शारदा अध्याय 1 यस्तु क्रियावान् मनुजः स विद्वान्

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
“संस्कृताधारिता भारतीयैकता” इति एतं विषयम् आधृत्य एका भाषणप्रतियोगिता आयोजनीया। शिक्षकः भाषणप्रतियोगितायां निम्नाङ्कितानां बिन्दूनां समावेशं करिष्यति। (अङ्कयोजना — प्रवाहः, शुद्धता, शब्दकोषः)
उत्तर

यह प्रतियोगिता-कार्य है। विषय है — ‘संस्कृत पर आधारित भारतीय एकता’। शिक्षक तीन बिन्दुओं पर अंक देंगे : प्रवाहः (धाराप्रवाह बोलना), शुद्धता (व्याकरण की शुद्धि) तथा शब्दकोषः (शब्द-भण्डार की विविधता)। प्रत्येक बिन्दु पर ५ से १ तक अंक हैं।

पुस्तक की अङ्कयोजना (मूल्यांकन-तालिका) —

अङ्कयोजना
प्रवाहःप्रवाहपूर्वकं संवादं करोति।केषुचित् बिन्दुषु विरामं करोति परन्तु सः संचारं न बाधते।केषुचित् बिन्दुषु विरामं करोति यः संचारं बाधते।कदाचित् प्रायः विरामं करोति येन संचारः कठिनः भवति।संचार एव न जायते।
शुद्धतायोग्यवाक्य-संरचनाअत्यल्पाः व्याकरण-दोषाःनैमित्तिक-व्याकरण-दोषाःत्रुटिपूर्ण-वाक्य-संरचनाःवाक्य-संरचना एव न जायमाना अस्ति।
शब्दकोषःप्रासंगिक-शब्दकोशस्य विविधतायाः उपयोगःशब्दावल्यां विविधतायाः उपयोगःप्रासङ्गिक–सीमित-शब्दकोशस्य उपयोगःसीमितशब्दकोशस्य उपयोगःद्वित्राः एव शब्दाः प्रयुक्ताः।

उच्चतम श्रेणी (५ + ५ + ५) पाने के लिए भाषण में क्या चाहिए —

  • प्रवाहः (५): बिना रुके, बिना ‘अ… अ…’ के बोलिए। वाक्य छोटे रखिए; एक साँस में एक ही विचार। कण्ठस्थ कीजिए, पढ़िए मत।
  • शुद्धता (५): कर्ता-क्रिया का वचन मिलाइए (संस्कृतम् अस्ति / भाषाः सन्ति), विभक्ति ठीक रखिए, संख्यावाची शब्दों में सावधानी बरतिए। जिस वाक्य पर सन्देह हो, उसे सरल कर दीजिए — अशुद्ध लम्बे वाक्य से शुद्ध छोटा वाक्य अच्छा है
  • शब्दकोषः (५): एक ही शब्द बार-बार मत दोहराइए। पाठ के पर्यायों का उपयोग कीजिए — भाषा/वाणी/भारती/सुरभारती, एकता/ऐक्यम्/सङ्घटनम्, ज्ञानम्/विद्या/शास्त्रम्, सर्वत्र/सर्वतः।
  • विषय-वस्तु: तीन खण्ड बनाइए — (१) संस्कृत क्यों जोड़ती है, (२) उदाहरण, (३) आज हम क्या करें। आरम्भ में सुभाषित और अन्त में आह्वान रखिए।

आदर्श उत्तरम् (नमूना भाषण — उच्चतम श्रेणी) —

॥ संस्कृताधारिता भारतीयैकता ॥

माननीयाः अध्यापकाः, प्रियाः सहपाठिनः, सर्वेभ्यः नमस्कारः।
अद्य अहं ‘संस्कृताधारिता भारतीयैकता’ इति विषये किञ्चित् वक्तुम् इच्छामि।

संस्कृतं भारतदेशस्य सम्पत् अस्ति। अस्यां भाषायाम् एव अस्माकं ज्ञानवैभवं सञ्चितम् अस्ति।
अस्माकं देशे भाषाः बह्व्यः सन्ति — हिन्दी, मराठी, बाङ्ग्ला, तेलुगु, कन्नडम्, तमिऴम्, गुर्जरी, ओड़िआ इत्यादयः।
किन्तु आसां सर्वासां भाषाणां शब्दभण्डारः प्रायः संस्कृतात् एव आगतः।
यदा कश्चन बङ्गदेशीयः ‘विद्यालयः’ इति वदति, यदा च कश्चन कन्नडभाषी ‘मित्रम्’ इति वदति, तदा उभौ अपि संस्कृतम् एव वदतः।
अतः एव कविः गायति — ‘भारतीयैकतासाधकं संस्कृतम्’।

न केवलं शब्दाः, अपि तु विचाराः अपि सामान्याः सन्ति।
‘वसुधैव कुटुम्बकम्’, ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’, ‘सत्यमेव जयते’ — एतानि वाक्यानि संस्कृतात् एव निःसृतानि,
एतानि च कश्मीरतः कन्याकुमारीपर्यन्तं सर्वैः भारतीयैः समानरूपेण मन्यन्ते।
रामायणं महाभारतं च देशस्य प्रत्येकस्मिन् प्रदेशे स्वभाषया गीयेते — कथा एका, भाषाः अनेकाः।
इयम् एव अस्माकं वास्तविकी एकता।

संस्कृतं जनानां मानसं संस्करोति, वाणीं परिष्करोति, सत्पथे प्रेरयति च।
तत् केवलं भारतीयानाम् एकतां न साधयति, अपि तु विश्वबन्धुत्वम् अपि विस्तारयति।
यतः संस्कृतस्य सन्देशः अस्ति — ‘सर्वे सन्तु निरामयाः’।

अतः वयं सर्वे प्रतिज्ञां कुर्मः — वयं संस्कृतं पठिष्यामः, संस्कृतेन वदिष्यामः, संस्कृतस्य सुभाषितानि च स्मरिष्यामः।
यतः संस्कृतं सत्यं शिवं सुन्दरं च अस्ति।

एतावत् एव। धन्यवादः।

(हिन्दी अनुवाद —) आदरणीय अध्यापकगण, प्रिय सहपाठियो, सबको नमस्कार। आज मैं ‘संस्कृत पर आधारित भारतीय एकता’ विषय पर कुछ कहना चाहता/चाहती हूँ। संस्कृत भारत देश की सम्पत्ति है; इसी भाषा में हमारा ज्ञानवैभव संचित है। हमारे देश में भाषाएँ बहुत हैं — हिन्दी, मराठी, बाङ्ग्ला, तेलुगु, कन्नड, तमिऴ, गुजराती, ओड़िआ आदि। किन्तु इन सबका शब्दभण्डार प्रायः संस्कृत से ही आया है। जब कोई बंगाली ‘विद्यालय’ कहता है और कोई कन्नडभाषी ‘मित्र’ कहता है, तब दोनों संस्कृत ही बोल रहे होते हैं। इसीलिए कवि गाता है — ‘भारतीयैकतासाधकं संस्कृतम्’। केवल शब्द ही नहीं, विचार भी साझे हैं — ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’, ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’, ‘सत्यमेव जयते’ — ये वाक्य संस्कृत से ही निकले हैं और कश्मीर से कन्याकुमारी तक सब भारतीय इन्हें एक-सा मानते हैं। रामायण और महाभारत देश के हर प्रदेश में अपनी-अपनी भाषा में गाए जाते हैं — कथा एक, भाषाएँ अनेक। यही हमारी वास्तविक एकता है। संस्कृत मन को संस्कारित करती है, वाणी को शुद्ध करती है और सन्मार्ग पर प्रेरित करती है। वह केवल भारतीयों की एकता नहीं साधती, विश्वबन्धुत्व भी फैलाती है, क्योंकि उसका सन्देश है — ‘सर्वे सन्तु निरामयाः’। इसलिए हम सब प्रतिज्ञा करते हैं — हम संस्कृत पढ़ेंगे, संस्कृत में बोलेंगे और संस्कृत के सुभाषित याद रखेंगे; क्योंकि संस्कृत सत्य है, शिव है और सुन्दर है। बस इतना ही। धन्यवाद।

यह भाषण उच्चतम श्रेणी में क्यों आएगा: प्रवाहः (५) — वाक्य छोटे हैं, कोई वाक्य दो पंक्तियों से लम्बा नहीं, इसलिए बोलते समय कहीं अटकना नहीं पड़ेगा और ‘संचारः’ (सम्प्रेषण) कहीं नहीं टूटेगा। शुद्धता (५) — हर वाक्य में कर्ता और क्रिया का वचन मिला हुआ है (भाषाः … सन्ति; कथा एका; उभौ … वदतः), समास पाठ से ही लिए गए हैं, इसलिए व्याकरण-दोष की सम्भावना न्यूनतम है। शब्दकोषः (५)सम्पत्, ज्ञानवैभवम्, शब्दभण्डारः, निःसृतानि, संस्करोति, परिष्करोति, विस्तारयति, प्रतिज्ञाम् — शब्द बार-बार नहीं दोहराए गए और सब प्रसंग के अनुकूल हैं।
प्रस्तुति की युक्तियाँ: (१) आरम्भ का सम्बोधन और अन्त का ‘धन्यवादः’ कभी न भूलिए — इनसे प्रवाह का प्रथम और अन्तिम प्रभाव बनता है। (२) उद्धरण (‘भारतीयैकतासाधकं संस्कृतम्’) बोलते समय स्वर थोड़ा ऊँचा कीजिए। (३) २–३ मिनट पर्याप्त हैं; लम्बा भाषण प्रायः प्रवाह खो देता है। (४) एक बार दर्पण के सामने और एक बार मित्र के सामने अभ्यास कीजिए — मित्र से केवल यह पूछिए कि ‘कहाँ अटका ?’
प्र2.
विश्वबन्धुत्वभावनायाः विकासाय के मार्गाः अवलम्बनीयाः इति विषयमधिकृत्य सहपाठिभिः सह आलोचनां कुरुत।
उत्तर

यह समूह-चर्चा (आलोचना) का कार्य है — सहपाठियों के साथ बैठकर यह सोचना है कि विश्वबन्धुत्व की भावना बढ़ाने के लिए कौन-से मार्ग अपनाए जाएँ। इसका उत्तर एक ‘सही’ सूची नहीं है; पर अच्छी चर्चा की एक विधि अवश्य है।

चर्चा कैसे कीजिए (विधि) —

  1. पाँच-छह के समूह बनाइए। एक विद्यार्थी ‘लेखक’ बने जो सुझाव लिखता जाए।
  2. पहले पाठ का तीसरा श्लोक फिर से पढ़िए — ‘विश्वबन्धुत्वविस्तारकं संस्कृतम् / सर्वभूतैकताकारकं संस्कृतम्’। चर्चा इसी आधार से आरम्भ हो।
  3. हर सदस्य एक ऐसा उपाय बताए जो वह स्वयं इसी सप्ताह कर सकता है — बड़ी-बड़ी बातें नहीं, छोटा और करने योग्य काम।
  4. अन्त में समूह तीन उपाय चुने और यह भी लिखे कि उन्हें कैसे जाँचा जाएगा कि वे सचमुच हुए या नहीं।

अच्छे उत्तर में ये बातें अवश्य आएँ — हर मार्ग किसी श्लोक या भावार्थ से जुड़ा हो; मार्ग व्यावहारिक हो; और उसमें ‘सर्वभूत’ का भाव हो — अर्थात् केवल मनुष्य नहीं, प्राणिमात्र तक करुणा जाए।

क्रमःमार्गः (संस्कृतम्)हिन्दी में क्या करना हैपाठ से आधार
भाषाणां परस्परम् आदरः — विद्यालये ‘भाषा-दिवसः’ आयोजनीयः।महीने में एक दिन हर विद्यार्थी किसी दूसरी भारतीय भाषा का एक गीत या सुभाषित सुनाए।भारतीयैकतासाधकं संस्कृतम् (श्लोक १)
सुभाषितानां पठनम् — ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ इत्यादीनि कण्ठस्थानि कर्तव्यानि।प्रार्थना-सभा में प्रतिदिन एक सुभाषित उसके अर्थ के साथ पढ़ा जाए।विश्वबन्धुत्वविस्तारकं संस्कृतम् (श्लोक ३)
प्राणिदया — पक्षिभ्यः जलपात्रं, वृक्षारोपणं च।कक्षा हर छत पर पक्षियों के लिए पानी रखे; वर्षा में पाँच पौधे लगाए।सर्वभूतैकताकारकं संस्कृतम् (श्लोक ३)
पत्रमैत्री — अन्यराज्यस्य विद्यालयेन सह पत्राचारः।किसी दूसरे राज्य के विद्यालय से पत्र-मित्रता जोड़ी जाए; वर्ष में चार पत्र लिखे जाएँ।विश्वबन्धुत्वं वर्धयति (भावार्थ ३)
सेवाकार्यम् — त्यागः, सन्तोषः, सेवा च व्रतरूपेण स्वीकार्याः।महीने में एक दिन ‘सेवा-दिवस’ — विद्यालय की सफाई, छोटी कक्षा के बच्चों को पढ़ाना।त्यागसन्तोषसेवाव्रतं संस्कृतम् (श्लोक ४)
शीलपालनम् — सत्यम्, अहिंसा, अस्तेयम् इत्यादीनां पञ्चशीलानाम् आचरणम्।कक्षा में ‘आज किसी ने किसी की सहायता की’ — इसका एक साप्ताहिक भित्ति-पत्र बने।पञ्चशीलप्रतिष्ठापकं संस्कृतम् (श्लोक ३) तथा ‘पञ्चशीलं किम् ?’

आदर्श उत्तरम् (नमूना — चर्चा का निष्कर्ष) —

विश्वबन्धुत्वभावनायाः विकासाय अस्माभिः त्रयः मार्गाः अवलम्बनीयाः इति वयं निश्चितवन्तः —
प्रथमम् — अन्येषां भाषाणां संस्कृतीनां च आदरः करणीयः, यतः निन्दया न कदापि बन्धुत्वं जायते।
द्वितीयम् — ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ इति भावः केवलं कण्ठस्थः न भवेत्, अपि तु आचरणे दृश्येत — अतः प्रतिमासम् एकः सेवादिवसः आयोजनीयः।
तृतीयम् — सर्वेषु भूतेषु दया करणीया; पक्षिभ्यः जलं, वृक्षेभ्यः रक्षणं च देयम्।
यतः यत्र सर्वे प्राणिनः सुखिनः भवन्ति, तत्र एव जगत् एकनीडं भवति।

(हिन्दी — विश्वबन्धुत्व की भावना के विकास के लिए हमने तीन मार्ग तय किए — पहला, दूसरी भाषाओं और संस्कृतियों का आदर करना, क्योंकि निन्दा से कभी भाईचारा नहीं बनता। दूसरा, ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ केवल याद न रहे, आचरण में दिखे — इसके लिए हर महीने एक सेवा-दिवस मनाया जाए। तीसरा, सब प्राणियों पर दया की जाए — पक्षियों को पानी और वृक्षों को रक्षा दी जाए। क्योंकि जहाँ सब प्राणी सुखी होते हैं, वहीं संसार एक घोंसला बनता है।)

यह उत्तर अच्छा क्यों है: इसमें तीनों मार्ग पाठ से निकले हैं (आदर → श्लोक १, सेवा → श्लोक ४, प्राणिदया → श्लोक ३), तीनों करने योग्य हैं, और अन्तिम पंक्ति अभ्यास के प्रश्न ७ (च) के वाक्य ‘यत्र जगत् एकनीडं भवति’ को उठाकर पूरे उत्तर को पाठ से बाँध देती है। चर्चा का उत्तर तभी पूरा माना जाता है जब वह विचार से आरम्भ होकर कार्य पर समाप्त हो।
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