अन्वेषण अध्याय 4 महत्वपूर्ण प्रश्न

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
हम ऐतिहासिक काल की गणना किस प्रकार करते हैं?
उत्तर

ऐतिहासिक काल की गणना हम तिथिपत्र (कैलेंडर), युग एवं समय-रेखा की सहायता से करते हैं। प्रत्येक समाज एवं संस्कृति के पास समय गिनने की अपनी प्रणालियाँ रही हैं; आज विश्व मुख्यत: एक साझा प्रणाली का उपयोग करता है ताकि सभी लोग एक ही घटना को एक ही बिंदु पर रख सकें।

चरण 1 — एक आरंभ-बिंदु (युग) चुनिए। युग समय का एक निश्चित कालखंड है। किसी व्यक्ति विशेष का जन्म अथवा किसी शासक के शासन का आरंभ प्राय: एक नए युग का आरंभ माना जाता रहा है। आज विश्व-भर में प्रयुक्त ग्रेगोरियन कैलेंडर ईसा मसीह के जन्म वर्ष को आरंभ मानता है। इसके साथ-साथ हिंदू, मुस्लिम, यहूदी, चीनी आदि तिथिपत्र भी त्योहारों एवं मांगलिक कार्यों की तिथियों के लिए प्रयोग होते हैं।

चरण 2 — उससे आगे और पीछे गिनिए।

आरंभ-बिंदु के बाद के वर्ष → पहले ए.डी. → अब सा.सं. (सामान्य संवत, अंग्रेज़ी में CE)
आरंभ-बिंदु से पूर्व के वर्ष → पहले बी.सी. → अब सा.सं.पू. (सामान्य संवत पूर्व, अंग्रेज़ी में BCE)
भारत की स्वतंत्रता = 1947 ई. = ई. सन् 1947 = 1947 सा.सं.
बुद्ध का जन्म ≈ 560 सा.सं.पू.

चरण 3 — याद रखिए कि 'शून्य वर्ष' नहीं होता। 1 सा.सं.पू. के तुरंत बाद 1 सा.सं. आता है। अत: किसी सा.सं.पू. एवं सा.सं. तिथि के बीच के वर्ष = सा.सं.पू. + सा.सं. – 1

चरण 4 — सही माप चुनिए।

इकाईअवधिगणना का नियमअध्याय से उदाहरण
वर्ष1 वर्षतिथिपत्र की मूल इकाई1947 सा.सं.
दशक10 वर्षदस वर्षों का कोई भी कालखंड1990 का दशक
शताब्दी100 वर्षसा.सं. की गणना 1 सा.सं. से; सा.सं.पू. की गणना 1 सा.सं.पू. से पीछे की ओर21वीं शताब्दी सा.सं. = 2001–2100
तीसरी शताब्दी सा.सं.पू. = 300–201 सा.सं.पू.
सहस्त्राब्दी1,000 वर्षवही नियम, हज़ारों मेंतीसरी सहस्त्राब्दी सा.सं. = 2001–3000
पहली सहस्त्राब्दी सा.सं.पू. = 1000 सा.सं.पू.–1 सा.सं.पू.

चरण 5 — समय-रेखा बनाइए। समय-रेखा किसी अवधि की तिथियों एवं घटनाओं का अनुक्रम दिखाती है, इसलिए तिथियाँ पढ़े बिना ही घटनाओं का क्रम दिख जाता है। नीचे अध्याय का अपना चित्र 4.3 (पृष्ठ 62–63) मापानुसार पुन: बनाया गया है —

10,000 सा.सं.पू.8000 सा.सं.पू. 6000 सा.सं.पू.4000 सा.सं.पू.2000 सा.सं.पू. 1 सा.सं.2000 सा.सं. 12,000 सा.सं.पू. अंतिम हिम युग का अंत लगभग 8000 सा.सं.पू. प्रथम स्थायी निवास व कृषि का आरंभ लगभग 4500 सा.सं.पू. तांबे के प्रथम धातुकर्म का आरंभ 560 सा.सं.पू. बुद्ध का जन्म लगभग 250 सा.सं.पू. अशोक लगभग 6000 सा.सं.पू. भारतीय उपमहाद्वीप में मिट्टी के बर्तन बनाने की तकनीक लगभग 4700 सा.सं.पू. मेसोपोटामिया में संसार का प्रथम नगर लगभग 2500 सा.सं.पू. सिंधु-सरस्वती सभ्यता 1 सा.सं. ईसा का जन्म 2000 सा.सं. हम इस काल खंड में हैं
अध्याय की समय-रेखा (चित्र 4.3, पृष्ठ 62–63) सही माप में — 780 पिक्सल = 14,000 वर्ष। लाल रेखा के बाईं ओर सा.सं.पू. तिथियाँ हैं और दाईं ओर सा.सं.; लाल रेखा वही जोड़ है जहाँ 1 सा.सं.पू. के तुरंत बाद 1 सा.सं. आता है — बीच में कोई शून्य वर्ष नहीं।
ध्यान दें: पुस्तक के चित्र 4.3 में एक बिंदुकृत भाग है, जो छोड़े गए कालखंड को दर्शाता है। यदि पूरे 3,00,000 वर्ष उसी माप में बनाए जाते, तो समय-रेखा लगभग 3 मीटर लंबी हो जाती!
प्र2.
इतिहास को समझने के लिए विभिन्न स्रोत हमारी किस प्रकार सहायता कर सकते हैं?
उत्तर

प्रत्येक वस्तु अथवा संरचना एक कहानी बताती है और चित्र-खंड पहेली (जिग्सॉ) के एक हिस्से की तरह होती है। अकेला एक टुकड़ा बहुत कम बताता है; अनेक टुकड़े मिलकर अतीत का चित्र बनाते हैं। इतिहास का स्रोत वह स्थान, व्यक्ति, लेख अथवा वस्तु है जिससे हम अतीत की किसी घटना अथवा कालखंड की जानकारी एकत्र करते हैं।

पृष्ठ 67 का चित्र इन्हें चार वर्गों में बाँटता है —

स्रोतों का वर्गइसमें क्या-क्या (पृष्ठ 67)यह क्या बताता हैभारतीय उदाहरण
पुरातात्विक स्रोतशिलालेख — पांडुलिपि, ताम्रपत्र, सिक्के
संरचना — स्मारक, टीला
उत्खनन — मानव, पशु तथा पौधों के अवशेष; उपकरण एवं हथियार; मूर्तियाँ एवं आभूषण; मृदभांड एवं खिलौने; निवास स्थान एवं शवाधान
तिथियाँ, शासकों के नाम एवं उपाधियाँ, राजाज्ञाएँ, व्यापार, तकनीक, भोजन, शिल्प, नगर-नियोजन, शवाधान की प्रथाएँअशोक के शिलालेख एवं स्तंभलेख (तीसरी शताब्दी सा.सं.पू.); समुद्रगुप्त का प्रयागराज स्तंभलेख; रुद्रदामन का जूनागढ़ शिलालेख; गुप्तकालीन स्वर्ण सिक्के; साँची स्तूप; हड़प्पा, राखीगढ़ी एवं धौलावीरा के टीले
साहित्यिक स्रोतभारतीय साहित्य — वेद एवं इतिहास, कविता एवं नाटक, ऐतिहासिक लेख, कहानियों का संग्रह, वैज्ञानिक एवं तकनीकी लेख
विदेशी विवरण — यात्रा वृत्तांत, ऐतिहासिक वृत्तांत
विचार, विश्वास, विधि, विज्ञान, दैनिक जीवन, और यह कि बाहर के लोगों ने भारत को कैसे देखाचारों वेद; रामायण एवं महाभारत; तमिल संगम साहित्य; कालिदास के नाटक; कल्हण की राजतरंगिणी; आर्यभटीय एवं चरक संहिता; पंचतंत्र एवं जातक कथाएँ; मेगस्थनीज़, फ़ाह्यान, ह्वेनसांग, अल-बिरूनी एवं इब्न बतूता के विवरण
मौखिक स्रोतलोक साहित्य; वंशावलीपरिवार एवं समुदाय की स्मृति, स्थानीय किंवदंतियाँ, लोकगीत एवं कहावतें जो कभी लिखी नहीं गईंगाँव की किंवदंतियाँ एवं लोकगाथाएँ; तीर्थस्थानों पर पंडों द्वारा रखी गई वंशावलियाँ
कलात्मक स्रोतचित्रकला, मूर्तिकला, पट्टिका (पैनल)वस्त्र, आभूषण, वाद्ययंत्र, नौकाएँ, हथियार, देवता एवं लोगों की प्रिय कथाएँभीमबेटका के शैल-चित्र; अजंता की चित्रकारी; साँची की पट्टिकाएँ; चोल कांस्य मूर्तियाँ

अध्याय दो और प्रकार के स्रोत जोड़ता है —

  • वैज्ञानिक अध्ययन — पिछले लगभग 50 वर्षों में प्राचीन जलवायु का अध्ययन, उत्खनन की गई सामग्री का रासायनिक अध्ययन तथा प्राचीन मानव की आनुवांशिकी ने ऐसे नए दृष्टिकोण दिए हैं जो सामान्य स्रोतों के पूरक हैं।
  • आधुनिक इतिहास (पिछली दो-तीन शताब्दियाँ) के लिए समाचार-पत्र, और पिछले कुछ दशकों के लिए इलेक्ट्रॉनिक मीडिया — टी.वी., इंटरनेट आदि।
इतिहासकार अनेक स्रोतों पर ज़ोर क्यों देते हैं: कभी-कभी स्रोत एक-दूसरे की पुष्टि करते हैं — पहेली के टुकड़े मेल खाते हैं। कभी वे एक-दूसरे के विपरीत सूचनाएँ देते हैं — टुकड़े मेल नहीं खाते — और तब इतिहासकार को तय करना पड़ता है कि किस स्रोत पर अधिक विश्वास किया जाए। इसी सावधानी से किसी कालखंड के इतिहास का पुनर्निर्माण होता है। और यह ईमानदार काम है: इतिहास में पहेली के कुछ हिस्से सदा के लिए गायब रह सकते हैं
क्या आप जानते हैं? इन स्रोतों को बोलने योग्य बनाने वाले केवल इतिहासकार नहीं हैं। पुरातत्व विज्ञानी उत्खनन करते हैं, पुरालेखशास्त्री प्राचीन अभिलेख पढ़ते हैं, मानव विज्ञानी समाजों एवं संस्कृतियों का अध्ययन करते हैं, तथा साहित्य व भाषा के विशेषज्ञ पुराने ग्रंथ पढ़ते हैं — सभी उसी पहेली में योगदान देते हैं।
प्र3.
आदिमानव किस प्रकार रहते थे?
उत्तर

मानव (होमो सेपियंस) लगभग 3,00,000 (तीन लाख) वर्ष से पृथ्वी पर हैं। इसमें से लगभग पूरा समय वे आखेटक एवं खाद्य संग्राहक रहे; कृषि केवल पिछले दस हज़ार वर्षों में आरंभ हुई। अध्याय यह कहानी दो चरणों में बताता है।

चरण 1 — कृषि से पहले

  • वे टोलियों अथवा समूहों में रहते थे, ताकि प्रकृति की अनेक चुनौतियों में एक-दूसरे की सहायता कर सकें।
  • वे आखेटक एवं खाद्य संग्राहक थे — वे आखेट करते और खाने योग्य पौधे व फल एकत्र करते थे, तथा भोजन एवं आश्रय की निरंतर खोज में रहते थे।
  • वे अस्थायी शिविरों, शैलाश्रयों अथवा गुफाओं में रहते थे।
  • वे जिन भाषाओं में संवाद करते थे वे अब लुप्त हो चुकी हैं, और उन्होंने अग्नि का उपयोग किया।
  • वे उपकरण बनाते गए — पत्थर की उन्नत कुल्हाड़ियाँ एवं ब्लेड्स, नुकीले तीर आदि।
  • वे चित्र बनाते थे। संपूर्ण विश्व की सैकड़ों गुफाओं में शैल-चित्र मिलते हैं — कुछ साधारण आकृतियों एवं प्रतीकों के, कुछ अधिक विस्तृत दृश्य जिनमें पशु एवं मानव हैं।
  • वे आभूषण बनाते थे — पत्थर एवं मनकों की माला, पशुओं के दाँतों के पेंडेंट — और कभी-कभी दूसरे समूहों से इनका आदान-प्रदान करते थे।
  • उनके विश्वास थे — प्राकृतिक तत्वों को लेकर, और संभवत: मरणोपरांत जीवन को लेकर भी।

चरण 2 — अंतिम हिम युग के बाद

अंतिम हिम युग: लगभग 1,00,000 (एक लाख) वर्ष पूर्व → से लगभग 12,000 वर्ष पूर्व तक
फिर जलवायु गरम हुई, हिम पिघला, नदियाँ भरीं और समुद्रों में समाहित हुईं
जीने योग्य परिस्थितियों में सुधार → लोग एक स्थान पर बसने लगे
  • विश्व के कई हिस्सों में लोगों ने अनाज उगाना तथा गाय, बकरी आदि जानवरों का घरेलूकरण आरंभ किया।
  • भोजन की अधिक उपलब्धता से समूह आकार व संख्या में बढ़े और प्राय: नदियों के किनारे बसे — केवल जल के लिए नहीं, बल्कि इसलिए भी कि वहाँ की मृदा अधिक उपजाऊ होती है, जिससे अन्न उगाना सरल हो जाता है।
  • समाज जटिल होता गया। सरदार अथवा मुखिया लोगों के कल्याण के लिए उत्तरदायी थे और सभी सामूहिक रूप से सामुदायिक कल्याण के लिए कार्य करते थे। निजी स्वामित्व का भाव नहीं था: भूमि पर सामुदायिक रूप से कृषि होती थी।
  • पल्ली बड़े गाँवों में बदल गईं जो भोजन, वस्त्र एवं उपकरणों का आदान-प्रदान करती थीं; उनमें संप्रेषण एवं आवागमन का तंत्र विकसित हुआ और कुछ गाँव छोटे कस्बों में बदल गए।
  • नई तकनीकें आईं — मृदभांड, तथा धातु का उपयोग (पहले तांबा, फिर लोहा) जिससे टिकाऊ उपकरण, दैनिक उपयोग की वस्तुएँ एवं आभूषण बनाना सरल हुआ।
यह आरंभिक प्रगति कभी सुरक्षित नहीं थी: अध्याय एक चेतावनी के साथ यह कहानी समाप्त करता है। मानव सभ्यता को अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ा और कुछ कठिन क्षणों में वह कुछ पूर्ववर्ती प्रजातियों की भाँति लुप्त भी हो सकती थी। हम उन आदिमानवों को कभी नहीं जान पाएँगे जिनके साहस और दृढ़ता के कारण आज हमारा अस्तित्व संभव है।
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