प्र1.
पहले प्रदर्शित शैल-चित्र एवं उपर्युक्त चित्र, दोनों में ही पुरुषों एवं महिलाओं को कुछ निश्चित भूमिकाओं में दर्शाया गया है। यद्यपि ये स्वाभाविक प्रतीत होते हैं, परंतु आवश्यक नहीं कि ये सही ही हों और ये सभी परिस्थितियों पर लागू नहीं होते। उदाहरण के लिए, हो सकता है कि शैल-चित्र में महिलाओं ने गुफा में चित्रकारी करने के लिए रंगों को तैयार किया हो अथवा स्वयं चित्रकारी की हो। दोनों ही चित्रों में हो सकता है कि पुरुषों ने भोजन की कोई वस्तु बनाई हो अथवा शिशुओं की देखभाल में मदद की हो।
उत्तर
पुस्तक अपने ही पन्नों के चित्रों के विषय में सावधान कर रही है — यह असामान्य है और इसे गंभीरता से लेना चाहिए। ये चित्र आधुनिक अनुमान हैं, साक्ष्य नहीं।
दोनों चित्र क्या दिखाते हैं: पुरुष आखेट करते, उपकरण बनाते, चट्टान पर चित्र बनाते, उपज ढोते और घर बनाते; महिलाएँ अनाज पीसतीं, भोजन पकातीं और बच्चों की देखभाल करतीं। साक्ष्य वास्तव में क्या अनुमति देता है: इससे कहीं अधिक।
| चित्र जो संकेत देता है | वह सही क्यों नहीं भी हो सकता |
|---|---|
| शैल-चित्र केवल पुरुषों ने बनाए | किसी चित्र में यह नहीं लिखा होता कि ब्रश किसने पकड़ा था। विश्व की कई चित्रित गुफाओं में दीवारों पर बने हाथ के छापों को नापा गया है और उनमें से अनेक महिलाओं एवं बच्चों के हाथों के आकार के हैं। रंग तैयार करने का आधा काम भी महिलाओं ने किया होगा। |
| भोजन एवं बच्चों की देखभाल केवल महिलाएँ करती थीं | जिस टोली में सबको खाना है, वहाँ जो शिविर में हो वही पकाता है। पुरुषों ने भी अवश्य पकाया होगा, बच्चों को सँभाला होगा और शिशुओं को गोद में ढोया होगा। |
| आखेट केवल पुरुष, संग्रह केवल महिलाएँ | पौधे, फल, कंद, शहद, अंडे एवं छोटे जीव इकट्ठा करना भोजन का बड़ा हिस्सा देता था और सब करते थे। ज्ञात आखेटक-संग्राहक समुदायों में महिलाएँ छोटे शिकार एवं मछली पकड़ती हैं। |
| उपकरण एवं घर केवल पुरुष बनाते थे | उपकरण बनाना एवं घर बनाना सीखे हुए कौशल हैं; चित्र में बच्चे पहले से बड़ों की नकल कर रहे हैं। यह मानने का कोई कारण नहीं कि यह सीखना केवल लड़कों तक सीमित था। |
चित्रकार ऐसा चित्र क्यों बना देता है: पाषाण युग का कोई छायाचित्र नहीं है। चित्रकार को रिक्त स्थान किसी न किसी से भरना ही पड़ता है, और सबसे सहज वही होता है जो पैटर्न वह आज अपने आस-पास देखता है। इस प्रकार एक आधुनिक धारणा 12,000 वर्ष पुराने दृश्य पर पुत जाती है — और फिर उसे ही प्रमाण मान लिया जाता है।