शारदा अध्याय 2 अभ्यासाद् जायते सिद्धिः

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
सुखस्य मूलं धर्मः।
उत्तर

कस्य मूलं धर्मः ? (हिन्दी — किसकी जड़ धर्म है?)

नियम: रेखाङ्कित पद जिस विभक्ति-वचन-लिङ्ग में हो, प्रश्नवाचक सर्वनाम भी उसी में रखिए। ‘सुखस्य’ = नपुंसकलिङ्ग षष्ठी एकवचन → ‘किम्’ शब्द का षष्ठी एकवचन = कस्य। शेष वाक्य ज्यों-का-त्यों रहता है।
प्र2.
दिनस्य आरम्भे धर्मार्थयोः चिन्तनम् आवश्यकम्।
उत्तर

दिनस्य आरम्भे कयोः चिन्तनम् आवश्यकम् ? (हिन्दी — दिन के आरम्भ में किन दो का चिन्तन आवश्यक है?)

नियम: ‘धर्मार्थयोः’ षष्ठी द्विवचन है (धर्मार्थौ — द्वन्द्व समास), अतः प्रश्नवाचक भी षष्ठी द्विवचन में — कयोः। ‘कस्य’ (एकवचन) या ‘केषाम्’ (बहुवचन) लिखना अशुद्ध होगा।
जोड़कर देखिए: यही रूप अभ्यास २ (ग) के प्रश्न में भी आया है — ‘ब्राह्मे मुहूर्ते कयोः चिन्तनम् आवश्यकम् ?’ अर्थात् पुस्तक स्वयं यही प्रश्न बना चुकी है।
प्र3.
सन्मार्गेण एव धनार्जनं करणीयम्।
उत्तर

सन्मार्गेण एव किं करणीयम् ? (हिन्दी — सन्मार्ग से ही क्या करना चाहिए?)

नियम: ‘धनार्जनम्’ नपुंसकलिङ्ग प्रथमा/द्वितीया एकवचन है (यहाँ ‘करणीयम्’ के साथ कर्मरूप में), और नपुंसकलिङ्ग का प्रश्नवाचक इन दोनों विभक्तियों में किम् ही होता है।
प्र4.
अनैतिकः आर्थिकव्यवहारः कदापि न करणीयः।
उत्तर

कीदृशः आर्थिकव्यवहारः कदापि न करणीयः ? (हिन्दी — कैसा आर्थिक व्यवहार कभी नहीं करना चाहिए?)

नियम: रेखाङ्कित पद विशेषण है (गुण बता रहा है), संज्ञा नहीं। विशेषण के लिए प्रश्नवाचक ‘कः’ नहीं, कीदृशः (= कैसा) होता है — और वह विशेष्य के अनुसार पुं. प्रथमा एकवचन में।
देखिए: पुस्तक ने यही प्रश्न अभ्यास १ (घ) में स्वयं पूछा है — ‘कीदृशः आर्थिकव्यवहारः कदापि न करणीयः ?’ अतः यह उत्तर पुस्तक से ही प्रमाणित है।
प्र5.
संकटकाले स्वाभिमानिजनः अन्यजनस्य आर्थिकसहायतां नापेक्षते।
उत्तर

संकटकाले कः अन्यजनस्य आर्थिकसहायतां नापेक्षते ? (हिन्दी — संकट के समय कौन दूसरे व्यक्ति की आर्थिक सहायता की अपेक्षा नहीं करता?)

नियम: ‘स्वाभिमानिजनः’ वाक्य का कर्ता है — पुंल्लिङ्ग प्रथमा एकवचन; अतः प्रश्नवाचक भी पुं. प्रथमा एकवचन में — कः
सन्धि-सङ्केत: ‘नापेक्षते’ = न + अपेक्षते (दीर्घसन्धिः — अ + अ = आ)। और ‘अपेक्षते’ आत्मनेपदी क्रिया है — अभ्यास ५ की तालिका में इसी धातु (अपेक्ष्) के रूप भरने हैं।
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