शारदा अध्याय 5 यस्तु क्रियावान् मनुजः स विद्वान्

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
अधोलिखितेषु क्षेत्रेषु कृतकबुद्ध्या युक्तानाम् उपकरणानां, तन्त्राणाम् अनुप्रयोगाणां च क्षेत्रानुसारं नामानि सङ्गृह्य लिखत — शिक्षाक्षेत्रे, चिकित्साक्षेत्रे, वाणिज्ये, सैन्यक्षेत्रे, कृषिक्षेत्रे, मनोरञ्जनक्षेत्रे, वास्तुकलाक्षेत्रे, विधिक्षेत्रे, सामान्यजीवनक्षेत्रे च।
उत्तर

यह प्रकल्प-कार्य (project) है — नौ क्षेत्रों के लिए ए.आई.-आधारित उपकरणों, तन्त्रांशों तथा अनुप्रयोगों के नाम इकट्ठे करके क्षेत्रवार लिखने हैं। नीचे पहले विधि दी है, फिर आदर्श उत्तर

कार्य कैसे कीजिए (विधि) —

  1. एक बड़ी चार्ट-शीट लीजिए और उस पर नौ खाने बनाइए — प्रत्येक क्षेत्र के लिए एक।
  2. सबसे पहले पाठ से नाम उठाइए — पाठ में तथा ‘तन्त्रांशाः/अनुप्रयोगाः’ की सूची में सोलह से अधिक नाम पहले से दिए हैं।
  3. फिर घर-विद्यालय में पूछिए, समाचार-पत्र देखिए, और भारतीय योजनाओं के नाम विशेष रूप से खोजिए — इससे प्रकल्प भारत-केन्द्रित बनेगा।
  4. हर नाम के आगे संस्कृत नाम भी लिखिए। जिसका संस्कृत नाम पुस्तक में न हो, उसे स्वयं समास से गढ़िए — जैसे ‘चालकरहितयानम्’ (self-driving car), ‘मुखपरिचयप्रणाली’ (face recognition)।
  5. अन्त में एक वाक्य में लिखिए कि उस क्षेत्र में ए.आई. से क्या लाभ हुआ और क्या सावधानी चाहिए — तभी प्रकल्प पूर्ण माना जाएगा।

आदर्श उत्तरम् (नमूना तालिका) —

क्षेत्रम्कृतकबुद्ध्या युक्तानि उपकरणानि / तन्त्राणि / अनुप्रयोगाःकार्यम् (हिन्दी में)
शिक्षाक्षेत्रेदीक्षा (DIKSHA), स्वयम् (SWAYAM), पी.एम्. ई-विद्या, सर्वेषां कृते कृतकबुद्धिः (AI for All), चैट्बोट्, भाषानुवादोपकरणानि, चैट-जीपीटी, जेमिनिपाठ्यसामग्री, शङ्का-समाधान, अनुवाद, स्वयं-अध्ययन
चिकित्साक्षेत्रेरोबोटिक्-सर्जरी, रोग-पूर्वज्ञानम्, रश्मिपरीक्षणविद्या (AI Radiology), चैट-कृतकबुद्धिः, औषधशुश्रूषा, ई-सञ्जीवनीशल्यक्रिया, रोग की पहचान, एक्स-रे की जाँच, दूरचिकित्सा
वाणिज्ये (वित्ते)कपटलेनदेन-निरीक्षणम् (fraud detection), अनुशंसा-प्रणाली (recommendation system), ग्राहकसेवा-चैट्बोट्, यू.पी.आई.-सुरक्षातन्त्रम्धोखाधड़ी पकड़ना, ग्राहक को सुझाव देना, चौबीसों घंटे सेवा
सैन्यक्षेत्रेड्रोन् (चालकरहितविमानम्), मुखपरिचयप्रणाली, उपग्रहचित्र-विश्लेषणम्, स्वचालित-सीमानिरीक्षणम्निगरानी, सीमा-रक्षा, चित्रों का विश्लेषण
कृषिक्षेत्रेड्रोनमाध्यमेन बीज-वपनम्, कीटनिरीक्षणम्, भूमिक्षमतापरीक्षणम्, किसान्-ई-मित्रम् (चैट्बोट्), वातावरण-पूर्वानुमानम्बीज बोना, कीट पहचानना, मिट्टी जाँचना, मौसम बताना
मनोरञ्जनक्षेत्रेयू-ट्यूब्, अनुशंसा-प्रणाली, दॅल्ल्-ई (DALL-E), सङ्गीतरचना-तन्त्रांशाः, चलच्चित्र-सम्पादन-उपकरणानिपसन्द के अनुसार सुझाव, चित्र-सङ्गीत की रचना
वास्तुकलाक्षेत्रेआकल्पन-तन्त्रांशाः (design software), त्रिविम-मुद्रणम् (3D printing), भवन-प्रतिरूप-निर्माणम्, ऊर्जा-दक्षता-गणनम्नक़्शा बनाना, त्रिआयामी प्रतिरूप, ऊर्जा-बचत की गणना
विधिक्षेत्रेसुवास् (SUVAS — विधिक-अनुवाद-तन्त्रांशः), सुपेस् (SUPACE), न्यायिक-अभिलेख-अन्वेषणम्, पूर्वानुमेय-नियन्त्रणम्, मुखपरिचयप्रणालीनिर्णयों का भाषानुवाद, पुराने मुक़दमे खोजना, अपराध-नियन्त्रण
सामान्यजीवनक्षेत्रेसिरि, एलेक्सा, गूगल-सहायकम्, गूगल-मानचित्रम्, पटु-कारयानम्, मेटा-कृतकबुद्धिः, परप्लेक्सिटि-कृतकबुद्धिःमार्गदर्शन, घर के उपकरण चलाना, प्रश्नों के उत्तर, मौसम-समाचार

प्रकल्पस्य उपसंहारः (संस्कृतेन) —

एतत् सर्वं दृष्ट्वा वयं वदामः — कृतकबुद्धिः अद्य जीवनस्य प्रायः सर्वेषु क्षेत्रेषु प्रविष्टा अस्ति।
शिक्षायां सा गुरोः मित्रम्, चिकित्सायां वैद्यस्य सहायिका, कृषौ कृषकस्य साधनम् अस्ति।
किन्तु सर्वत्र एकम् एव स्मरणीयम् — यन्त्रं सूचनां ददाति, विवेकं तु मानवः एव ददाति।
अतः वयं कृतकबुद्धिं विवेकेन प्रयुञ्जीमहि, यतः ‘कृतकबुद्धिः मित्रं भवेत्, न भवेत् स्वामी’।

(हिन्दी — यह सब देखकर हम कहते हैं कि कृतकबुद्धि आज जीवन के प्रायः सभी क्षेत्रों में प्रवेश कर चुकी है। शिक्षा में वह गुरु की मित्र है, चिकित्सा में वैद्य की सहायिका, और खेती में किसान का साधन। किन्तु सर्वत्र एक ही बात याद रखने योग्य है — यन्त्र सूचना देता है, विवेक तो मनुष्य ही देता है। इसलिए हम कृतकबुद्धि का प्रयोग विवेक से करें, क्योंकि ‘कृतकबुद्धि मित्र बने, स्वामी न बने’।)

अच्छे प्रकल्प में ये चार बातें अवश्य हों: (१) क्षेत्रवार क्रम — नौ क्षेत्र, नौ अलग खाने; एक क्षेत्र का नाम दूसरे में न जाए। (२) पाठ से जुड़ाव — कम-से-कम आधे नाम पाठ या ‘तन्त्रांशाः/अनुप्रयोगाः’ की सूची से लीजिए; इससे शिक्षक को दिखेगा कि पाठ पढ़ा गया है। (३) संस्कृत नामकरण — हर नाम के आगे संस्कृत पर्याय; जो न मिले उसे समास से स्वयं गढ़िए और विग्रह भी लिखिए। (४) निष्कर्ष-वाक्य — अन्त में पाठ का सूत्रवाक्य। जो प्रकल्प केवल नामों की सूची है, वह अधूरा है; जो नाम + कार्य + सन्देश तीनों देता है, वही पूर्ण है।
ध्यान दें: ऊपर की तालिका में जो नाम पाठ में नहीं आए (जैसे ई-सञ्जीवनी, सुवास्, किसान्-ई-मित्रम्, त्रिविम-मुद्रणम्), वे भारत में प्रचलित वास्तविक सेवाएँ/तकनीकें हैं — प्रकल्प में इन्हें जोड़ते समय अपने विद्यालय के शिक्षक से एक बार पुष्टि अवश्य कर लीजिए तथा जिस स्रोत से नाम लिया, उसका उल्लेख भी कीजिए। किसी भी सूची में नाम की शुद्धता ही उसका मूल्य है।
Try this — अपने क्षेत्र का दसवाँ खाना बनाइए: पुस्तक ने नौ क्षेत्र दिए हैं। आप एक दसवाँ जोड़िए जो आपके अपने जीवन से जुड़ा हो — ‘क्रीडाक्षेत्रे’ (खेल में — गति-विश्लेषण, निर्णायक-सहायता), ‘यातायातक्षेत्रे’ (यातायात में — सङ्केत-नियन्त्रण, मार्ग-सुझाव), अथवा ‘पर्यावरणक्षेत्रे’ (वन-निरीक्षण, वायुगुणवत्ता-मापन)। अपने क्षेत्र के लिए संस्कृत नाम स्वयं गढ़िए — यही इस पाठ का सबसे अच्छा अभ्यास है।
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