प्र1.
वाक्येन सह ग्रन्थस्य सम्मेलनं कुरुत — (क) जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः। (ख) ब्राह्मे मुहूर्ते चोत्थाय धर्ममर्थं च चिन्तयेत्। (ग) सर्वेषामेव शौचानामर्थशौचं परं स्मृतम्। (घ) सुखस्य मूलं धर्मः, धर्मस्य मूलम् अर्थः। | [ग्रन्थाः — १. गरुडपुराणम् २. मनुस्मृतिः ३. अर्थशास्त्रम् ४. चाणक्यनीतिः]
उत्तर
शुद्धं सम्मेलनम् — (क) → ४, (ख) → १, (ग) → २, (घ) → ३। (हिन्दी — सही मेलन — (क) चाणक्यनीति, (ख) गरुडपुराण, (ग) मनुस्मृति, (घ) अर्थशास्त्र।)
| वाक्यम् | ग्रन्थः | पाठे प्रमाणम् (कैसे जाना) |
|---|---|---|
| (क) जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः। | ४. चाणक्यनीतिः | पाठे लिखितम् — “अर्जितस्य सञ्चयः सञ्चितस्य च निवेशः — चाणक्यनीतौ उक्तम् —” ततः अयं श्लोकः। |
| (ख) ब्राह्मे मुहूर्ते चोत्थाय धर्ममर्थं च चिन्तयेत्। | १. गरुडपुराणम् | “अन्यतमः स्तम्भः इति गण्यते। उक्तं गरुडपुराणे —” इति निर्दिश्य दत्तम्। |
| (ग) सर्वेषामेव शौचानामर्थशौचं परं स्मृतम्। | २. मनुस्मृतिः | “उक्तं भगवता मनुना —” इति निर्दिश्य दत्तम्; मनोः वचनं मनुस्मृतौ अस्ति। |
| (घ) सुखस्य मूलं धर्मः, धर्मस्य मूलम् अर्थः। | ३. अर्थशास्त्रम् | “तेष्वेकं प्रसिद्धं सूत्ररूपं वाक्यं कौटिल्यस्य अर्थशास्त्रे अस्ति —” |
स्मरणसूत्रम्: पुस्तक में चारों उद्धरण एक ही ढंग से आते हैं — पहले ग्रन्थ का नाम (‘उक्तं गरुडपुराणे’, ‘उक्तं भगवता मनुना’, ‘चाणक्यनीतौ उक्तम्’), फिर लाल रंग में श्लोक। अतः मेलन याद करने की नहीं, पाठ की पंक्ति देखने की बात है।
ध्यान दें: पुस्तक में (क) से ४ तक एक लाल तीर पहले से खींचा गया है — वह उदाहरण है, उत्तर का संकेत। शेष तीन आपको मिलाने हैं।