पाठे पञ्च सूक्तयः/श्लोकाः सन्ति। अधः प्रत्येकस्य आशयः स्वभाषया (हिन्दीभाषया) संक्षेपेण दत्तः — एतत् एव उत्तरपुस्तिकायां लिखित्वा शिक्षकाय दर्शयत। (हिन्दी — पाठ में पाँच सूक्तियाँ/श्लोक हैं। नीचे प्रत्येक का आशय अपनी भाषा में संक्षेप में दिया गया है — यही लिखकर शिक्षक को दिखाइए।)
| सूक्तिः / श्लोकः | ग्रन्थः | आशयः (स्वभाषया) |
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| सुखस्य मूलं धर्मः, धर्मस्य मूलम् अर्थः। | अर्थशास्त्रम् (कौटिल्यः) | सच्चे सुख की जड़ धर्म है और धर्म की जड़ धन। न्याय से कमाया धन ही मनुष्य को धर्म-पालन के योग्य बनाता है, और धर्म-पालन ही स्थायी सुख देता है। |
| ब्राह्मे मुहूर्ते चोत्थाय धर्ममर्थं च चिन्तयेत्। | गरुडपुराणम् | दिन का आरम्भ ही योजना का समय है। ब्राह्म मुहूर्त में उठकर सोचना चाहिए — आज कौन-सा धर्म्य कार्य करना है और अर्थ का प्रबन्ध कैसा रहेगा। |
| सर्वेषामेव शौचानामर्थशौचं परं स्मृतम्। योऽर्थे शुचिर्हि सः शुचिर्न मृद्वारिशुचिः शुचिः॥ | मनुस्मृतिः | सब शुद्धियों में धन की शुद्धि सर्वश्रेष्ठ है। जिसका धन ईमानदारी का है वही सचमुच पवित्र है; केवल मिट्टी-पानी से शरीर धोकर कोई पवित्र नहीं हो जाता। |
| जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः। स क्रमः सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य च॥ | चाणक्यनीतिः | बूँद-बूँद से घड़ा भरता है। विद्या, धर्म और धन — तीनों इसी क्रम से बढ़ते हैं, अर्थात् थोड़ा-थोड़ा किन्तु नियमित प्रयत्न ही बड़ा फल देता है। |
| क्षणशः कणशश्चैव विद्यामर्थं च साधयेत्। क्षणे नष्टे कुतो विद्या कणे नष्टे कुतो धनम्॥ | (पाठान्ते उद्धृतम्) | क्षण-क्षण से विद्या और कण-कण से धन जुटता है। जो क्षण गँवाता है वह विद्या खोता है, जो कण गँवाता है वह धन खोता है। |