशात् स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन्।

अर्थः — इस देश (भारत) में उत्पन्न श्रेष्ठ पुरुष के समीप से पृथ्वी के सभी मनुष्य अपना-अपना चरित्र सीखें।

भावः: यह मनुस्मृति (२.२०) का प्रसिद्ध श्लोक है और उसे यहाँ रखने का प्रयोजन स्पष्ट है — भारत को कवि ‘चरित्र की पाठशाला’ मानता है। ध्यान दीजिए, श्लोक ‘सब मेरा अनुकरण करें’ नहीं कहता; वह कहता है ‘स्वं स्वं चरित्रम्’ — अपना-अपना चरित्र सीखें। अर्थात् सीख यहाँ से लीजिए, पर उसे अपने ढंग से जिएँ। यही उदार दृष्टि तीसरे श्लोक के ‘विश्वबन्धुत्व’ का आधार है।
व्याकरण: ‘शिक्षेरन्’ — √शिक्ष् (आत्मनेपद), विधिलिङ् लकार, प्रथमपुरुष, बहुवचन (‘सीखना चाहिए / सीखें’)। ‘सकाशात्’ अव्ययवत् प्रयुक्त पञ्चमी है (‘के पास से’) और उसके योग में ‘अग्रजन्मनः’ षष्ठी में है। ‘अग्रजन्मन्’ = अग्रे जन्म यस्य सः — जो पहले जन्मा, अर्थात् श्रेष्ठ/विद्वान्।

श्लोकः २

संस्कृतं संस्कृतेर्मूलं ज्ञानविज्ञानवारिधिः।
वेदतत्त्वार्थसंजुष्टं लोकाऽऽलोककरं शिवम्॥

पदच्छेदः — संस्कृतम् + संस्कृतेः + मूलम् + ज्ञान-विज्ञान-वारिधिः + वेद-तत्त्व-अर्थ-संजुष्टम् + लोक-आलोक-करम् + शिवम्।

अन्वयः — संस्कृतं संस्कृतेः मूलम् (अस्ति), ज्ञानविज्ञानवारिधिः (अस्ति), वेदतत्त्वार्थसंजुष्टं लोकालोककरं शिवं च (अस्ति)।

अर्थः — संस्कृत संस्कृति की जड़ है, ज्ञान और विज्ञान का समुद्र है, वेद के तत्त्व तथा अर्थ से भरी हुई है, संसार को आलोकित करने वाली और कल्याणकारी है।

पदम्अर्थः
संस्कृतेः मूलम्संस्कृति की जड़ — संस्कृति संस्कृत से निकली है
वारिधिःवारि (जल) धीयते यस्मिन् सः — समुद्र
संजुष्टम्सम् + जुष्ट — भली-भाँति युक्त, सेवित
लोकालोककरम्लोकानाम् आलोकं करोति इति — संसार को प्रकाशित करने वाला
शिवम्कल्याणकरम् — मङ्गलकारी
भावः: यह श्लोक गीत के पाँचवें श्लोक का ही सार दोहराता है। ‘संस्कृतं संस्कृतेर्मूलम्’ में एक सुन्दर शब्द-क्रीडा है — ‘संस्कृत’ और ‘संस्कृति’ दोनों एक ही धातु (सम् + √कृ) से बने हैं, इसलिए भाषा और संस्कृति का सम्बन्ध केवल भाव का नहीं, शब्द का भी है। ‘वारिधिः’ रूपक कहता है कि इस भाषा में ज्ञान बूँद-बूँद नहीं, समुद्र-भर है — जितना उतरिए उतना गहरा।
सन्धि तथा छपाई: ‘संस्कृतेर्मूलम्’ = संस्कृतेः + मूलम् (विसर्गसन्धि — विसर्ग का ‘र्’)। पुस्तक में ‘लोकाऽऽलोककरम्’ अवग्रह-चिह्न के साथ छपा है, जो ‘लोक + आलोक’ की सन्धि को दिखाने के लिए है; सामान्य लेखन में इसे लोकालोककरम् लिखा जाता है। कुछ विद्वान् इसे ‘लोक-अलोक-करम्’ (इस लोक तथा परलोक — दोनों को प्रकाशित करने वाला) भी पढ़ते हैं, जो गीत के ‘ऐहिकामुष्मिकोत्कर्षदम्’ से मेल खाता है।

श्लोकः ३

सत्याहिंसागुणैः श्रेष्ठा विश्वबन्धुत्वशिक्षिका।
विश्वशान्तिसुखाधात्री भारतीया हि संस्कृतिः॥

पदच्छेदः — सत्य-अहिंसा-गुणैः + श्रेष्ठा + विश्व-बन्धुत्व-शिक्षिका + विश्व-शान्ति-सुख-आधात्री + भारतीया + हि + संस्कृतिः।

अन्वयः — भारतीया संस्कृतिः हि सत्याहिंसागुणैः श्रेष्ठा, विश्वबन्धुत्वशिक्षिका, विश्वशान्तिसुखाधात्री च (अस्ति)।

अर्थः — भारतीय संस्कृति सत्य तथा अहिंसा के गुणों के कारण श्रेष्ठ है; वही विश्वबन्धुत्व की शिक्षिका है; और वही विश्व की शान्ति तथा सुख को धारण करने वाली — पोषण करने वाली — है।

भावः: तीनों श्लोक एक सीढ़ी बनाते हैं — पहला कहता है चरित्र यहाँ से सीखो, दूसरा बताता है उस चरित्र का स्रोत संस्कृत है, और तीसरा उस स्रोत से बनी संस्कृति का फल गिनाता है : सत्य, अहिंसा, विश्वबन्धुत्व और विश्वशान्ति। यही चारों बातें गीत के तीसरे श्लोक में भी थीं — इसलिए यह श्लोक पाठ का समापन-वाक्य जैसा है।
व्याकरण: ‘गुणैः’ में तृतीया है — हेतु के अर्थ में (‘इन गुणों के कारण श्रेष्ठ’)। ‘शिक्षिका’ तथा ‘आधात्री’ दोनों स्त्रीलिङ्ग हैं, क्योंकि विशेष्य ‘संस्कृतिः’ स्त्रीलिङ्ग है। ‘आधात्री’ = आ + √धा + तृच् + ङीप् — धारण/पोषण करने वाली। ‘हि’ अव्यय यहाँ निश्चय के अर्थ में है — ‘निश्चय ही’।
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