शारदा अध्याय 3 अभ्यासाद् जायते सिद्धिः

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
यथा — ‘हे देव ! शुष्कां रोटिकां न खादतु घृतमपि स्वीकरोतु।’ → नामदेवः — शुनकम्
उत्तर

यह प्रश्न कथन का वक्ता (कः/का) तथा श्रोता (कं/कां) पहचानने का है। (हिन्दी — कौन बोल रहा है और किससे बोल रहा है, यह बताना है।)

उत्तर लिखने का ढाँचा —
वक्ता → प्रथमा विभक्ति (कः / का)
श्रोता → द्वितीया विभक्ति (कं / कां) — यतः ‘प्रति’ शब्दस्य योगे द्वितीया भवति
उदाहरण की व्याख्या: ‘हे देव! शुष्कां रोटिकां मा खादतु, घृतम् अपि स्वीकरोतु’ — यह वाक्य नामदेव ने भागते हुए कुत्ते से कहा था। ध्यान दीजिए कि उन्होंने कुत्ते को ‘हे देव’ कहकर पुकारा — यही पूरे पाठ का सार है, और इसीलिए पुस्तक ने यही वाक्य उदाहरण के लिए चुना है।
ध्यान दें: श्रोता का नाम सदा द्वितीया में लिखिए — ‘शुनकः’ नहीं, ‘शुनकम्’; ‘मातामही’ नहीं, ‘मातामहीम्’।
प्र2.
कथां श्रोतुम् इच्छतः वा ?
उत्तर

मातामही — कपिलं माधवीं च (उभौ बालकौ) (हिन्दी — नानी — कपिल और माधवी से।)

कैसे पहचाना: पूरा वाक्य है — ‘वत्सौ, अधुना क्रीडया अलम्। कथां श्रोतुम् इच्छतः वा?’ — क्रिया ‘इच्छतः’ मध्यमपुरुष का नहीं, प्रथमपुरुष द्विवचन रूप है और सम्बोधन ‘वत्सौ’ द्विवचन है — अर्थात् सुनने वाले दो हैं। सम्बोधन ‘वत्सौ’ मातामही ही करती हैं।
प्र3.
अहं श्रुतवती यत् तस्य कीर्तने स्वयं देवः पाण्डुरङ्गः नृत्यं कृतवान् इति।
उत्तर

माधवी — मातामहीम् (हिन्दी — माधवी — नानी से।)

निर्णायक सङ्केत:श्रुतवती’ — क्तवतु का स्त्रीलिङ्ग रूप है, अतः वक्ता स्त्री ही होगी। संवाद में उस समय दो स्त्रियाँ हैं — मातामही और माधवी। किन्तु यह उत्तर मातामही के प्रश्न ‘किं भवन्तौ महात्मानं नामदेवं जानीतः?’ का है, अतः वक्ता माधवी और श्रोता मातामही।
Tip: इस प्रकार के प्रश्नों में सबसे पहले क्रिया का लिङ्ग-वचन देखिए — वही आधा उत्तर दे देता है।
प्र4.
किं देवेन सह अपि मित्रता सम्भवति ?
उत्तर

कपिलः — मातामहीम् (हिन्दी — कपिल — नानी से।)

सन्दर्भ: माधवी पूछती है — ‘किं सत्यमेव नामदेवस्य मित्रम् आसीत् पाण्डुरङ्गः?’ और उसके तुरन्त बाद कपिल अपना सन्देह जोड़ता है — ‘किं देवेन सह अपि मित्रता सम्भवति?’ दोनों प्रश्न मातामही से ही पूछे गए हैं, क्योंकि कथा वही सुना रही हैं।
व्याकरण: ‘देवेन सह’ — सह-योगे तृतीया विभक्तिः।
प्र5.
अतः तस्य सर्वात्मकस्य ईश्वरस्य पूजनं कुरु।
उत्तर

(गुरुः) विसोबा — नामदेवम् (हिन्दी — गुरु विसोबा — नामदेव से।)

सन्दर्भ: मातामही उद्धरण देकर कहती है — ‘तस्य गुरुः आसीत् विसोबा। विसोबा तम् अध्यापितवान् यत् ‘‘ईश्वरः न केवलं मन्दिरे भवति … अतः तस्य सर्वात्मकस्य ईश्वरस्य पूजनं कुरु’’ इति।’ — अर्थात् यह वाक्य कथा के भीतर की कथा है : बोलने वाले गुरु विसोबा हैं, सुनने वाले नामदेव।
ध्यान दें: ‘कुरु’ लोट्-लकार, मध्यमपुरुष एकवचन है — अर्थात् आदेश एक ही व्यक्ति को दिया गया है, गुरु का शिष्य को।
प्र6.
नैवेद्यं गृह्यतां देव भक्तिं मे ह्यचलां कुरु।
उत्तर

नामदेवः — पाण्डुरङ्गम् (देवं विग्रहरूपिणम्) (हिन्दी — नामदेव — भगवान् पाण्डुरङ्ग से।)

सन्दर्भ: ‘एकदा सः नैवेद्यस्थालिकां गृहीत्वा विग्रहस्य पुरतः स्थापितवान्। नेत्रे निमील्य प्रार्थनां कृतवान् —’ इसके बाद यही श्लोक आता है। सम्बोधन ‘देव’ (हे देव!) स्वयं बता देता है कि श्रोता भगवान् हैं।
व्याकरण: ‘गृह्यताम्’ तथा ‘प्रतिगृह्यताम्’ कर्मवाच्य लोट्-लकार के रूप हैं (‘ग्रहण किया जाए’) — प्रार्थना में विनम्रता दिखाने के लिए कर्मवाच्य का प्रयोग होता है।
प्र7.
धिक् शुनकम्।
उत्तर

कपिलः — मातामहीम् (शुनकं प्रति निन्दां प्रकटयन्) (हिन्दी — कपिल — नानी से (कुत्ते की निन्दा करते हुए)।)

दो बातें अलग-अलग हैं: निन्दा कुत्ते की है, पर वाक्य मातामही से कहा गया है — पूरा कथन है : ‘धिक् शुनकम्! मातामहि! पश्यतु, शुनकाः दुष्टाः एव भवन्ति।’ सम्बोधन ‘मातामहि’ स्पष्ट कर देता है कि श्रोता कौन है। अतः उत्तर — कपिलः — मातामहीम्।
व्याकरण: ‘धिक्’ निन्दावाचक अव्यय है; धिक्-योगे द्वितीया विभक्तिः — इसीलिए ‘शुनकः’ नहीं, ‘शुनकम्’।
प्र8.
नामदेवस्य कियत् दुःखं जातं स्यात् खलु ?
उत्तर

माधवी — कपिलम् (भ्रातरम्) (हिन्दी — माधवी — अपने भाई कपिल से।)

निर्णायक सङ्केत: पूरा कथन है — ‘सत्यं भ्रातः! नामदेवस्य कियत् दुःखं जातं स्यात् खलु।’ सम्बोधन ‘भ्रातः’ (हे भाई!) सीधे बता देता है कि माधवी अपने भाई कपिल से बोल रही है, मातामही से नहीं।
ध्यान दें: इस पूरे प्रश्न में यही एकमात्र कथन है जो एक बालक दूसरे बालक से कहता है — शेष सब संवाद मातामही से जुड़े हैं। सम्बोधन-पद ही उत्तर की कुंजी है।
प्र9.
किं घृतपात्रम् आधृत्य ?
उत्तर

उभौ (कपिलः माधवी च) — मातामहीम् (हिन्दी — दोनों (कपिल और माधवी) — नानी से।)

पाठ का सङ्केत: वक्ता के स्थान पर पुस्तक में ‘उभावपि’ लिखा है और कोष्ठक में रङ्गसङ्केत — (साश्चर्यम् उच्चैः) — अर्थात् दोनों एक साथ आश्चर्य से ज़ोर से बोल उठे। इसलिए वक्ता एक नहीं, दो हैं।
Tip: उत्तर में ‘उभौ’ या ‘कपिलः माधवी च’ — दोनों में से कुछ भी लिख सकते हैं, पर द्विवचन का बोध अवश्य रहना चाहिए।
प्र10.
अद्य अहं ज्ञातवान् यत् सर्वेषु ईश्वरः निवसति इति।
उत्तर

कपिलः — मातामहीम् (हिन्दी — कपिल — नानी से।)

निर्णायक सङ्केत:ज्ञातवान्’ क्तवतु का पुंलिङ्ग रूप है, अतः वक्ता पुरुष — कपिल। और कथन का आरम्भ ही ‘मातामहि! अहं प्रमादं कृतवान्’ से होता है, अतः श्रोता मातामही।
भाव: यह वाक्य कपिल के हृदय-परिवर्तन की घोषणा है — कथा सुनकर वह वही बात जान लेता है जो नामदेव ने गुरु से सीखी थी। पूरी कथा का प्रभाव इसी एक वाक्य में दिखता है।
प्र11.
उत्तीर्णः भवान् परीक्षाम्।
उत्तर

पाण्डुरङ्गः (देवः) — नामदेवम् (हिन्दी — भगवान् पाण्डुरङ्ग — नामदेव से।)

सन्दर्भ: ‘धावन् शुनकः अदृश्यः जातः। तस्य स्थाने पाण्डुरङ्गः आविर्भूतः। स नामदेवम् उक्तवान् — ‘‘वत्स नामदेव! उत्तीर्णः भवान् परीक्षाम्।’’’ — सम्बोधन में ही श्रोता का नाम है।
व्याकरण: ‘भवान्’ आदरसूचक सर्वनाम है और प्रथमपुरुष में चलता है — इसीलिए ‘उत्तीर्णः भवान्’, ‘उत्तीर्णः त्वम्’ नहीं। भगवान् भी भक्त को आदर से सम्बोधित करते हैं — यही इस मित्रता की मिठास है।
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