प्र1.
किं वयं जानीमः यत् देशाय स्वातन्त्र्यं प्रदातुं कियन्तः ज्ञाताः अज्ञाताः च क्रान्तिवीराः स्वतन्त्रतायज्ञे स्वीयपरिवारं स्वीयजीवनं च आहुतिरूपेण समर्पितवन्तः इति ?
उत्तर
न, वयं तान् सर्वान् न जानीमः। केचन एव क्रान्तिवीराः इतिहासे नामतः ज्ञाताः सन्ति, अन्ये तु सहस्रशः अज्ञाताः एव अवशिष्टाः। तथापि ते सर्वेऽपि अस्माभिः कृतज्ञताभावनया नित्यं वन्दनीयाः। (हिन्दी — नहीं, हम उन सबको नहीं जानते। कुछ ही क्रान्तिवीर नाम से इतिहास में ज्ञात हैं, शेष हज़ारों अज्ञात ही रह गए। फिर भी वे सब हमारे लिए कृतज्ञता की भावना से नित्य वन्दनीय हैं।)
प्रश्न का प्रयोजन: यह प्रश्न उत्तर पाने के लिए नहीं, पाठक को झकझोरने के लिए है। हम स्वतन्त्रता का अमृत महोत्सव तो मनाते हैं (‘अमृतमहोत्सववर्षं वयम् आचरितवन्तः’), किन्तु जिनके बलिदान से यह स्वतन्त्रता मिली, उनमें से अधिकांश के नाम तक हमें ज्ञात नहीं। इसी अज्ञात-ज्ञात बलिदानी-परम्परा का एक प्रतिनिधि उदाहरण देने के लिए पाठ खुदीराम का वृत्तान्त प्रस्तुत करता है — ‘खुदीरामः तेषु एव देशभक्तेषु कश्चन तेजस्वी बालक्रान्तिवीरः हुतात्मा अस्ति।’
ध्यातव्यम्: ‘स्वतन्त्रतायज्ञे … आहुतिरूपेण समर्पितवन्तः’ — यहाँ स्वतन्त्रता-संग्राम को यज्ञ तथा बलिदान को आहुति कहा गया है। यह रूपक अलंकार है, और इसी से पता चलता है कि लेखक बलिदान को पवित्र कर्म मानता है।