शारदा अध्याय 4 अभ्यासाद् जायते सिद्धिः

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
खुदीरामस्य जन्म कुत्र अभवत् ?
उत्तर

खुदीरामस्य जन्म बङ्गप्रान्ते मेदिनीपुरनामके जनपदे मोहोबनी-ग्रामे अभवत्। (हिन्दी — खुदीराम का जन्म बङ्गप्रान्त के मेदिनीपुर नामक जनपद के मोहोबनी-ग्राम में हुआ था।)

पाठ-प्रमाणम् — “तस्मिन् बङ्गप्रान्ते मेदिनीपुरनामके जनपदे मोहोबनी-ग्रामे नवाशीत्यधिक-अष्टादशशततमे वर्षे (१८८९) दिसम्बरमासस्य तृतीये दिनाङ्के खुदीरामस्य जन्म अभवत्।”
व्याकरण-दृष्टिः: प्रश्न ‘कुत्र’ (कहाँ) है, अतः उत्तर में अधिकरण चाहिए और «अधिकरणे सप्तमी» के नियम से सप्तमी विभक्ति आएगी — प्रान्ते, जनपदे, ग्रामे — तीनों सप्तमी एकवचन। पूर्णवाक्य में क्रिया ‘अभवत्’ (लङ्-लकारः, प्रथमपुरुषः, एकवचनम्) अवश्य लिखें।
पूरा उत्तर चाहें तो तिथि भी जोड़िए: “नवाशीत्यधिक-अष्टादशशततमे वर्षे (१८८९) दिसम्बरमासस्य तृतीये दिनाङ्के बङ्गप्रान्ते मेदिनीपुर-जनपदस्य मोहोबनी-ग्रामे खुदीरामस्य जन्म अभवत्।”
प्र2.
खुदीरामः किमर्थं व्यथितः भवति स्म ?
उत्तर

खुदीरामः देशवासिषु जायमानान् अत्याचारान् दृष्ट्वा व्यथितः भवति स्म। (हिन्दी — खुदीराम देशवासियों पर होने वाले अत्याचारों को देखकर व्यथित हो जाते थे।)

पाठ-प्रमाणम् — “सः देशवासिषु जायमानान् अत्याचारान् दृष्ट्वा व्यथितः भवति स्म।”
क्यों: साधारण बालकों की तरह खेल-कूद में उनका मन नहीं लगता था (‘साधारणबालानाम् इव क्रीडादिषु तस्य मनः न रमते स्म’)। बचपन से ही वे असाधारण थे — दूसरों का दुःख उन्हें अपना दुःख लगता था। यही संवेदना आगे चलकर क्रान्ति का बीज बनी।
भाषा-बिन्दु: ‘भवति स्म’ — लट्-लकार के साथ ‘स्म’ आने पर अर्थ भूतकाल का हो जाता है (‘हो जाता था’)। यही बात अभ्यास ७ में परिवर्तन के लिए पूछी गई है। ‘जायमानान्’ शानच्-प्रत्ययान्त वर्तमानकालिक विशेषण है (होते हुए), जो ‘अत्याचारान्’ का विशेषण होने से द्वितीया बहुवचन में है।
प्र3.
सत्येन्द्रनाथः किम् उपदिष्टवान् ?
उत्तर

सत्येन्द्रनाथः उपादिशत् — “क्रान्तिकार्यं कर्तुं शरीरं वज्रसदृशं दृढं, बुद्धिः असिधारा इव तीक्ष्णा, मनः गङ्गाजलमिव निर्मलं च भवेत् इति”। (हिन्दी — सत्येन्द्रनाथ ने उपदेश दिया कि क्रान्ति का कार्य करने के लिए शरीर वज्र के समान दृढ़, बुद्धि तलवार की धार के समान तीक्ष्ण तथा मन गङ्गाजल के समान निर्मल होना चाहिए।)

उपदेशस्य अङ्गम्उपमानम्अपेक्षितः गुणःक्यों आवश्यक
शरीरम्वज्रम्दृढम्कठोर परिश्रम, यातना और भाग-दौड़ सहने के लिए
बुद्धिःअसिधारातीक्ष्णायोजना बनाने और तत्काल निर्णय लेने के लिए
मनःगङ्गाजलम्निर्मलम्स्वार्थ, भय और द्वेष से मुक्त रहने के लिए
उपदेश का मर्म: यह तीनों गुण मिलकर ही क्रान्तिकारी बनाते हैं। केवल दृढ़ शरीर हो तो वह बल है, बुद्धि नहीं; केवल तीक्ष्ण बुद्धि हो और मन मलिन हो तो वह षड्यन्त्र बन जाता है। इसीलिए सत्येन्द्रनाथ ने मन की निर्मलता को भी उतना ही आवश्यक बताया।
अलङ्कारः: तीनों में उपमा अलङ्कार है — ‘वज्रसदृशम्’ (सदृश), ‘असिधारा इव’, ‘गङ्गाजलम् इव’। ‘सदृश’ और ‘इव’ उपमावाचक शब्द हैं।
प्र4.
खुदीरामः कदा पर्यन्तं पादत्राणं न धरिष्यामि इति प्रतिज्ञातवान् ?
उत्तर

‘यावत् भारतम् आङ्ग्लशासनात् मुक्तं न भविष्यति तावत् पादत्राणं न धरिष्यामि’ इति खुदीरामः प्रतिज्ञातवान्। (हिन्दी — ‘जब तक भारत अंग्रेज़ी शासन से मुक्त नहीं हो जाएगा, तब तक मैं जूते नहीं पहनूँगा’ — ऐसी प्रतिज्ञा खुदीराम ने की थी।)

प्रतिज्ञायाः संरचना —
यावत् भारतम् आङ्ग्लशासनात् मुक्तं न भविष्यति (शर्त)
तावत् पादत्राणं न धरिष्यामि (सङ्कल्प)
प्रेरणा — राणाप्रतापस्य चरित्रम्
यह प्रतिज्ञा क्यों: महाराणा प्रताप ने भी चित्तौड़ के मुक्त होने तक सुख-सुविधा त्यागने की प्रतिज्ञा की थी। खुदीराम ने उसी परम्परा में स्वयं को बाँधा। जूता न पहनना केवल एक बाहरी नियम नहीं था — यह हर पग पर उन्हें उनका लक्ष्य याद दिलाने वाला जीवित संकल्प था।
व्याकरण: ‘धरिष्यामि’ — लृट्-लकारः (भविष्यत्काल), उत्तमपुरुषः, एकवचनम्। ‘यावत्…तावत्’ युगल-अव्यय है, जिसका अभ्यास ‘स्वाध्यायान्मा प्रमदः’ में कराया गया है।
प्र5.
किमर्थं न्यायाधीशः आङ्ग्लाः अधिकारिणः च चकिताः ?
उत्तर

यतः मृत्युदण्डस्य उद्घोषणानन्तरम् अपि राष्ट्रभक्तस्य खुदीरामस्य मुखे भयं दुःखं वा नासीत्, प्रत्युत प्रसन्नता, शान्तिः, तृप्तिः, तेजः च आसीत् — तत् दृष्ट्वा न्यायाधीशः आङ्ग्लाः अधिकारिणः च चकिताः। (हिन्दी — क्योंकि मृत्युदण्ड की घोषणा के बाद भी राष्ट्रभक्त खुदीराम के मुख पर भय या दुःख नहीं था, बल्कि प्रसन्नता, शान्ति, तृप्ति और तेज था — यह देखकर न्यायाधीश तथा अंग्रेज़ अधिकारी चकित रह गए।)

पाठ-प्रमाणम् — “राष्ट्रभक्तस्य खुदीरामस्य मुखे भयं दुःखं वा नासीत् प्रत्युत प्रसन्नता, शान्तिः, तृप्तिः, तेजः च आसीत्। तत् दृष्ट्वा न्यायाधीशः आङ्ग्लाः अधिकारिणः चापि चकिताः।”
वे चकित क्यों हुए: अंग्रेज़ों की सारी शक्ति का आधार भय था — दण्ड देकर वे भारतीयों को डराते थे। किन्तु जिस बालक को मृत्यु का भय ही न हो, उस पर उनका कोई शस्त्र नहीं चलता। यह उनके लिए बिल्कुल नया अनुभव था, इसीलिए वे चकित हुए। यही पाठ का शीर्षक सिद्ध करता है — न खलु वयस्तेजसो हेतुः
शब्द-भेद: ‘प्रसन्नता’ (सुख), ‘शान्तिः’ (मन की स्थिरता), ‘तृप्तिः’ (कर्तव्य पूरा होने का सन्तोष), ‘तेजः’ (मुख का ओज) — चारों अलग-अलग भाव हैं; उत्तर में चारों लिखना चाहिए, केवल ‘प्रसन्नता’ लिखना अधूरा उत्तर है।
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