शारदा अध्याय 3 पाठ-प्रवेशः

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
पाठस्य आरम्भिकं गद्यांशम् अन्वयेन सह व्याख्यात — “भारतदेशः बहूनां ब्रह्मर्षीणां महात्मनां च भूमिः … यां पठित्वा अस्माकं जीवनं परिवर्तितं भवेत्।”
उत्तर
भारतदेशः बहूनां ब्रह्मर्षीणां महात्मनां च भूमिः। तेषां चरित्राणि सकलस्य विश्वस्य कृते प्रेरणास्पदम्।
तेषां चरित्रेषु प्रतिपदं भूतदया, समता, क्षमा, अहिंसा, करुणा, ऋजुता, बन्धुता चेत्यादीनि जीवनमूल्यानि प्राप्यन्ते।
महाराष्ट्रस्य प्रसिद्धः महात्मा नामदेवमहाराजः स्वीयव्यवहारेण करुणायाः महान्तम् आदर्शम् उपस्थापितवान्।
सः सर्वात्मकस्य ईश्वरस्य न केवलं सङ्कीर्तनं कृतवान् अपि तु सर्वेषु जीवेषु सः भगवन्तं दृष्टवान्।

हिन्दी अर्थ — भारतदेश बहुत-से ब्रह्मर्षियों और महात्माओं की भूमि है। उनके चरित्र सारे विश्व के लिए प्रेरणा के स्थान हैं। उनके चरित्रों में पद-पद पर भूतदया, समता, क्षमा, अहिंसा, करुणा, ऋजुता, बन्धुता आदि जीवनमूल्य मिलते हैं। महाराष्ट्र के प्रसिद्ध महात्मा नामदेवमहाराज ने अपने व्यवहार से करुणा का महान् आदर्श उपस्थित किया। उन्होंने सर्वात्मक (सबमें व्याप्त) ईश्वर का केवल सङ्कीर्तन ही नहीं किया, अपितु सब जीवों में उन्होंने भगवान् को देखा। नामदेवमहाराज के जीवन की एक शिक्षाप्रद घटना यहाँ दिखाई गई है, जिसे पढ़कर हमारा जीवन बदल जाना चाहिए।

पदम्व्याकरण-सङ्केतःअर्थः
ब्रह्मर्षीणाम्ब्रह्मन् + ऋषि → ब्रह्मर्षि (गुण-सन्धिः); पुं., षष्ठी, बहुवचनम्ब्रह्मज्ञानी ऋषियों का
प्रेरणास्पदम्प्रेरणायाः आस्पदम् — षष्ठीतत्पुरुषः; नपुं., प्रथमा, ए.व.प्रेरणा का स्थान
प्रतिपदम्पदे पदे — अव्ययीभावःपद-पद पर, हर जगह
स्वीयव्यवहारेणस्वीयः व्यवहारः — कर्मधारयः; पुं., तृतीया, ए.व. (करणे तृतीया)अपने व्यवहार से
उपस्थापितवान्उप + √स्था (णिच्) + क्तवतु, पुं., प्र., ए.व.उपस्थित किया
दृष्टवान्√दृश् + क्तवतु, पुं., प्र., ए.व.देखा
भावः: गद्यांश का केन्द्रीय शब्द है ‘सर्वात्मकस्य’ — जो सब आत्माओं में व्याप्त है। लेखक ‘सङ्कीर्तनं कृतवान्’ और ‘भगवन्तं दृष्टवान्’ में सूक्ष्म भेद रखता है : भक्ति का नाम लेना सरल है, हर प्राणी में भगवान् को देख लेना कठिन। नामदेव की महत्ता इसी दूसरी बात में है — और आगे की पूरी कथा इसी एक वाक्य का विस्तार है।
ध्यान दें: ‘न केवलं … अपि तु …’ यह युग्म पूरे पाठ में तीन बार आता है — यहाँ, ‘न केवलं पाण्डुरङ्गस्य प्रियभक्तः अपि तु प्रियमित्रमपि’ में, तथा ‘ईश्वरः न केवलं मन्दिरे भवति, अपि तु सर्वेषु भूतेषु’ में। यह पाठ की शैलीगत विशेषता है।
प्र2.
कथायाः प्रारम्भे कपिलः माधवी च किम् अकुरुताम् ? — “कपिलः माधवी च अवकाशकाले मातुलगृहं गतवन्तौ … मातामही तं प्रसङ्गं दूरात् दृष्टवती, तौ आहूतवती च।”
उत्तर

कपिलः माधवी च अवकाशकाले मातुलगृहं गतवन्तौ। तत्र क्रीडावेलायां कञ्चन शुनकं दृष्टवन्तौ। तं दृष्ट्वा पाषाणखण्डं हस्ते स्वीकृत्य तं मारयितुं धावितवन्तौ। शुनकः भयेन आक्रोशं कुर्वन् वेगेन धावितवान्। तत् दृष्ट्वा कपिलः माधवी च उच्चैः हसितवन्तौ। (हिन्दी — कपिल और माधवी छुट्टी के समय मामा के घर गए। वहाँ खेल के समय उन्होंने एक कुत्ता देखा। उसे देखकर हाथ में पत्थर का टुकड़ा लेकर उसे मारने के लिए दौड़े। कुत्ता डर से चिल्लाता हुआ तेज़ी से भागा। यह देखकर कपिल और माधवी ज़ोर से हँसे।)

घटनापाठस्य पदम्क्तवतु-रूपम्
मामा के घर जानामातुलगृहं गतवन्तौ√गम् + क्तवतु, पुं., प्र., द्विवचनम्
कुत्ता देखनाशुनकं दृष्टवन्तौ√दृश् + क्तवतु, द्विवचनम्
मारने दौड़नामारयितुं धावितवन्तौ√धाव् + क्तवतु, द्विवचनम्
हँसनाउच्चैः हसितवन्तौ√हस् + क्तवतु, द्विवचनम्
मातामही का देखना-बुलानादृष्टवती, आहूतवतीक्तवतु, स्त्री., प्र., एकवचनम्
क्यों यह अंश महत्त्वपूर्ण है: यह छोटा-सा अनुच्छेद पूरे पाठ की भूमिका है। बच्चों ने बिना कारण एक जीव को पीड़ा दी और उस पर हँसे भी — ठीक इसी व्यवहार के विरुद्ध आगे नामदेव का आचरण रखा गया है। कथा के अन्त में यही दोनों बच्चे कहते हैं — ‘अकारणं हि शुनकं ताडितवान्’ — अर्थात् कथा ने उन्हें बदल दिया।
व्याकरण-सङ्केत: ‘तौ आहूतवती च’ में ‘तौ’ द्वितीया विभक्ति, द्विवचनम् है (कर्मणि द्वितीया) — यही अभ्यास के प्रश्न १ (ज) का उत्तर है।
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