शारदा अध्याय 3 अभ्यासाद् जायते सिद्धिः

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
घटनाक्रमानुसारं लिखत — (क) नामदेवः मन्त्रम् उच्चार्य श्रद्धया प्रणम्य नेत्रे उद्घाटितवान्। (ख) नामदेवः घृतपात्रम् आधृत्य अनुधावितवान्। (ग) नामदेवः नैवेद्यस्थालिकां विग्रहस्य पुरतः स्थापितवान्। (घ) शुनकः शुष्करोटिकाम् अपहृत्य पलायितवान्। (ङ) शुनकस्य स्थाने पाण्डुरङ्गः आविर्भूतवान्। (च) नामदेवः मन्दिरं गतवान्।
उत्तर

शुद्धः घटनाक्रमः — (च) → (ग) → (क) → (घ) → (ख) → (ङ)

क्रमःपुस्तकस्य वर्णःघटनाहिन्दी
१.(च)नामदेवः मन्दिरं गतवान्।नामदेव मन्दिर गए।
२.(ग)नामदेवः नैवेद्यस्थालिकां विग्रहस्य पुरतः स्थापितवान्।नैवेद्य की थाली मूर्ति के सामने रखी।
३.(क)नामदेवः मन्त्रम् उच्चार्य श्रद्धया प्रणम्य नेत्रे उद्घाटितवान्।मन्त्र बोलकर, प्रणाम करके आँखें खोलीं।
४.(घ)शुनकः शुष्करोटिकाम् अपहृत्य पलायितवान्।कुत्ता सूखी रोटी लेकर भाग गया।
५.(ख)नामदेवः घृतपात्रम् आधृत्य अनुधावितवान्।नामदेव घी का पात्र लेकर पीछे दौड़े।
६.(ङ)शुनकस्य स्थाने पाण्डुरङ्गः आविर्भूतवान्।कुत्ते के स्थान पर पाण्डुरङ्ग प्रकट हुए।
क्रम कैसे तय किया: पहचान का सूत्र है कारण-कार्य शृङ्खला — मन्दिर पहुँचे तभी थाली रख सके; थाली रखी तभी प्रार्थना की; आँखें खोलीं तभी पता चला कि रोटी नहीं है (अर्थात् कुत्ता उससे पहले ही ले जा चुका था, पर कथा में वह घटना यहीं खुलती है); रोटी गई तभी पीछे दौड़े; दौड़े तभी भगवान् प्रकट हुए।
ध्यान दें (घ) की स्थिति: कुत्ता रोटी उस समय ले गया जब नामदेव आँखें मूँदे प्रार्थना कर रहे थे। किन्तु कथा में यह बात (क) के बाद ही प्रकट होती है — ‘पुरतः स्थितायां स्थालिकायां रोटिका नासीत्’। इसलिए कथा-क्रम में (घ) को (क) के बाद ही रखा जाता है। यही पुस्तक की कथन-शैली है।
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