अन्वेषण अध्याय 6 आगे बढ़ने से पहले ...

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
सिंधु, हड़प्पा या सिंधु-सरस्वती सभ्यता विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक है। हड़प्पावासियों ने कुशल जल प्रबंधन, विविध शिल्पों और सक्रिय व्यापार के साथ सुनियोजित नगरों का निर्माण किया।
उत्तर

इस एक वाक्य को खोलिए और अध्याय के पहले दो-तिहाई भाग हाथ आ जाते हैं। इसका हर वाक्यांश किसी न किसी विशिष्ट प्रमाण पर टिका है।

वाक्यांशउसके पीछे का प्रमाण
“विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक”महानगर लगभग 2600 सा.सं.पू. से। चित्र 6.2 की सभ्यताओं में केवल मेसोपोटामिया (लगभग 4000 सा.सं.पू.) और मिस्र (लगभग 3100 सा.सं.पू.) इससे पुराने हैं
“सुनियोजित नगर”“सुनियोजित योजना के अंतर्गत निर्मित”; चौड़ी सड़कें चारों दिशाओं की ओर उन्मुख; किलेबंदी; ऊपरी और निचला नगर (धौलावीरा में तीन क्षेत्र); छोटे-बड़े घरों की एक जैसी गुणवत्ता
“कुशल जल प्रबंधन”स्नानागार सड़कों के नीचे की ढकी नालियों से जुड़े; मोहनजो-दड़ो में लगभग 700 ईंट के कुएँ; धौलावीरा में छह या अधिक जलाशय, सबसे बड़ा 73 मीटर, जल संचयन और वितरण के लिए भूमिगत नालियों से जुड़े; जल-रोधक और पुन: भरा जा सकने वाला महास्नानागार
“विविध शिल्प”कार्नेलियन मनकों में छेद और सजावट; सख्त शंख से चूड़ियाँ; तांबे और कांस्य का काम; हाथी दाँत की नक्काशी; कपास की बुनाई; मिट्टी के बर्तन; खिलौने और खेल
“सक्रिय व्यापार”आंतरिक और बाहरी; स्थल मार्ग, नदियाँ और समुद्र; सूसा (ईरान) में मनके और ओमान में कंघा; लोथल का 217 × 36 मीटर का बंदरगाह; सामान और व्यापारी पहचानने के लिए हजारों मुहरें

तीन नाम, एक ही सभ्यता। प्रश्न जिस नाम का प्रयोग करे, वही लिखिए — पर यह जानिए कि पुस्तक ‘हड़प्पा’ या ‘सिंधु-सरस्वती’ को क्यों चुनती है : पहला तटस्थ है, दूसरा भौगोलिक रूप से ईमानदार, और ‘सिंधु घाटी’ इनमें से कुछ भी नहीं।

सुझाव : यदि प्रश्न हो “हड़प्पाई नगरों की नगर-योजना का वर्णन कीजिए”, तो चार शब्द — योजना – सड़कें – किलेबंदी – दो नगर — उत्तर आरंभ करा देंगे, और चार शब्द — स्नानागार – नालियाँ – कुएँ – जलाशय — उसे पूरा कर देंगे।
प्र2.
उपजाऊ कृषि से नगरों को विभिन्न प्रकार की फसलें प्राप्त हुईं।
उत्तर

यह सभ्यता की सातवीं विशेषता का पूरी तरह पूरा होना है — और यही वह आधार है जिस पर बाकी सब टिका है।

क्या उगाया या पालाअध्याय से विवरण
अनाजजौ, गेहूँ, कुछ मोटे अनाज, बाजरा और कभी-कभी धान
दलहनसेम, मटर के दाने और दालें
सब्जियाँ“अनेक किस्म की सब्जियाँ”
कपासयूरेशिया में कपास उगाने वाले वे प्रथम थे, और उससे कपड़ा बुनते थे
पशु और मछलीमांस के लिए पालतू पशु; नदियों और समुद्र दोनों में मछली — खुदाई में मिलीं पशुओं की हड्डियों और मत्स्य जीवाश्म से ज्ञात
पकाने के पात्रों मेंदुग्ध उत्पाद और — आश्चर्यजनक रूप से — हल्दी, अदरक और केला

दो बातों ने इसे संभव बनाया। पहली, स्थान : बस्तियाँ बड़ी और छोटी नदियों के किनारे बसाई गईं, “सिर्फ जल स्रोतों तक आसानी से पहुँचने के लिए ही नहीं, बल्कि कृषि की दृष्टि से भी, क्योंकि नदियाँ अपने आस-पास की भूमि को उपजाऊ बनाती हैं”। दूसरी, उपकरण : उन्होंने हल सहित खेती के कई उपकरण बनाए — और हरियाणा के बनावली से मिला मिट्टी का लघु प्रतिरूप (चित्र 6.9) उसी आकार का है जिसका उपयोग आधुनिक किसान आज भी करते हैं।

वह वाक्य जो पूरी सभ्यता को समझा देता है : “यह गहन कृषि गतिविधि सैकड़ों छोटे ग्रामीण स्थलों अथवा गाँवों द्वारा संचालित की जाती थी। अभी की तरह तब भी ग्रामीण क्षेत्रों से पर्याप्त कृषि उपज प्रतिदिन उपलब्ध होने पर ही नगर जीवित रह सकते थे।” हड़प्पाई नगर वास्तव में एक बहुत बड़े ग्रामीण क्षेत्र का दिखाई देने वाला शिखर था — और जब उस ग्रामीण क्षेत्र पर सूखा और मरती नदी टूटी, तो सबसे पहले शिखर ही गिरा।
क्या आप जानते हैं? कपास हड़प्पावासियों का सबसे मौन विश्व-कीर्तिमान है। उसे उगाना, कातना और बुनना पूरे यूरेशिया में सबसे पहले यहीं हुआ — और उसके बाद अगले चार हजार वर्ष तक भारतीय सूती कपड़ा विश्व की सबसे वांछित वस्तुओं में रहा।
प्र3.
इस सभ्यता का जलवायु संबंधी और पर्यावरणीय परिवर्तनों के कारण अंततः ह्रास हो गया; लोग ग्रामीण जीवन-शैली की ओर लौट गए।
उत्तर

वाक्य ध्यान से पढ़िए : इसमें “ह्रास” लिखा है, “विनाश” नहीं; और “कारण” के साथ ‘निश्चित रूप से’ नहीं। दोनों बातें सोच-समझकर लिखी गई हैं।

लगभग 2200 सा.सं.पू. → विश्व के बड़े भाग को प्रभावित करने वाला जलवायु परिवर्तन : कम वर्षा, शुष्कता
→ कृषि कठिन हुई, नगरों तक खाद्य आपूर्ति घटी
सरस्वती का मध्य बेसिन सूखा → कालीबंगा, बनावली अचानक छोड़े गए
लगभग 1900 सा.सं.पू. → नगर एक के बाद एक खाली; पूर्ववर्ती प्रशासन समाप्त
→ हड़प्पावासी सैकड़ों-हजारों छोटी ग्रामीण बस्तियों में बिखर गए

‘संभवत:’ क्यों। पुस्तक जोड़ती है — “इसमें अन्य कारण भी रहे होंगे।” उस समय का लिखा हुआ कोई विवरण नहीं है और कोई पढ़ी जा सकने वाली लिपि नहीं बची। दो कारणों पर सहमति है; शेष खुला है।

‘ग्रामीण जीवन-शैली की ओर लौट गए’, ‘लुप्त हो गए’ नहीं। लोग न मरे, न भगाए गए। वे वहाँ गए जहाँ भोजन और जल सहज थे — पृष्ठ 102 के ‘आइए विचार करें’ की यही बात है — और अपने कौशल साथ ले गए। “यद्यपि नगर लुप्त हो गए, लेकिन हड़प्पा की संस्कृति एवं प्रौद्योगिकी अधिकांशत: बची रही और यह भारतीय सभ्यता के अगले चरण में पहुँच गई।”

अध्याय स्वयं जो सीख निकालता है : “ये दो कारण हमें याद दिलाते हैं कि हम अपने कल्याण के लिए अपनी जलवायु और पर्यावरण पर कितने निर्भर हैं।” जिस सभ्यता के पास प्राचीन विश्व की सर्वोत्तम नालियाँ, शानदार शिल्प और समुद्री व्यापार था, वह वर्षा के बदलाव से अधिक चतुर सिद्ध नहीं हो सकी। ऐसी शताब्दी में, जब जलवायु फिर बदल रही है, यह सोचने योग्य बात है।
सावधान : पुरानी पुस्तकें इन नगरों के अंत के लिए किसी ‘आर्य आक्रमण’ को दोषी ठहराती थीं। यह अध्याय स्पष्ट कहता है कि युद्ध या आक्रमण का कोई निशान नहीं मिलता, न सेना, न युद्ध के हथियार। यदि आप उत्तर में ‘आक्रमण’ लिखते हैं, तो आप वह लिख रहे हैं जिसका प्रमाणों से खंडन होता है।
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