शारदा अध्याय 4 अभ्यासाद् जायते सिद्धिः

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
देशस्य भक्ताः
उत्तर

समस्तपदम् — देशभक्ताः। (हिन्दी — देश के भक्त = देशभक्त।)

विग्रहः — देशस्य भक्ताः → समासः — देशभक्ताः
समासस्य नाम — षष्ठी तत्पुरुषः
यही समास क्यों: विग्रह में पूर्वपद ‘देश’ षष्ठी विभक्ति में है (देशस्य) और समास में वह विभक्ति लुप्त हो जाती है — यही तत्पुरुष का लक्षण है। तत्पुरुष में उत्तरपद प्रधान होता है; यहाँ मुख्य बात ‘भक्त’ हैं, ‘देश’ केवल उनका सम्बन्ध बताता है। जिस विभक्ति का लोप हो, समास उसी नाम से पुकारा जाता है — यहाँ षष्ठी, अतः ‘षष्ठी तत्पुरुष’।
पाठ में: “यतोहि देशभक्तानां जीवनं राष्ट्राय समर्पितं भवति।” तथा “कलकत्ता-जनपदस्य … अधिकारी ‘किङ्ग्ज़फोर्ड्’ भारतीय-देशभक्तान् अतीवकठोररीत्या दण्डयति स्म।”
प्र2.
बालः च क्रान्तिवीरः च
उत्तर

समस्तपदम् — बालक्रान्तिवीरः। (हिन्दी — जो बालक भी है और क्रान्तिवीर भी = बाल-क्रान्तिवीर।)

पाठस्य वाक्यम् — “खुदीरामः तेषु एव देशभक्तेषु कश्चन तेजस्वी बालक्रान्तिवीरः हुतात्मा अस्ति।”
समास का नाम — ध्यान से: पुस्तक ने विग्रह ‘बालः च क्रान्तिवीरः च’ (द्वन्द्व-शैली में) दिया है, किन्तु पाठ का पद एकवचन में है — बालक्रान्तिवीर, दो व्यक्ति नहीं। यदि द्वन्द्व होता तो रूप ‘बालक्रान्तिवीरौ’ (द्विवचन) बनता। अतः यहाँ वस्तुतः कर्मधारय समास है, जिसका शुद्ध विग्रह है — ‘बालः च असौ क्रान्तिवीरः च’ = बालक्रान्तिवीरः, अर्थात् एक ही व्यक्ति जो बालक भी है और क्रान्तिवीर भी। कर्मधारय में दोनों पद समान विभक्ति में तथा एक ही वस्तु के विशेषण-विशेष्य होते हैं।
तुलना: ‘रामः च कृष्णः च = रामकृष्णौ’ — यह द्वन्द्व (दो अलग व्यक्ति, द्विवचन); ‘नीलः च असौ कमलः च = नीलकमलम्’ — यह कर्मधारय (एक ही वस्तु)। उत्तर लिखते समय समस्तपद ‘बालक्रान्तिवीरः’ ही लिखें, क्योंकि पाठ से यही पद लेना है।
प्र3.
वज्रेण सदृशम्
उत्तर

समस्तपदम् — वज्रसदृशम्। (हिन्दी — वज्र के समान।)

विग्रहः — वज्रेण सदृशम् → समासः — वज्रसदृशम्
समासस्य नाम — तृतीया तत्पुरुषः
यही समास क्यों: पूर्वपद ‘वज्र’ तृतीया विभक्ति में है (वज्रेण), जो समास में लुप्त हो गई — अतः तृतीया तत्पुरुष। ‘सदृश’, ‘तुल्य’, ‘समान’, ‘निपुण’, ‘कुशल’ जैसे शब्दों के साथ तृतीया आती है («तुल्यार्थैः … तृतीया»)।
पाठ में: सत्येन्द्रनाथ का उपदेश — “क्रान्तिकार्यं कर्तुं शरीरं वज्रसदृशं दृढं … भवेत्।” यहाँ उपमा अलंकार है — वज्र सबसे कठोर वस्तु मानी जाती है, अतः क्रान्तिकारी का शरीर भी उतना ही दृढ़ चाहिए।
प्र4.
असेः धारा
उत्तर

समस्तपदम् — असिधारा। (हिन्दी — तलवार की धार।)

विग्रहः — असेः धारा → समासः — असिधारा
समासस्य नाम — षष्ठी तत्पुरुषः
यही समास क्यों: ‘असि’ (तलवार) षष्ठी में है — असे (‘असि’ इकारान्त पुंलिङ्ग, षष्ठी एकवचन = असेः)। समास में यह विभक्ति लुप्त हुई, उत्तरपद ‘धारा’ प्रधान रहा — अतः षष्ठी तत्पुरुष।
पाठ में: “बुद्धिः असिधारा इव तीक्ष्णा … भवेत्।” — बुद्धि तलवार की धार जैसी तेज़ हो। ध्यान दीजिए, यहाँ ‘इव’ के कारण उपमा है; ‘असिधारा’ उपमान है और ‘बुद्धि’ उपमेय।
प्र5.
मृत्युः एव दण्डः
उत्तर

समस्तपदम् — मृत्युदण्डः। (हिन्दी — मृत्यु ही जिसमें दण्ड है = मृत्युदण्ड, प्राणदण्ड।)

विग्रहः — मृत्युः एव दण्डः → समासः — मृत्युदण्डः
समासस्य नाम — कर्मधारयः (अवधारणापूर्वपद कर्मधारयः / रूपक-कर्मधारयः)
यही समास क्यों: विग्रह में ‘एव’ (ही) आया है — यह अवधारणा (निश्चय) का सूचक है और दोनों पद प्रथमा विभक्ति में समान हैं। जब दो समानाधिकरण पद ‘एव’ से जुड़कर एक-दूसरे का रूप बन जाएँ, तब वह कर्मधारय का यही भेद होता है (जिसे रूपक-कर्मधारय भी कहते हैं)। तुलना — विद्या एव धनम् = विद्याधनम्; क्रोधः एव अग्निः = क्रोधाग्निः।
पाठ में: “न्यायाधीशेन निर्दयतया बालाय खुदीरामाय मृत्युदण्डः उद्घोषितः – उद्बन्धनम् इति।” यहाँ ‘बालाय … उद्घोषितः’ में चतुर्थी है — «सम्प्रदाने चतुर्थी» के भाव से ‘बालक के लिए/को’ दण्ड सुनाया गया।
प्र6.
न साधारणः
उत्तर

समस्तपदम् — असाधारणः। (हिन्दी — जो साधारण नहीं = असाधारण।)

विग्रहः — साधारणः → समासः — असाधारणः
समासस्य नाम — नञ् तत्पुरुषः
यही समास क्यों: जब निषेधवाचक ‘न’ (जिसकी संज्ञा नञ् है) पूर्वपद बनता है, तब वह नञ् तत्पुरुष कहलाता है। नियम — व्यञ्जन से आरम्भ होने वाले पद के पहले ‘न’ का हो जाता है, और स्वर से आरम्भ होने वाले पद के पहले अन्। यथा — न साधारणः = साधारणः; न अन्तः = अनन्तः; न उचितम् = अनुचितम्।
पाठ में: “बाल्यकालतः एव खुदीरामः असाधारणः आसीत्।” — यही समास पुस्तक की शब्दार्थ-तालिका में भी ‘नञ् तत्पुरुषः’ लिखकर बताया गया है।
प्र7.
निर्गता दया यस्मात् सः
उत्तर

समस्तपदम् — निर्दयः। (हिन्दी — जिससे दया निकल गई हो, वह = निर्दय।)

विग्रहः — निर्गता दया यस्मात् सः → समासः — निर्दयः
समासस्य नाम — बहुव्रीहिः
यही समास क्यों (सबसे बड़ी पहचान): विग्रह में ‘यस्मात् सः’ / ‘यस्य सः’ जैसा सर्वनाम आता है — इसका अर्थ है कि समास का अर्थ उसके अपने दोनों पदों में नहीं, किसी तीसरे (अन्यपद) में है। ‘निर्दयः’ न ‘निर्गत’ का बोध कराता है न ‘दया’ का, अपितु उस व्यक्ति का जिसमें दया नहीं — इसलिए यह बहुव्रीहि है, तत्पुरुष या कर्मधारय नहीं। बहुव्रीहि में अन्यपद प्रधान होता है।
पाठ में:निर्दयः सः बालान् अपि न त्यजति स्म।” — विशेषण किङ्ग्ज़फोर्ड के लिए है। अन्य उदाहरण — पीतम् अम्बरं यस्य सः = पीताम्बरः; चन्द्रः शेखरे यस्य सः = चन्द्रशेखरः।
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