शारदा अध्याय 3 अभ्यासाद् जायते सिद्धिः

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
यथा — नामदेवः स्थालिकां स्वीकृत्य मन्दिरं गच्छति। → नामदेवः स्थालिकां स्वीकृत्य मन्दिरं गतवान्।
उत्तर

यह प्रश्न ‘लट्-लकार → क्तवतु-प्रत्ययान्त भूतकाल’ का अभ्यास है। (हिन्दी — वर्तमानकालिक क्रिया को क्तवतु-प्रत्यय वाले भूतकालिक रूप में बदलना है।)

परिवर्तनस्य नियमः —
१. क्रियापदस्य धातुं निष्कासयत (गच्छति → √गम्)।
२. तस्मात् क्तवतु-प्रत्ययान्तं रूपं रचयत (√गम् + क्तवतु → गतवत्)।
३. तत् रूपं कर्तुः लिङ्गे, वचने, प्रथमायां विभक्तौ योजयत —
  पुं. ए.व. → गतवान् · पुं. द्वि.व. → गतवन्तौ · पुं. ब.व. → गतवन्तः
  स्त्री. ए.व. → गतवती · स्त्री. ब.व. → गतवत्यः
क्तवतु क्यों, लङ् क्यों नहीं: संस्कृत में भूतकाल लङ्-लकार (अगच्छत्) से भी बनता है, पर क्तवतु-रूप कर्ता के लिङ्ग और वचन दिखाता है — ‘गतवती’ से पता चल जाता है कि कर्ता स्त्री है। पूरा पाठ इसी शैली में लिखा गया है, इसीलिए यही अभ्यास कराया जा रहा है।
ध्यान दें: केवल मुख्य क्रिया बदलती है। ‘स्वीकृत्य’ (ल्यबन्त) अव्यय है, वह अपरिवर्तित रहता है — यही बात ‘निमील्य’, ‘आदाय’, ‘गृहीत्वा’ पर भी लागू है।
प्र2.
नैवेद्यं विग्रहस्य पुरतः स्थापयति।
उत्तर

नैवेद्यं विग्रहस्य पुरतः स्थापितवान्। (हिन्दी — नैवेद्य को मूर्ति के सामने रख दिया।)

स्थापयति → √स्था (णिच्) + क्तवतु = स्थापितवत् → पुं. प्र. ए.व. = स्थापितवान्
कर्ता कौन: यह वाक्य नामदेव के विषय में है (‘एकदा सः नैवेद्यस्थालिकां गृहीत्वा विग्रहस्य पुरतः स्थापितवान्’), अतः कर्ता पुंलिङ्ग एकवचन — रूप ‘स्थापितवान्’। यदि कर्ता स्त्री होती तो ‘स्थापितवती’ आता।
‘पुरतः’ का प्रयोग: ‘पुरतः’ (सामने) के योग में षष्ठी होती है — इसीलिए ‘विग्रहस्य पुरतः’। यह भी एक उपपदविभक्ति ही है।
प्र3.
नेत्रे निमील्य प्रार्थनायाः आरम्भं करोति।
उत्तर

नेत्रे निमील्य प्रार्थनायाः आरम्भं कृतवान्। (हिन्दी — आँखें मूँदकर प्रार्थना का आरम्भ किया।)

करोति → √कृ + क्तवतु = कृतवत् → पुं. प्र. ए.व. = कृतवान्
ध्यान दें: ‘निमील्य’ ल्यबन्त अव्यय है — भूतकाल में बदलने पर भी वही रहेगा। ‘नेत्रे’ नपुंसकलिङ्ग द्विवचन है (दो आँखें) — यह भी नहीं बदलता। बदलती है केवल अन्तिम क्रिया।
प्र4.
गुरुः विसोबा तम् अध्यापयति।
उत्तर

गुरुः विसोबा तम् अध्यापितवान्। (हिन्दी — गुरु विसोबा ने उसे पढ़ाया।)

अध्यापयति → अधि + √इ (णिच् = अध्यापय्) + क्तवतु = अध्यापितवत् → पुं. प्र. ए.व. = अध्यापितवान्
णिजन्त धातु: ‘अधि + √इ’ का अर्थ है ‘पढ़ना’; उसमें णिच् (प्रेरणार्थक) जोड़ने पर अर्थ हो जाता है ‘पढ़ाना’। पाठ में ठीक यही रूप आया है — ‘विसोबा तम् अध्यापितवान्’।
प्र5.
अहं शृणोमि।
उत्तर

अहं श्रुतवान्। (यदि कर्ता स्त्री हो तो — अहं श्रुतवती।) (हिन्दी — मैंने सुना। / मैंने (स्त्री ने) सुना।)

शृणोमि → √श्रु + क्तवतु = श्रुतवत्
पुं. प्र. ए.व. → श्रुतवान् · स्त्री. प्र. ए.व. → श्रुतवती
ध्यान देने योग्य बात: ‘अहम्’ शब्द से कर्ता का लिङ्ग पता नहीं चलता — इसीलिए दोनों रूप शुद्ध हैं। पाठ में माधवी कहती है — ‘अहं श्रुतवती यत् …’, और कपिल कहता है — ‘अद्य अहं ज्ञातवान् …’। दोनों उदाहरण साथ रखने से भेद स्पष्ट हो जाता है।
Tip: उत्तरपुस्तिका में यदि आप छात्रा हैं तो ‘श्रुतवती’ लिखना अधिक स्वाभाविक है — क्तवतु-रूप कर्ता के लिङ्ग का अनुसरण करता है, क्रिया का नहीं।
प्र6.
सत्पुरुषाः स्वकर्तृत्वेन जन्म सार्थकं कुर्वन्ति।
उत्तर

सत्पुरुषाः स्वकर्तृत्वेन जन्म सार्थकं कृतवन्तः। (हिन्दी — सत्पुरुषों ने अपने कर्तृत्व से जन्म सार्थक किया।)

कुर्वन्ति → √कृ + क्तवतु = कृतवत् → पुं. प्र. बहुवचनम् = कृतवन्तः
वचन का ध्यान: कर्ता ‘सत्पुरुषाः’ बहुवचन है, अतः क्रिया भी बहुवचन में — ‘कृतवान्’ लिखना अशुद्ध होगा। पाठ में यही वाक्य है — ‘बहवः सत्पुरुषाः स्वीयकर्तृत्वेन जन्म सार्थकं कृतवन्तः।’
समास: स्वीयं कर्तृत्वम् = स्वीयकर्तृत्वम् (कर्मधारयः); तृतीया एकवचन में ‘स्वीयकर्तृत्वेन’ — यही अभ्यास प्रश्न ८ (झ) का उत्तर है।
प्र7.
नामदेवः शुनकस्य पृष्ठे अनुधावति।
उत्तर

नामदेवः शुनकस्य पृष्ठे अनुधावितवान्। (हिन्दी — नामदेव कुत्ते के पीछे दौड़े।)

अनुधावति → अनु + √धाव् + क्तवतु = अनुधावितवत् → पुं. प्र. ए.व. = अनुधावितवान्
उपसर्ग नहीं हटता: क्तवतु-रूप बनाते समय उपसर्ग (अनु) धातु के साथ ही रहता है — ‘धावितवान्’ नहीं, ‘अनुधावितवान्’। ‘धावितवान्’ का अर्थ केवल ‘दौड़ा’ होगा, जबकि ‘अनुधावितवान्’ = ‘पीछे-पीछे दौड़ा’ — यही यहाँ अभीष्ट है।
शब्दार्थ-तालिका से मेल: पुस्तक की तालिका में यही शब्द पहली पङ्क्ति में है — ‘अनुधावितवान् (अनु + √धाव् + क्तवतु, पुं.प्र.ए.व.) — पृष्ठतः अधावत् — पीछे दौड़ा — Chased’।
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