शारदा अध्याय 3 सर्वं शब्देन भासते

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
‘सर्वं शब्देन भासते’ इति सारण्यां रिक्तं ‘मातृभाषया अर्थं लिखत’ इति स्तम्भं पूरयत।
उत्तर

पुस्तक में अन्तिम स्तम्भ जान-बूझकर खाली छोड़ा गया है — विद्यार्थी को अपनी मातृभाषा में अर्थ लिखना है। यहाँ वह स्तम्भ हिन्दी (इस पुस्तक की माध्यम-भाषा) में भरा गया है, और अर्थ को केवल शब्द नहीं, प्रसङ्ग-सहित दिया गया है ताकि प्रयोग समझ में आए। जिनकी मातृभाषा मराठी, गुजराती, बाङ्ला, तमिळ आदि है, वे इसी ढंग से अपनी भाषा में लिखें।

शब्दःअर्थः (संस्कृतम्)हिन्दीEnglishमातृभाषया अर्थं लिखत (हिन्दी)
अनुधावितवान् (अनु + √धाव् + क्तवतु, पुं.प्र.ए.व.)पृष्ठतः अधावत्पीछे दौड़ाChasedकिसी के पीछे-पीछे दौड़ा — जैसे नामदेव कुत्ते के पीछे दौड़े
अनुपालितवान् (अनु + √पाल् + क्तवतु, पुं.प्र.ए.व.)अनुसरणम् अकरोत्पालन कियाFollowedकहे हुए पर चला, उपदेश को जीवन में उतारा
अपहृत्य (अप + √हृ + ल्यप्, अव्ययम्)चोरयित्वाचुराकरHaving stolenछीनकर / उठा ले जाकर
आविर्भूतवान् (आविस् + √भू + क्तवतु, पुं.प्र.ए.व.)प्रत्यक्षीभूतःप्रकट हुएAppearedसामने प्रकट हो गए, दिखाई पड़े
आलिङ्गनं कृतवन्तौ (√कृ + क्तवतु, पुं.प्र.द्वि.व.)आश्लिष्टौदोनों गले मिलेHuggedदोनों ने गले लगा लिया
ऋजुता (स्त्री.प्र.ए.व.)सरलतासीधापनSimplicityसरल-स्वभाव, कपट का न होना
करुणया (स्त्री.तृ.ए.व.)दययादया सेWith mercyदया-भाव से, तरस खाकर
कायः (पुं.प्र.ए.व.)देहःशरीरBodyदेह, तन (‘कायेन वाचा मनसा’ = तन, वाणी और मन से)
घृतम् (नपुं.प्र.ए.व.)हविःघीClarified butterघी
दण्डितवन्तौ (√दण्ड् + क्तवतु, पुं.प्र.द्वि.व.)दण्डं दत्तवन्तौदण्ड दियाPunishedदोनों ने सज़ा दी
नैवेद्यम् (नपुं.प्र.ए.व.)देवाय समर्पयितुं निर्मितः पदार्थःभोगOffering to Godभगवान् को अर्पित किया जाने वाला भोजन, भोग
निकषा (अव्ययम्)समीपेपासNearपास, निकट (‘मां निकषा आगच्छताम्’ = मेरे पास आओ)
निमील्य (नि + √मिल् + ल्यप्)पिधायबंद करकेHaving closed(आँखें) मूँदकर
पाषाणखण्डम् (पुं.द्वि.ए.व.)शिलाखण्डम्पत्थर का टुकड़ाPiece of Stoneपत्थर का टुकड़ा, ढेला
पुण्यश्लोकः (पुं.प्र.ए.व.)पुण्यः श्लोकः (चरितं) यस्य सःपवित्र चरित्रवालाVirtuous characterजिसका यश पवित्र है, पुण्य-कीर्ति वाला
प्रसवित्री (स्त्री.प्र.ए.व.)जनयित्रीजन्म देने वालीOne who gives birthजन्म देने वाली, जननी
ब्रह्मर्षीणाम् (पुं.ष.ब.व.)ब्रह्मज्ञानिनाम् ऋषीणाम्ब्रह्म को जानने वाले ऋषियों काOf Seers of Brahmanब्रह्मज्ञानी ऋषियों का
बुभुक्षितः (पुं.प्र.ए.व.)क्षुधार्तःभूखाHungryभूख से व्याकुल, भूखा
भक्षितवान् (√भक्ष् + क्तवतु, पुं.प्र.ए.व.)खादितवान्खायाAteखा लिया
मातुलः (पुं.प्र.ए.व.)मातुः भ्रातामामाMaternal uncleमाँ का भाई, मामा
म्लाने (नपुं.प्र.द्वि.व.)कान्तिहीनेकुम्हलायाWithered(दोनों मुख) मुरझाए हुए, उदास
लगुडम् (पुं.द्वि.ए.व.)दण्डम्लाठीStickलाठी, डण्डा
शिक्षाप्रदा (उपपदतत्पुरुषः, स्त्री.प्र.ए.व.)शिक्षां प्रददाति इतिसीख देने वालीWhich imparts educationसीख देने वाली, शिक्षाप्रद
सुहृत् (पुं.प्र.ए.व.)सखामित्रFriendसच्चा मित्र (सु + हृद् = अच्छे हृदय वाला)
तालिका पढ़ने का ढंग: कोष्ठक में दिया गया सङ्केत केवल सजावट नहीं है। ‘अनु + √धाव् + क्तवतु, पुं.प्र.ए.व.’ का अर्थ है — उपसर्ग ‘अनु’, धातु ‘धाव्’, प्रत्यय ‘क्तवतु’, और रूप पुंलिङ्ग प्रथमा एकवचन। इसी से पता चलता है कि वाक्य में इस शब्द का कर्ता एकवचन पुल्लिङ्ग होगा। इसी तरह ‘दण्डितवन्तौ’ के साथ लिखा ‘पुं.प्र.द्वि.व.’ बताता है कि कर्ता दो हैं।
ध्यान दें: ‘अपहृत्य’ और ‘निमील्य’ के आगे लिङ्ग-विभक्ति नहीं लिखी, क्योंकि ल्यप्-प्रत्ययान्त शब्द अव्यय होते हैं — उनके रूप नहीं चलते। ‘निकषा’ भी अव्यय है।
क्या यह उपयोगी रहा? त्रुटि बताएँ