शारदा अध्याय 2 अभ्यासाद् जायते सिद्धिः

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
“सुखस्य मूलं धर्मः, धर्मस्य मूलम् अर्थः” इत्यस्य मुख्यः आशयः कः अस्ति ? (१) सुखस्य आधारः केवलम् अर्थः एव। (२) धर्मस्य आधारः केवलं सुखम् एव। (३) धर्मस्य आधारः अर्थः, सुखस्य आधारः धर्मः। (४) सुखं, धर्मः, अर्थः – एतेषां मध्ये सम्बन्धः नास्ति।
उत्तर

शुद्धः विकल्पः — (३) धर्मस्य आधारः अर्थः, सुखस्य आधारः धर्मः। (हिन्दी — सही विकल्प (३) है — धर्म का आधार अर्थ है और सुख का आधार धर्म।)

क्यों (३): पाठ स्वयं यही आशय देता है — “अस्य आशयः अस्ति यत् वास्तविकसुखस्य आधारः धर्मः, धर्मपालनस्य च आधारः अर्थः।”
विकल्पःक्यों अशुद्ध
(१)सूत्र कहता है कि सुख का आधार धर्म है, अर्थ नहीं। अर्थ तो धर्म का आधार है — बीच की कड़ी छोड़ देना अशुद्ध है।
(२)सम्बन्ध उलटा कर दिया गया — सुख धर्म का फल है, आधार नहीं।
(४)पाठ स्पष्ट कहता है — “एतेषां त्रयाणां परस्परसम्बन्धः अविच्छिन्नः अस्ति”।
प्र2.
गरुडपुराणे किम् उपदिष्टम् अस्ति ? (१) रात्रौ धनस्य चिन्तनं करणीयम्। (२) प्रभाते धर्मार्थयोः चिन्तनं करणीयम्। (३) केवलं धर्मचिन्तनं करणीयम्। (४) केवलम् अर्थचिन्तनं करणीयम्।
उत्तर

शुद्धः विकल्पः — (२) प्रभाते धर्मार्थयोः चिन्तनं करणीयम्। (हिन्दी — सही विकल्प (२) — प्रातःकाल धर्म और अर्थ दोनों का चिन्तन करना चाहिए।)

क्यों (२): “ब्राह्मे मुहूर्ते चोत्थाय धर्ममर्थं च चिन्तयेत्” — ब्राह्म मुहूर्त प्रभात का ही काल है (सूर्योदय से पूर्व), और श्लोक में ‘धर्मम् अर्थं च’ — दोनों हैं। पाठ का अपना अनुवाद भी यही है — “दिनस्य आरम्भे धर्मार्थयोः चिन्तनम् आवश्यकम्।”
अशुद्ध क्यों: (१) में काल ग़लत (रात्रि), (३) तथा (४) में ‘केवलम्’ शब्द ग़लत — श्लोक दोनों का चिन्तन कहता है, किसी एक का नहीं।
प्र3.
“सर्वेषामेव शौचानामर्थशौचं परं स्मृतम्” इत्यस्य तात्पर्यं किम् ? (१) जलशौचमेव श्रेष्ठम्। (२) मृद्वारिशौचमेव श्रेष्ठम्। (३) अर्थशौचं सर्वोपरि, अन्यविधशौचेभ्यः श्रेयः। (४) शौचस्य आवश्यकता नास्ति।
उत्तर

शुद्धः विकल्पः — (३) अर्थशौचं सर्वोपरि, अन्यविधशौचेभ्यः श्रेयः। (हिन्दी — सही विकल्प (३) — धन की पवित्रता सबसे ऊपर है, अन्य सभी शुद्धियों से श्रेष्ठ है।)

क्यों (३): श्लोक का दूसरा चरण स्वयं यह अन्तर स्पष्ट करता है — “योऽर्थे शुचिर्हि सः शुचिः, न मृद्वारिशुचिः शुचिः” — जो धन के विषय में पवित्र है वही पवित्र है; केवल मिट्टी-पानी से शरीर धोकर पवित्र हुआ नहीं। ‘परं स्मृतम्’ का अर्थ ही है ‘श्रेष्ठ माना गया’।
अशुद्ध क्यों: (१) और (२) ठीक वही कहते हैं जिसका श्लोक खण्डन कर रहा है। (४) श्लोक के विरुद्ध है — शौच की आवश्यकता है, बस उसका सर्वश्रेष्ठ रूप अर्थशौच है।
प्र4.
छात्रैः क्रियमाणः अपव्ययः कः ? (१) स्वास्थ्यलाभाय व्ययः। (२) विद्यार्जनाय व्ययः। (३) आडम्बरयुक्तः प्रदर्शनात्मकः व्ययः। (४) आत्मसुरक्षायै व्ययः।
उत्तर

शुद्धः विकल्पः — (३) आडम्बरयुक्तः प्रदर्शनात्मकः व्ययः। (हिन्दी — सही विकल्प (३) — आडम्बरयुक्त, दिखावटी ख़र्च।)

क्यों (३): पाठ की कसौटी स्पष्ट है — “येन व्ययेन स्वास्थ्यलाभः, विद्यार्जनम्, आत्मसुरक्षा वा भवेत्, सः व्ययः अवश्यं करणीयःआडम्बरपूर्णः प्रदर्शनकारी व्ययः अथवा विलासव्यसनाय व्ययः अपव्ययः भवति।” अतः विकल्प (१), (२), (४) तीनों ‘करणीय व्यय’ हैं, अपव्यय नहीं — केवल (३) अपव्यय है।
Tip: इस प्रकार के प्रश्न में तीन विकल्प एक ही वर्ग के हों और एक अलग — तो प्रायः वही अलग विकल्प उत्तर होता है। यहाँ तीनों ‘लाभकारी व्यय’ हैं, एक ‘दिखावटी’।
प्र5.
“जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः” इति वाक्यं कः अवदत् ? (१) बृहस्पतिः (२) चाणक्यः (३) मनुः (४) याज्ञवल्क्यः
उत्तर

शुद्धः विकल्पः — (२) चाणक्यः। (हिन्दी — सही विकल्प (२) — चाणक्य।)

क्यों (२): पाठ में यह श्लोक ‘चाणक्यनीतौ उक्तम्’ इस निर्देश के साथ दिया गया है, और चाणक्यनीति के रचयिता आचार्य चाणक्य (कौटिल्य / विष्णुगुप्त) हैं।
जोड़कर याद रखिए: इसी पाठ में चाणक्य दो बार आते हैं — एक बार अर्थशास्त्र के रचयिता कौटिल्य के रूप में (शीर्षक-सूत्र), दूसरी बार चाणक्यनीति के रूप में (घट-श्लोक)। दोनों एक ही आचार्य के ग्रन्थ हैं।
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