कक्षा ६ सामाजिक विज्ञान अध्याय 4 आइए विचार करें के लिए एनसीईआरटी समाधान
अद्यतन2026-09-19
प्र1.
पहले प्रदर्शित शैल-चित्र एवं उपर्युक्त चित्र, दोनों में ही पुरुषों एवं महिलाओं को कुछ निश्चित भूमिकाओं में दर्शाया गया है। यद्यपि ये स्वाभाविक प्रतीत होते हैं, परंतु आवश्यक नहीं कि ये सही ही हों और ये सभी परिस्थितियों पर लागू नहीं होते। उदाहरण के लिए, हो सकता है कि शैल-चित्र में महिलाओं ने गुफा में चित्रकारी करने के लिए रंगों को तैयार किया हो अथवा स्वयं चित्रकारी की हो। दोनों ही चित्रों में हो सकता है कि पुरुषों ने भोजन की कोई वस्तु बनाई हो अथवा शिशुओं की देखभाल में मदद की हो।
पहले दिया गया चित्र — शैलाश्रय (पृष्ठ 70)। नारंगी वस्त्र लपेटे एक पुरुष शैल-भित्ति पर चित्र बना रहा है, उसके पास एक बालक है। बाईं ओर एक वृद्ध पुरुष धधकती आग सँभाल रहा है और उसके पास दो स्त्रियाँ बैठी हैं, जिनमें एक की गोद में शिशु है। सामने पुरुष ज़मीन पर घुटनों के बल बैठकर पत्थर से पत्थर पर चोट कर रहे हैं। दाईं ओर एक पुरुष और एक स्त्री बड़े पाषाण-पात्र में दबाकर कुछ कूट रहे हैं, और एक पुरुष खड़ा होकर दोनों हाथों में पकड़ी वस्तु को अंतिम रूप दे रहा है।
उपर्युक्त चित्र — कृषक ग्राम (पृष्ठ 72)। खेत में एक पुरुष कटे डंठलों का गट्ठर सिर के ऊपर उठाए है, जबकि एक स्त्री झुककर फ़सल काट रही है और एक बालक डंठल बटोर रहा है। दाढ़ी वाला एक पुरुष कंधे पर औज़ार रखे और साथ में कुत्ता लिए खेत से लौट रहा है। झोपड़ियों के पास एक पुरुष दीवार पर औज़ार से काम कर रहा है। चूल्हे के पास एक स्त्री घुटनों के बल बैठी है, आग पर बर्तन रखा है और पास ज़मीन पर सब्ज़ियाँ रखी हैं; झोपड़ियों के सामने दो छोटे बच्चे खेल रहे हैं।
प्रश्न जिन दो चित्रों की बात कर रहा है — पृष्ठ 70 एवं 72; कलाकारों द्वारा बनाए इन चित्रों का वर्णन यहाँ दिया गया है, चित्रों के लिए पाठ्यपुस्तक देखिए।
उत्तर
पुस्तक अपने ही पन्नों के चित्रों के विषय में सावधान कर रही है — यह असामान्य है और इसे गंभीरता से लेना चाहिए। ये चित्र आधुनिक अनुमान हैं, साक्ष्य नहीं।
दोनों चित्र क्या दिखाते हैं: पुरुष आखेट करते, उपकरण बनाते, चट्टान पर चित्र बनाते, उपज ढोते और घर बनाते; महिलाएँ अनाज पीसतीं, भोजन पकातीं और बच्चों की देखभाल करतीं। साक्ष्य वास्तव में क्या अनुमति देता है: इससे कहीं अधिक।
चित्र जो संकेत देता है
वह सही क्यों नहीं भी हो सकता
शैल-चित्र केवल पुरुषों ने बनाए
किसी चित्र में यह नहीं लिखा होता कि ब्रश किसने पकड़ा था। विश्व की कई चित्रित गुफाओं में दीवारों पर बने हाथ के छापों को नापा गया है और उनमें से अनेक महिलाओं एवं बच्चों के हाथों के आकार के हैं। रंग तैयार करने का आधा काम भी महिलाओं ने किया होगा।
भोजन एवं बच्चों की देखभाल केवल महिलाएँ करती थीं
जिस टोली में सबको खाना है, वहाँ जो शिविर में हो वही पकाता है। पुरुषों ने भी अवश्य पकाया होगा, बच्चों को सँभाला होगा और शिशुओं को गोद में ढोया होगा।
आखेट केवल पुरुष, संग्रह केवल महिलाएँ
पौधे, फल, कंद, शहद, अंडे एवं छोटे जीव इकट्ठा करना भोजन का बड़ा हिस्सा देता था और सब करते थे। ज्ञात आखेटक-संग्राहक समुदायों में महिलाएँ छोटे शिकार एवं मछली पकड़ती हैं।
उपकरण एवं घर केवल पुरुष बनाते थे
उपकरण बनाना एवं घर बनाना सीखे हुए कौशल हैं; चित्र में बच्चे पहले से बड़ों की नकल कर रहे हैं। यह मानने का कोई कारण नहीं कि यह सीखना केवल लड़कों तक सीमित था।
चित्रकार ऐसा चित्र क्यों बना देता है: पाषाण युग का कोई छायाचित्र नहीं है। चित्रकार को रिक्त स्थान किसी न किसी से भरना ही पड़ता है, और सबसे सहज वही होता है जो पैटर्न वह आज अपने आस-पास देखता है। इस प्रकार एक आधुनिक धारणा 12,000 वर्ष पुराने दृश्य पर पुत जाती है — और फिर उसे ही प्रमाण मान लिया जाता है।
प्र2.
ऐसी भूमिकाओं एवं परिस्थितियों पर विचार करते हुए कक्षा में चर्चा कीजिए। इस बात का ध्यान रखिए कि हमारे पास उस समय की केवल सीमित सूचनाएँ ही उपलब्ध हैं।
उत्तर
चर्चा को सार्थक बनाने का तरीका। कक्षा को दो भागों में बाँटिए और प्रत्येक को एक काम दीजिए —
पक्ष अ — “हम वास्तव में क्या जानते हैं?” केवल वही सूचीबद्ध कीजिए जो भौतिक साक्ष्य दिखा सकता है: उपकरण, शैल-चित्र, सिलबट्टे, पशुओं की हड्डियाँ, शवाधान। ध्यान दीजिए कि इनमें से कितने कम पर यह लिखा है कि इनका उपयोग किसने किया।
पक्ष ब — “हमने क्या मान लिया है?” दोनों चित्रों में हर उस भूमिका की सूची बनाइए जो सौंपी गई है, सिद्ध नहीं की गई।
फिर सूचियाँ बदलिए और तर्क कीजिए। उपयोगी प्रश्न कभी “क्या महिलाएँ आखेट करती थीं?” नहीं होता, बल्कि “किस साक्ष्य से यह बात तय हो सकेगी?” होता है।
तीन निष्कर्ष जिन तक पहुँचना चाहिए —
साक्ष्य का अभाव, अभाव का साक्ष्य नहीं है। हमारे पास प्रमाण नहीं है कि भीमबेटका में महिलाओं ने चित्र बनाए; यह प्रमाण भी नहीं है कि उन्होंने नहीं बनाए।
जो बचता है वही दिखता है। पत्थर बचता है, कपड़ा एवं लकड़ी नहीं — इसलिए पत्थर का काम ज़रूरत से अधिक महत्वपूर्ण दिखता है, और जो बुनता, पकाता या शिशु पालता था उसका लगभग कोई चिह्न नहीं बचता।
भूमिकाएँ संभवत: लचीली थीं। भूख, ठंड और ख़तरे से जूझती छोटी टोली में काम का कठोर बँटवारा एक विलासिता है। जिसे जो आवश्यक था, वह करता था — इसीलिए पुस्तक कहती है कि ये भूमिकाएँ “सभी परिस्थितियों पर लागू नहीं होतीं”।
अपनी कॉपी के लिए नमूना निष्कर्ष: “हमारी कक्षा इस बात पर सहमत हुई कि चित्र एक उचित अनुमान हैं, प्रमाण नहीं। हम विश्वास से कह सकते हैं कि लोग समूहों में रहते थे, अग्नि का उपयोग करते थे, उपकरण बनाते थे और चित्रकारी करते थे, क्योंकि ये चीज़ें बच जाती हैं। हम यह विश्वास से नहीं कह सकते कि कौन कौन-सा काम करता था, क्योंकि साक्ष्य यह दर्ज नहीं करता। इसलिए ऐसे चित्रों को चित्रकार का सुझाव मानना चाहिए और मन खुला रखना चाहिए।”
यह केवल समानता का नहीं, इतिहास का पाठ क्यों है: यहाँ जो आदत सिखाई जा रही है — साक्ष्य जो दिखाता है उसे चित्रकार की धारणा से अलग करना — वही आदत आगे की पूरी पुस्तक के हर स्रोत के लिए चाहिए, चाहे वह अपनी प्रशंसा करता किसी राजा का शिलालेख हो या किसी विदेशी यात्री का वह विवरण जिसने वह नगर मुश्किल से देखा था।