शारदा अध्याय 5 स्वाध्यायान्मा प्रमदः

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
‘स्वाध्यायान्मा प्रमदः’ खण्डे प्रदत्तयोः श्लोकयोः पदच्छेदम् अन्वयम् अर्थं भावं च लिखत — “बुद्धिर्मनीषा धिषणा धीः प्रज्ञा शेमुषी मतिः। प्रेक्षोपलब्धिश्चित्संवित्प्रतिपज्ज्ञप्तिचेतना॥ धीर्धारणावती मेधा सङ्कल्पः कर्म मानसम्। अवधानं समाधानं प्रणिधानं तथैव च॥ (१.५.१-२, अमरकोशः)”
उत्तर
बुद्धिर्मनीषा धिषणा धीः प्रज्ञा शेमुषी मतिः।
प्रेक्षोपलब्धिश्चित्संवित्प्रतिपज्ज्ञप्तिचेतना॥
धीर्धारणावती मेधा सङ्कल्पः कर्म मानसम्।
अवधानं समाधानं प्रणिधानं तथैव च॥

पदच्छेदः — बुद्धिः + मनीषा + धिषणा + धीः + प्रज्ञा + शेमुषी + मतिः। प्रेक्षा + उपलब्धिः + चित् + संवित् + प्रतिपत् + ज्ञप्तिः + चेतना॥ धीः + धारणावती + मेधा + सङ्कल्पः + कर्म + मानसम्। अवधानम् + समाधानम् + प्रणिधानम् + तथा + एव + च॥

अन्वयः — मनीषा, धिषणा, धीः, प्रज्ञा, शेमुषी, मतिः, प्रेक्षा, उपलब्धिः, चित्, संवित्, प्रतिपत्, ज्ञप्तिः, चेतना (इति एते शब्दाः) ‘बुद्धिः’ (इत्यर्थे प्रयुज्यन्ते)। धारणावती धीः ‘मेधा’ (कथ्यते)। मानसं कर्म ‘सङ्कल्पः’ (कथ्यते)। तथा एव च अवधानम्, समाधानम्, प्रणिधानम् (इति त्रयः शब्दाः एकार्थकाः सन्ति)।

अर्थः — ‘बुद्धि’ के लिए ये शब्द प्रयुक्त होते हैं — मनीषा, धिषणा, धी, प्रज्ञा, शेमुषी, मति, प्रेक्षा, उपलब्धि, चित्, संवित्, प्रतिपत्, ज्ञप्ति तथा चेतना। जो धी धारणावती हो, अर्थात् जो सीखे हुए को धारण कर रखे, वह ‘मेधा’ कहलाती है। मन का जो कर्म है, वह ‘सङ्कल्प’ कहलाता है। और ‘अवधान’, ‘समाधान’ तथा ‘प्रणिधान’ — ये तीनों (एकाग्रता के) पर्याय हैं।

पुस्तक का अपना स्पष्टीकरण —बुद्धिः इत्यर्थे अमरकोषे बहवः पर्यायवाचकाः शब्दाः उल्लिखिताः सन्ति। ते यथा — मनीषा, धिषणा, धी, प्रज्ञा, शेमुषी, मति, प्रेक्षा, उपलब्धिः, चित्, संविद्, प्रतिपत्, ज्ञप्तिः, चेतना, धारणावती मेधा च — एते सर्वेऽपि शब्दाः स्त्रीलिङ्गे विद्यन्ते।

क्रमःपर्यायःशब्द का विशेष भाव
बुद्धिःमूल शब्द — समझने की शक्ति (√बुध् = जानना)
मनीषामन को वश में रखने वाली बुद्धि; इसीलिए विद्वान् ‘मनीषी’ कहलाता है
धिषणातेज, प्रखर बुद्धि
धीःसबसे प्राचीन तथा छोटा शब्द; गायत्री-मन्त्र का ‘धियो यो नः प्रचोदयात्’ इसी से
प्रज्ञागहरी, तत्त्व तक पहुँचने वाली बुद्धि; ‘प्रज्ञावान्’ = विवेकी
शेमुषीकाव्यों में प्रयुक्त सुन्दर पर्याय
मतिःराय, निश्चय करने वाली बुद्धि (‘इति मम मतम्’ — श्रेया का वाक्य)
प्रेक्षादेखने-परखने की शक्ति (प्र + √ईक्ष्)
उपलब्धिःजो प्राप्त करे, पकड़ ले — बोध
१०चित्चेतनाशक्ति; वेदान्त का ‘सत्-चित्-आनन्द’ इसी का
११संवित्पूर्ण ज्ञान, सम्यक् बोध
१२प्रतिपत्तुरन्त समझ लेने की शक्ति
१३ज्ञप्तिःजानने की क्रिया, बोध (√ज्ञा से)
१४चेतनासजगता — पाठ के श्लोक का ‘चेतनाः’ इसी से
१५धारणावती मेधाधारण करने वाली बुद्धि — स्मरणशक्ति से युक्त प्रतिभा
भावः — यह खण्ड यहीं क्यों रखा गया: पूरा पाठ ‘बुद्धि’ शब्द के इर्द-गिर्द घूमता है — कृतकबुद्धिः, मानवबुद्धिः, बुद्धिमती, बुद्धिमत्ता। तो पुस्तक अन्त में यह दिखाती है कि जिस ‘बुद्धि’ की चर्चा हम कर रहे हैं, उसके लिए संस्कृत के पास पन्द्रह शब्द हैं — और हर शब्द बुद्धि के एक अलग रंग को पकड़ता है : कोई देखने की शक्ति (प्रेक्षा), कोई पकड़ने की (उपलब्धि), कोई धारण करने की (मेधा), कोई निश्चय करने की (मति)। यही इस खण्ड का सबसे बड़ा सन्देश है — यन्त्र के पास सूचना है, भाषा के पास भेद है। जो भाषा बुद्धि के पन्द्रह रूप पहचानती है, वही उस बुद्धि की सूक्ष्मता भी समझा सकती है।
दूसरा सन्देश — सब स्त्रीलिङ्ग: पुस्तक विशेष रूप से जोड़ती है कि ये सारे शब्द स्त्रीलिङ्ग हैं। इसी कारण पूरे पाठ में ‘कृतकबुद्धिः’ स्त्रीलिङ्ग रूपों के साथ चली — ‘एषा सा कृतकबुद्धिः’, ‘समुपस्थिता’, ‘सहकरी’, ‘सहायिका’, ‘प्रतिस्पर्धिनी’, ‘काल्पनिकी’, ‘बुद्धिमती’। व्याकरण की यह एक जानकारी पूरे पाठ के दर्जनों रूप एक साथ समझा देती है।
सन्धि-विच्छेद (परीक्षा के लिए): बुद्धिर्मनीषा = बुद्धिः + मनीषा (विसर्गसन्धि — विसर्ग का ‘र्’)। प्रेक्षोपलब्धिः = प्रेक्षा + उपलब्धिः (गुण सन्धि — आ + उ = ओ)। उपलब्धिश्चित् = उपलब्धिः + चित् (विसर्गसन्धि — श्चुत्व, विसर्ग का ‘श्’)। प्रतिपज्ज्ञप्तिः = प्रतिपत् + ज्ञप्तिः (त् + ज् = ज्ज् — श्चुत्व)। धीर्धारणावती = धीः + धारणावती (विसर्ग का ‘र्’)। तथैव = तथा + एव (वृद्धि सन्धि — आ + ए = ऐ)।
ग्रन्थ-परिचय: अमरकोशः (‘नामलिङ्गानुशासनम्’) आचार्य अमरसिंह रचित संस्कृत का सर्वाधिक प्रसिद्ध पर्यायवाची-कोश है। यह तीन काण्डों में है और पूरा श्लोकबद्ध है, ताकि कण्ठस्थ किया जा सके। यहाँ उद्धृत अंश प्रथम काण्ड के धीवर्ग (१.५) से है — अर्थात् ‘बुद्धि से सम्बन्धित शब्दों का वर्ग’। पुस्तक ने इसे ‘स्वाध्यायान्मा प्रमदः’ (स्वाध्याय में प्रमाद मत करो — तैत्तिरीय उपनिषद् की शिक्षावल्ली का वचन) शीर्षक के नीचे रखा है।
प्र2.
अमरकोशस्य एतस्य श्लोकस्य पाठेन सह कः सम्बन्धः ? पर्यायपदानि प्रयुज्य पञ्च वाक्यानि रचयत।
उत्तर

उत्तरम् (सम्बन्धः) — अस्य पाठस्य केन्द्रे ‘बुद्धिः’ इति शब्दः एव अस्ति — कृतकबुद्धिः, मानवबुद्धिः, बुद्धिमती, बुद्धिमत्ता। अमरकोशः दर्शयति यत् एतस्याः एकस्याः ‘बुद्धेः’ कृते संस्कृतभाषायां पञ्चदश पर्यायाः सन्ति, तेषु च प्रत्येकः बुद्धेः भिन्नं रूपं सूचयति। अतः अयं श्लोकः पाठस्य शब्दसम्पदं वर्धयति, ‘कृतकबुद्धिः’ इत्यस्य स्त्रीलिङ्गत्वं च स्पष्टीकरोति।

(हिन्दी — यह पाठ ‘बुद्धि’ के चारों ओर घूमता है, और अमरकोश दिखाता है कि उसी एक बुद्धि के लिए संस्कृत में पन्द्रह शब्द हैं, जिनमें हर शब्द बुद्धि का एक अलग रूप बताता है। साथ ही यह भी स्पष्ट होता है कि ये सब स्त्रीलिङ्ग हैं — इसीलिए पूरे पाठ में ‘कृतकबुद्धिः’ के साथ स्त्रीलिङ्ग विशेषण आए हैं।)

नमूना उत्तर — पर्यायपदैः पञ्च वाक्यानि —

(क) मनीषिणां मनीषा सर्वदा लोकहिताय प्रवर्तते।
(ख) यस्य मेधा धारणावती, सः पठितं न विस्मरति।
(ग) प्रज्ञा तत्त्वं दर्शयति, सूचना तु केवलं वृत्तान्तं कथयति।
(घ) यन्त्रेषु चेतना नास्ति, तथापि तानि चेतनवत् कार्यं कुर्वन्ति।
(ङ) कृतकबुद्धेः प्रयोगे मतिः विवेकः च अपेक्षितौ।

(हिन्दी — (क) मनीषियों की मनीषा सदा लोक के हित में लगती है। (ख) जिसकी मेधा धारण करने वाली है, वह पढ़ा हुआ नहीं भूलता। (ग) प्रज्ञा तत्त्व दिखाती है, सूचना तो केवल वृत्तान्त बताती है। (घ) यन्त्रों में चेतना नहीं है, फिर भी वे चेतन की तरह काम करते हैं। (ङ) कृतकबुद्धि के प्रयोग में मति तथा विवेक — दोनों अपेक्षित हैं।)

पर्यायःप्रसिद्धः प्रयोगःकहाँ मिलेगा
धीः‘धियो यो नः प्रचोदयात्’गायत्री मन्त्र — ‘जो हमारी बुद्धियों को प्रेरित करे’
प्रज्ञा‘स्थितप्रज्ञस्य का भाषा’श्रीमद्भगवद्गीता २.५४
मेधा‘मेधावी’ — जिसकी मेधा तीव्र होप्रचलित शब्द
मनीषा‘मनीषी’ — विद्वान्, विचारकप्रचलित शब्द
चेतना‘नित्यं वदन्ति चेतनाःइसी पाठ का श्लोक (पृष्ठ ५६)
मतिः‘इति मम मतम्श्रेया का वाक्य (पृष्ठ ५७)
वाक्य बनाते समय दो बातें ध्यान रखिए: (१) ये सारे शब्द स्त्रीलिङ्ग हैं, अतः इनके विशेषण तथा क्रिया-सम्बन्धी पद भी स्त्रीलिङ्ग रहेंगे — ‘मेधा धारणावती’, ‘प्रज्ञा गम्भीरा’, ‘चेतना जागृता’। (२) पर्याय होने का अर्थ यह नहीं कि सब जगह एक-दूसरे के स्थान पर रखे जा सकें। ‘मेधा’ स्मरण-शक्ति की ओर झुकती है, ‘प्रज्ञा’ विवेक की ओर, ‘मति’ निश्चय की ओर। अच्छा लेखक प्रसंग के अनुसार पर्याय चुनता है — यही शब्द-सम्पदा का सच्चा उपयोग है।
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