शारदा अध्याय 2 अभ्यासाद् जायते सिद्धिः

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
“सुखस्य मूलं धर्मः, धर्मस्य मूलम् अर्थः” इतीदं प्रसिद्धं वाक्यं कस्मिन् ग्रन्थे प्राप्यते ?
उत्तर

“सुखस्य मूलं धर्मः, धर्मस्य मूलम् अर्थः” इतीदं प्रसिद्धं सूत्ररूपं वाक्यं कौटिल्यस्य अर्थशास्त्रे प्राप्यते। (हिन्दी — “सुख की जड़ धर्म है, धर्म की जड़ धन है” — यह प्रसिद्ध सूत्ररूप वाक्य कौटिल्य के अर्थशास्त्र में मिलता है।)

पूर्णवाक्य कैसे बनाएँ: ‘पूर्णवाक्येन उत्तरं लिखत’ का अर्थ है — प्रश्न के शब्दों को ही उत्तर में लौटाकर एक पूरा वाक्य बनाना। यहाँ प्रश्न का ‘कस्मिन् ग्रन्थे’ उत्तर में कौटिल्यस्य अर्थशास्त्रे (सप्तमी — «अधिकरणे सप्तमी») बन जाता है। केवल ‘अर्थशास्त्रे’ लिखना भी शुद्ध है, किन्तु पूरा वाक्य अपेक्षित है।
Did you know? कौटिल्य (चाणक्य / विष्णुगुप्त) का अर्थशास्त्र राजनीति तथा अर्थव्यवस्था का प्राचीनतम उपलब्ध भारतीय ग्रन्थ है। यही मेलन अभ्यास ३ (घ) में भी पूछा गया है।
प्र2.
सामान्यजीवने कासाम् आवश्यकतानां पूर्त्यर्थं धनम् आवश्यकम् ?
उत्तर

सामान्यजीवने अन्नं, वस्त्रम्, आवासः, शिक्षा, स्वास्थ्यसेवा चेत्यादीनां मूलभूतानाम् आवश्यकतानां पूर्त्यर्थं धनम् आवश्यकम्। (हिन्दी — साधारण जीवन में अन्न, वस्त्र, आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य-सेवा आदि मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए धन आवश्यक है।)

संस्कृतम्हिन्दी
अन्नम्भोजन
वस्त्रम्कपड़ा
आवासःघर
शिक्षापढ़ाई
स्वास्थ्यसेवाचिकित्सा-सेवा
रूप-सङ्केत: प्रश्न में ‘कासाम् आवश्यकतानाम्’ — स्त्रीलिङ्ग षष्ठी बहुवचन; अतः उत्तर में भी ‘मूलभूतानाम् आवश्यकतानाम्’ षष्ठी बहुवचन में ही रखिए। पुस्तक के मूल गद्य में यही वाक्य ‘पूर्तये’ के साथ है, प्रश्न में ‘पूर्त्यर्थम्’ प्रयुक्त है — दोनों समानार्थक हैं।
प्र3.
ब्राह्मे मुहूर्ते कयोः चिन्तनम् आवश्यकम् ?
उत्तर

ब्राह्मे मुहूर्ते धर्मार्थयोः चिन्तनम् आवश्यकम्। (हिन्दी — ब्राह्म मुहूर्त में धर्म और अर्थ — दोनों का चिन्तन आवश्यक है।)

आधारवाक्यम्: गरुडपुराणस्य वचनं — “ब्राह्मे मुहूर्ते चोत्थाय धर्ममर्थं च चिन्तयेत्।” पाठः स्वयं तस्य अर्थं वदति — “अर्थात् दिनस्य आरम्भे धर्मार्थयोः चिन्तनम् आवश्यकम्।”
रूप-सङ्केत: प्रश्न का ‘कयोः’ द्विवचन षष्ठी है — इसीलिए उत्तर भी द्विवचन में धर्मार्थयोः (धर्मः + अर्थः = धर्मार्थौ, द्वन्द्व समास; षष्ठी द्विवचन = धर्मार्थयोः)। ‘धर्मस्य अर्थस्य च’ लिखना भी अशुद्ध नहीं, पर द्विवचन-रूप ही अपेक्षित उत्तर है।
प्र4.
जनः केन स्वावलम्बी भवति ?
उत्तर

जनः सञ्चयस्य अभ्यासेन स्वावलम्बी भवति। (हिन्दी — मनुष्य संचय (बचत) के अभ्यास से स्वावलम्बी बनता है।)

आधारवाक्यम्:सञ्चयस्य अभ्यासेन जनः स्वावलम्बी भवति। स्वावलम्बनं स्वाभिमानस्य मूलं वर्तते।”
रूप-सङ्केत: ‘केन’ — तृतीया एकवचन, अतः उत्तर भी तृतीया में — ‘अभ्यासेन’। «करणे तृतीया» — जिस साधन से कार्य हो, वह तृतीया में आता है।
प्र5.
लघुलघुसञ्चयः अपि कालान्तरे केन रूपेण वर्धते ?
उत्तर

लघु-लघुः सञ्चयः अपि कालान्तरे महत्सम्पत्तिरूपेण वर्धते। (हिन्दी — छोटा-छोटा संचय भी समय बीतने पर महती सम्पत्ति के रूप में बढ़ जाता है।)

आधारवाक्यम्: चाणक्यनीतेः श्लोकानन्तरं पाठः वदति — “लघु-लघुः सञ्चयोऽपि कालान्तरे महत्सम्पत्तिरूपेण वर्धते।” इदम् एव पृष्ठ १७ इत्यत्र चक्रवृद्ध्यंशस्य सारिण्या सिद्धं भवति।
रूप-सङ्केत: ‘केन रूपेण’ — तृतीया; उत्तर में ‘महत्सम्पत्तिरूपेण’ भी तृतीया एकवचन। ‘सञ्चयोऽपि’ = सञ्चयः + अपि (विसर्गसन्धि — ओऽ)।
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