शारदा अध्याय 3 अभ्यासाद् जायते सिद्धिः

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
यथा — महान् आत्मा, तेषां → महात्मनाम्
उत्तर

इस प्रश्न में विग्रह दिया है और पाठ में से समस्तपद ढूँढ़कर लिखना है — साथ ही जिस विभक्ति का सङ्केत (तेषां, तत्, तम्, तया, तेन) दिया है, उसी विभक्ति में लिखना है।

महान् आत्मा = महात्मा (कर्मधारयः)
‘तेषाम्’ इति सङ्केतात् → षष्ठी बहुवचनम् → महात्मनाम्
पाठे — ‘भारतदेशः बहूनां ब्रह्मर्षीणां महात्मनां च भूमिः।’
दो काम एक साथ: (१) समास बनाइए, (२) सङ्केत-शब्द के अनुसार विभक्ति लगाइए। ‘तेषाम्’ = षष्ठी बहुवचन, ‘तत्/तम्’ = द्वितीया एकवचन, ‘तया’ = तृतीया एकवचन स्त्रीलिङ्ग, ‘तेन’ = तृतीया एकवचन। यदि सङ्केत न दिया हो तो प्रथमा में लिखिए।
प्र2.
घृतस्य पात्रम्, तत्
उत्तर

घृतपात्रम् (हिन्दी — घी का पात्र) — षष्ठीतत्पुरुषः; ‘तत्’ इति सङ्केतात् नपुंसकलिङ्गे द्वितीया एकवचनम्।

समास क्यों षष्ठीतत्पुरुष: विग्रह में ‘घृतस्य’ षष्ठी विभक्ति में है और वही लुप्त होकर समास बना — यही षष्ठीतत्पुरुष का लक्षण है।
पाठ का वाक्य: ‘न लगुडं, न पाषाणखण्डम्, अपि तु घृतपात्रं धृत्वा।’ तथा ‘… चिन्तयन् घृतपात्रम् आदाय’।
प्र3.
पाषाणस्य खण्डः, तम्
उत्तर

पाषाणखण्डम् (हिन्दी — पत्थर का टुकड़ा) — षष्ठीतत्पुरुषः; द्वितीया एकवचनम्।

पाठ का वाक्य: ‘तं दृष्ट्वा पाषाणखण्डं हस्ते स्वीकृत्य तं मारयितुं धावितवन्तौ।’ शब्दार्थ-तालिका में भी यही शब्द है — ‘पाषाणखण्डम् (पुं.द्वि.ए.व.) — शिलाखण्डम् — पत्थर का टुकड़ा’।
प्र4.
प्रियः सुहृद्
उत्तर

प्रियसुहृद् (हिन्दी — प्रिय मित्र) — कर्मधारयः (विशेषण-पूर्वपद कर्मधारय)।

कर्मधारय क्यों: यहाँ ‘प्रियः’ विशेषण है और ‘सुहृद्’ विशेष्य — दोनों एक ही विभक्ति (प्रथमा) में हैं। जब समास के दोनों पद समान विभक्ति में हों और एक दूसरे का विशेषण हो, तब कर्मधारय होता है, तत्पुरुष नहीं।
पाठ का वाक्य: ‘देवः पाण्डुरङ्गः नामदेवस्य प्रियसुहृद् आसीत्।’ (पुस्तक में सन्धि सहित — ‘प्रियसुहृदासीत्’।)
प्र5.
उदरे वेदना
उत्तर

उदरवेदना (हिन्दी — पेट का दर्द) — सप्तमीतत्पुरुषः

सप्तमी क्यों: विग्रह में ‘उदर’ सप्तमी विभक्ति में है (अधिकरणे सप्तमी — ‘पेट में होने वाली पीड़ा’), और वही लुप्त होकर समास बना।
पाठ का वाक्य: ‘यदि शुनकः शुष्करोटिकां खादेत् तर्हि तस्य उदरवेदना भवेत् इति।’ — यही चिन्ता नामदेव को दौड़ाती है।
प्र6.
स्वीयः व्यवहारः
उत्तर

स्वीयव्यवहारः (हिन्दी — अपना व्यवहार) — कर्मधारयः

पाठ का वाक्य: ‘नामदेवमहाराजः स्वीयव्यवहारेण करुणायाः महान्तम् आदर्शम् उपस्थापितवान्।’ (वहाँ तृतीया एकवचन में है — करणे तृतीया।)
प्र7.
जीवनस्य मूल्यानि
उत्तर

जीवनमूल्यानि (हिन्दी — जीवन-मूल्य) — षष्ठीतत्पुरुषः; नपुंसकलिङ्गे प्रथमा बहुवचनम्।

पाठ का वाक्य: ‘तेषां चरित्रेषु प्रतिपदं भूतदया, समता, क्षमा, अहिंसा, करुणा, ऋजुता, बन्धुता चेत्यादीनि जीवनमूल्यानि प्राप्यन्ते।’
प्र8.
मातुलस्य गृहम्, तत्
उत्तर

मातुलगृहम् (हिन्दी — मामा का घर) — षष्ठीतत्पुरुषः; द्वितीया एकवचनम्।

पाठ का वाक्य: ‘कपिलः माधवी च अवकाशकाले मातुलगृहं गतवन्तौ।’ यही अभ्यास प्रश्न १ (छ) का भी उत्तर है।
प्र9.
नरेषु रत्नानि इव, तेषाम्
उत्तर

नररत्नानाम् (हिन्दी — नर-रत्नों का, मनुष्यों में रत्न के समान श्रेष्ठ पुरुषों का) — उपमितसमासः (कर्मधारयस्य भेदः); षष्ठी बहुवचनम्।

उपमितसमास क्या है: जब उपमेय (नराः) पहले आए और उपमान (रत्नानि) बाद में, तथा ‘इव’ लुप्त हो जाए — तब उपमितसमास होता है। जैसे — पुरुषः व्याघ्रः इव = पुरुषव्याघ्रः। यह कर्मधारय समास का ही एक भेद है।
पाठ का वाक्य: ‘अस्माकं भारतभूमिः अनेकेषां नररत्नानां ब्रह्मर्षीणां राजर्षीणां च प्रसवित्री।’
प्र10.
स्वीयं कर्तृत्वम्, तेन
उत्तर

स्वीयकर्तृत्वेन (हिन्दी — अपने कर्तृत्व से) — कर्मधारयः; तृतीया एकवचनम् (करणे तृतीया)।

पाठ का वाक्य: ‘बहवः सत्पुरुषाः स्वीयकर्तृत्वेन जन्म सार्थकं कृतवन्तः।’ अभ्यास प्रश्न २ (ङ) में यही वाक्य ‘स्वकर्तृत्वेन’ रूप में आया है — दोनों शुद्ध हैं।
प्र11.
अपराधस्य भावना, तया
उत्तर

अपराधभावनया (हिन्दी — अपराध-भावना से) — षष्ठीतत्पुरुषः; स्त्रीलिङ्गे तृतीया एकवचनम्।

पाठ का वाक्य: रङ्गसङ्केत में — (उभौ परस्परं पश्यतः। अपराधभावनया तयोः मुखे म्लाने आस्ताम्।) यही अभ्यास प्रश्न १ (घ) का उत्तर भी है।
प्र12.
गुरोः उपदेशः, तम्
उत्तर

गुरूपदेशम् (हिन्दी — गुरु का उपदेश) — षष्ठीतत्पुरुषः; द्वितीया एकवचनम्।

सन्धिः — गुरु + उपदेशः → गुरूपदेशः
नियमः : सवर्णदीर्घ-सन्धिः — उ + उ = ऊ (‘अकः सवर्णे दीर्घः’)
पाठ का वाक्य: ‘‘‘ईश्वरः सर्वेषु भूतेषु निवसति’’ इति गुरूपदेशं न केवलं भवान् श्रुतवान् अपि तु अनुपालितवान्।’ — यहाँ समास के साथ-साथ सन्धि भी परखी जा रही है, इसलिए ‘गुरुउपदेशम्’ लिखना अशुद्ध होगा।
प्र13.
दिने दिने
उत्तर

प्रतिदिनम् (हिन्दी — प्रतिदिन, हर दिन) — अव्ययीभावः

अव्ययीभाव क्यों: जिस समास का पूर्वपद अव्यय हो और पूरा समस्तपद अव्यय बन जाए, वह अव्ययीभाव है। ‘प्रति’ अव्यय है और ‘प्रतिदिनम्’ के रूप नहीं चलते — वह सदा इसी रूप में रहता है। ‘वीप्सा’ (पुनरावृत्ति) के अर्थ में ‘प्रति’ का यही प्रयोग होता है।
पाठ के वाक्य: ‘नामदेवः प्रतिदिनं पाण्डुरङ्गाय नैवेद्यं समर्प्य …’ तथा ‘नामदेवः प्रतिदिनम् अतीवश्रद्धया निष्ठया भक्त्या च नैवेद्यस्थालिकाम् आदाय मन्दिरं गच्छति स्म।’
प्र14.
राजा ऋषिः इव, तेषाम्
उत्तर

राजर्षीणाम् (हिन्दी — राजर्षियों का, ऋषि के समान राजाओं का) — उपमितसमासः (कर्मधारयस्य भेदः); षष्ठी बहुवचनम्।

सन्धिः — राज + ऋषि → राजर्षि
नियमः : गुणसन्धिः — अ + ऋ = अर् (‘आद्गुणः’)
तथा च — ब्रह्मन् + ऋषि → ब्रह्मर्षि (उसी नियम से)
पाठ का वाक्य: ‘अस्माकं भारतभूमिः अनेकेषां नररत्नानां ब्रह्मर्षीणां राजर्षीणां च प्रसवित्री।’ — ध्यान दीजिए, इसी एक वाक्य से इस प्रश्न के तीन उत्तर (ज, ड तथा शब्दार्थ का ‘ब्रह्मर्षीणाम्’) निकलते हैं।
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