शारदा अध्याय 3 अभ्यासाद् जायते सिद्धिः

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
मातामही कस्य कथां श्रावितवती ?
उत्तर

मातामही महाराष्ट्रस्य प्रसिद्धस्य महात्मनः पुण्यश्लोकस्य नामदेवमहाराजस्य कथां श्रावितवती। (हिन्दी — नानी ने महाराष्ट्र के प्रसिद्ध महात्मा, पुण्यश्लोक नामदेवमहाराज की कथा सुनाई।)

नियम: प्रश्न ‘कस्य’ से पूछा गया है — यह षष्ठी विभक्ति, एकवचन है (सम्बन्धे षष्ठी)। अतः उत्तर भी षष्ठी में ही आना चाहिए — ‘नामदेवमहाराजस्य’, ‘नामदेवमहाराजः’ नहीं। पाठ का आधार-वाक्य — ‘तस्यैव पुण्यश्लोकस्य पाण्डुरङ्गमित्रस्य नामदेवमहाराजस्य एषा कथा।’
‘श्रावितवती’ का विश्लेषण: √श्रु के णिजन्त (प्रेरणार्थक) रूप ‘श्रावय्’ से क्तवतु — ‘श्रावितवती’ = सुनाया। स्त्रीलिङ्ग प्रथमा एकवचन, क्योंकि कर्ता ‘मातामही’ है।
प्र2.
नामदेवस्य गुरुः नामदेवं किम् अध्यापितवान् ?
उत्तर

नामदेवस्य गुरुः विसोबा नामदेवम् अध्यापितवान् यत् — ‘ईश्वरः न केवलं मन्दिरे भवति, अपि तु सर्वेषु भूतेषु तस्य निवासो भवति। अतः तस्य सर्वात्मकस्य ईश्वरस्य पूजनं कुरु’ इति। (हिन्दी — नामदेव के गुरु विसोबा ने नामदेव को यह पढ़ाया कि — ‘ईश्वर केवल मन्दिर में नहीं होता, अपितु सब प्राणियों में उसका निवास होता है। इसलिए उस सर्वात्मक ईश्वर की पूजा करो।’)

यही उपदेश कथा की धुरी है: गुरु का वाक्य नामदेव के लिए केवल सिद्धान्त नहीं रहा — कुत्ते के प्रसङ्ग में वे उसे आचरण में उतारते हैं। इसीलिए अन्त में पाण्डुरङ्ग कहते हैं — ‘गुरूपदेशं न केवलं भवान् श्रुतवान् अपि तु अनुपालितवान्’। यह वाक्य ‘सुनना’ और ‘पालन करना’ का भेद स्पष्ट कर देता है।
व्याकरण: ‘अध्यापितवान्’ = अधि + √इ (णिच्) + क्तवतु = पढ़ाया। इसका द्विकर्मक प्रयोग है — ‘नामदेवम्’ (गौण कर्म) तथा उपदेश (मुख्य कर्म) — इसीलिए प्रश्न में ‘नामदेवं किम्’ दोनों द्वितीया में हैं।
प्र3.
नामदेवः कया भावनया धावनं कृतवान् ?
उत्तर

नामदेवः करुणया (करुणाभावनया) धावनं कृतवान्। सः कोपेन न धावितवान्, प्रत्युत ‘शुनकस्य उदरवेदना मा भवतु’ इति चिन्तयन् घृतपात्रम् आदाय धावितवान्। (हिन्दी — नामदेव करुणा की भावना से दौड़े। वे क्रोध से नहीं दौड़े, बल्कि ‘कुत्ते के पेट में दर्द न हो’ ऐसा सोचते हुए घी का पात्र लेकर दौड़े।)

नियम: प्रश्न ‘कया’ से आरम्भ होता है — यह तृतीया विभक्ति, स्त्रीलिङ्ग, एकवचन है (करणे तृतीया)। इसलिए उत्तर भी तृतीया में — ‘करुणया’। ‘करुणा’ लिखना अशुद्ध होगा।
पाठ का वाक्य: ‘न हि बालौ! नामदेवः कोपेन न धावितवान्, प्रत्युत सः करुणया धावितवान्।’ — दोनों पदों में तृतीया है, और लेखक ने विरोध दिखाने के लिए ही उन्हें आमने-सामने रखा है।
प्र4.
बालकयोः मुखे किमर्थं म्लाने संजाते ?
उत्तर

अपराधभावनया बालकयोः मुखे म्लाने संजाते। यतः तौ अकारणम् एव शुनकं पाषाणखण्डेन ताडितवन्तौ, तस्य उपरि हसितवन्तौ च — नामदेवस्य कथां श्रुत्वा तौ स्वकीयम् अपराधं ज्ञातवन्तौ। (हिन्दी — अपराध-भावना से दोनों बालकों के मुख मुरझा गए। क्योंकि उन्होंने बिना कारण ही कुत्ते को पत्थर से मारा था और उस पर हँसे भी थे — नामदेव की कथा सुनकर उन्हें अपने अपराध का बोध हुआ।)

पाठ का सङ्केत: कोष्ठक में रङ्गसङ्केत है — (उभौ परस्परं पश्यतः। अपराधभावनया तयोः मुखे म्लाने आस्ताम्।) — अर्थात् यह भाव संवाद में कहा नहीं गया, दिखाया गया है। यह नाट्य-शैली की विशेषता है।
व्याकरण: ‘मुखे’ तथा ‘म्लाने’ दोनों नपुंसकलिङ्ग, प्रथमा, द्विवचन हैं (दो बालक = दो मुख)। ‘बालकयोः’ षष्ठी द्विवचन। विशेषण अपने विशेष्य के लिङ्ग-वचन-विभक्ति का अनुसरण करता है — यही कारण है कि ‘म्लाना’ या ‘म्लानम्’ नहीं, ‘म्लाने’ आया।
प्र5.
कपिलः माधवी च कं सङ्कल्पं कृतवन्तौ ?
उत्तर

कपिलः माधवी च इमं सङ्कल्पं कृतवन्तौ — ‘अस्माकं कायेन वाचा मनसा वा कस्यापि पीडा न भवेत्। तथैव कस्यापि या कापि पीडा स्यात् तां निवारयितुं प्रयतामहे’ इति। कपिलः पृथक् उक्तवान् — ‘कमपि न पीडयिष्यामि’, माधवी च — ‘कदापि कस्यापि पीडां न जनयिष्यामि’ इति। (हिन्दी — कपिल और माधवी ने यह सङ्कल्प किया कि — ‘हमारे शरीर, वाणी या मन से किसी को पीड़ा न हो। और वैसे ही किसी की जो भी पीड़ा हो, उसे दूर करने का हम प्रयत्न करें।’ कपिल ने अलग से कहा — ‘मैं किसी को नहीं सताऊँगा’, और माधवी ने — ‘मैं कभी किसी को पीड़ा नहीं दूँगी।’)

सङ्कल्पस्य द्वौ भागौ —
१. निषेधात्मकः — कायेन वाचा मनसा वा कस्यापि पीडा न भवेत् (किसी को दुःख न दें)
२. विधेयात्मकः — कस्यापि पीडां निवारयितुं प्रयतामहे (दूसरे का दुःख दूर भी करें)
क्यों दो भाग: केवल ‘नुकसान न पहुँचाना’ अहिंसा का आधा रूप है; दूसरा आधा है ‘दूसरे की पीड़ा दूर करना’ — और नामदेव ने यही दूसरा काम किया था। इसीलिए मातामही सङ्कल्प को दो भागों में कहती है, और उसके तुरन्त बाद ध्येय-वाक्य आता है।
प्र6.
‘तं दृष्ट्वा पाषाणखण्डं स्वीकृत्य मारयितुं धावितवन्तौ’ इति वाक्ये ‘तम्’ इति सर्वनामशब्दः कस्य कृते प्रयुक्तः ?
उत्तर

‘तम्’ इति सर्वनामशब्दः शुनकस्य कृते प्रयुक्तः। (हिन्दी — ‘तम्’ सर्वनाम शब्द कुत्ते के लिए प्रयुक्त हुआ है।)

कैसे जाना: इससे ठीक पहले का वाक्य है — ‘तत्र क्रीडावेलायां कञ्चन शुनकं दृष्टवन्तौ।’ सर्वनाम सदा अपने निकटतम पूर्ववर्ती संज्ञा (पूर्वापर-सङ्गति) का स्थान लेता है। यहाँ पूर्ववर्ती संज्ञा ‘शुनकम्’ है, अतः ‘तम्’ = ‘शुनकम्’।
व्याकरण: ‘तम्’ = तद्-शब्द, पुंलिङ्ग, द्वितीया विभक्ति, एकवचन — कर्मणि द्वितीया, क्योंकि ‘मारयितुं’ क्रिया का कर्म वही है। और ‘शुनकः’ पुंलिङ्ग है, इसीलिए ‘ताम्’ या ‘तत्’ नहीं, ‘तम्’ आया।
प्र7.
कपिलः माधवी च कुत्र गतवन्तौ ?
उत्तर

कपिलः माधवी च अवकाशकाले मातुलगृहं गतवन्तौ। (हिन्दी — कपिल और माधवी छुट्टी के समय मामा के घर गए।)

नियम: ‘कुत्र’ (कहाँ) का उत्तर स्थानवाचक पद से दिया जाता है। यहाँ गति-क्रिया (गतवन्तौ) का कर्म होने से ‘मातुलगृहम्’ द्वितीया में है — ‘कर्मणि द्वितीया’। ‘मातुलगृहे’ लिखना अशुद्ध होगा, क्योंकि जाने की क्रिया के साथ गन्तव्य द्वितीया में आता है।
समास: मातुलस्य गृहम् = मातुलगृहम् — षष्ठीतत्पुरुषः। यही अभ्यास प्रश्न ८ (छ) का उत्तर है।
प्र8.
‘मातामही तं प्रसङ्गं दृष्टवती, तौ आहूतवती च’। इति वाक्ये ‘तौ’ इति शब्दः कस्यां विभक्तौ अस्ति ?
उत्तर

‘तौ’ इति शब्दः द्वितीयायां विभक्तौ (पुंलिङ्गे, द्विवचने) अस्ति। (हिन्दी — ‘तौ’ शब्द द्वितीया विभक्ति में है — पुल्लिङ्ग, द्विवचन।)

विश्लेषणम् —
क्रियापदम् : आहूतवती (आ + √ह्वे + क्तवतु) — सकर्मकम्
कर्ता : मातामही (प्रथमा, ए.व.)
कर्म : तौ (= कपिलं माधवीं च) → कर्मणि द्वितीया, द्विवचनम्
तद्-शब्दः, पुंलिङ्गम् : सः – तौ – ते (प्रथमा) · तम् – तौ – तान् (द्वितीया)
ध्यान दें — रूप एक, विभक्ति दो: ‘तौ’ प्रथमा द्विवचन भी होता है और द्वितीया द्विवचन भी। भेद क्रिया से पहचानिए : यहाँ कर्ता ‘मातामही’ पहले ही आ चुका है और ‘आहूतवती’ स्त्रीलिङ्ग एकवचन है, अर्थात् ‘तौ’ कर्ता नहीं हो सकता — इसलिए वह कर्म है, और द्वितीया में है।
पुंलिङ्ग क्यों: कपिल (पुं.) और माधवी (स्त्री.) — दो भिन्न लिङ्गों के समुच्चय में संस्कृत में पुंलिङ्ग प्रयुक्त होता है। इसीलिए ‘ते’ नहीं, ‘तौ’।
प्र9.
नामदेवः पाण्डुरङ्गस्य कीदृशः आसीत् ? (पाठाधारितः अतिरिक्तः प्रश्नः)
उत्तर

नामदेवः पाण्डुरङ्गस्य न केवलं प्रियभक्तः, अपि तु प्रियमित्रम् अपि आसीत्। सः प्रतिदिनं पाण्डुरङ्गाय नैवेद्यं समर्प्य, तं भोजयित्वा, ततः परमेव अन्नं सेवते स्म। देवः अपि तं परितः भवति स्म। (हिन्दी — नामदेव पाण्डुरङ्ग के केवल प्रिय भक्त ही नहीं, प्रिय मित्र भी थे। वे प्रतिदिन पाण्डुरङ्ग को नैवेद्य अर्पित करके, उन्हें भोजन कराकर, उसके बाद ही स्वयं अन्न ग्रहण करते थे। भगवान् भी उनके चारों ओर रहते थे।)

‘ततः परमेव’ का महत्त्व: यह छोटा-सा शब्द नामदेव की भक्ति की गहराई बता देता है — भगवान् को खिलाए बिना वे स्वयं नहीं खाते थे। भक्ति यहाँ कर्मकाण्ड नहीं, दैनिक जीवन का नियम है। इसी नियम का पालन उस दिन भी हुआ जब रोटी कुत्ता ले भागा।
प्र10.
शुनकस्य स्थाने आविर्भूतः पाण्डुरङ्गः नामदेवं किम् उक्तवान् ? (पाठाधारितः अतिरिक्तः प्रश्नः)
उत्तर

पाण्डुरङ्गः नामदेवम् उक्तवान् — ‘वत्स नामदेव ! उत्तीर्णः भवान् परीक्षाम्। ‘‘ईश्वरः सर्वेषु भूतेषु निवसति’’ इति गुरूपदेशं न केवलं भवान् श्रुतवान् अपि तु अनुपालितवान्। सुतरां धन्यो भवान्।’ (हिन्दी — पाण्डुरङ्ग ने नामदेव से कहा — ‘बेटा नामदेव! तुम परीक्षा में उत्तीर्ण हुए। ‘ईश्वर सब प्राणियों में बसता है’ — इस गुरु-उपदेश को तुमने केवल सुना ही नहीं, अपितु उसका पालन भी किया। इसलिए तुम धन्य हो।’)

‘परीक्षा’ शब्द पर ध्यान दीजिए: कुत्ते का रोटी ले भागना दुर्घटना नहीं, परीक्षा थी — और परीक्षा भोजन की नहीं, दृष्टि की थी : क्या नामदेव कुत्ते में भी वही ईश्वर देख पाएँगे जिसकी मूर्ति के सामने वे प्रार्थना कर रहे थे ? उन्होंने कुत्ते को ‘हे देव!’ कहकर पुकारा — यही उनका उत्तीर्ण होना है।
व्याकरण: ‘उत्तीर्णः भवान् परीक्षाम्’ — ‘परीक्षाम्’ द्वितीया में है, क्योंकि ‘उत्तीर्ण’ (उत् + √तॄ) कर्मवाची क्रिया-विशेषण है — ‘परीक्षा को पार कर गए’। ‘भवान्’ आदरार्थक प्रथमपुरुष है, अतः क्रिया भी प्रथमपुरुष एकवचन में आती है।
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