अन्वेषण अध्याय 6 प्रश्न, क्रियाकलाप और परियोजनाएँ

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
इस अध्याय में अध्ययन की गई सभ्यता के अनेक नाम क्यों हैं? इनके महत्व पर चर्चा कीजिए।
उत्तर

क्योंकि खोज के अलग-अलग चरणों में अलग-अलग लोगों ने इसे बार-बार नाम दिया — और हर नाम यह दर्ज करता है कि उस समय तक क्या ज्ञात था

नामकहाँ से आयाक्या दावा करता है — और उसका मूल्य
हड़प्पा सभ्यताहड़प्पा से, जो 1920–21 में इस सभ्यता का पहला उत्खनित नगर था; इसीलिए इसके निवासी हड़प्पावासी कहलाते हैंतटस्थ और सुरक्षित। यह किसी क्षेत्र का नहीं, एक पुरास्थल का नाम है, इसलिए नई खोज इसे गलत सिद्ध नहीं कर सकती — यही कारण है कि पुरातत्ववेत्ता इसे पसंद करते हैं
सिंधु सभ्यतासिंधु नदी से, जिसके किनारे हड़प्पा और मोहनजो-दड़ो मिलेसही, पर अधूरा। अनेक पुरास्थल सिंधु के आस-पास हैं ही नहीं
सिंधु घाटी सभ्यतावही नदी, साथ में ‘घाटी’ — यह शब्द तब चला जब केवल सिंधु के पुरास्थल ज्ञात थेअप्रचलित। मानचित्र (चित्र 6.3) दिखाता है कि सभ्यता “सिंधु क्षेत्र से बहुत आगे तक फैली हुई थी”। पुस्तक जान-बूझकर इसका प्रयोग नहीं करती
सिंधु-सरस्वती सभ्यतादोनों नदी-प्रणालियाँ — सिंधु और सरस्वती (आज की घग्गर-हाकरा)सबसे सटीक। अकेली सरस्वती की द्रोणी में दो महानगर (राखीगढ़ी, गँवेरीवाला), अनेक छोटे नगर (फरमाना, कालीबंगा) और कुछ अन्य नगर (भिर्राना, बनावली) हैं — तथा मानचित्र पर पुरास्थलों की सर्वाधिक सघनता भी

महत्व — इन नामों से तीन बातें सीखने को मिलती हैं।

  1. नाम भी एक प्रमाण है, जिसकी अपनी तिथि होती है। ‘सिंधु घाटी’ बताता है कि 1920 के दशक में लोग क्या जानते थे, यह नहीं कि सत्य क्या है।
  2. हर नाम एक छिपा दावा करता है। ‘सिंधु’ कहते ही आपने चुपचाप कह दिया कि यह सभ्यता एक नदी की थी। ‘सिंधु-सरस्वती’ कहते ही आपने उसका दूसरा आधा भाग लौटा दिया।
  3. ज्ञान बढ़ता है, इसलिए नाम बदलने पड़ते हैं। “इस प्रकार की खोजें आज भी जारी हैं” — राखीगढ़ी, धौलावीरा, भिर्राना और लोथल तब अज्ञात थे जब पहला नाम दिया गया।
सुझाव : परीक्षा के लिए सबसे सुरक्षित वाक्य — “पहले उत्खनित पुरास्थल के नाम पर इसे हड़प्पा सभ्यता कहा जाता है, जिस नदी के किनारे यह पहले मिली उसके नाम पर सिंधु सभ्यता, और सरस्वती की द्रोणी में इसके बहुत बड़े विस्तार के कारण सिंधु-सरस्वती सभ्यता; ‘सिंधु घाटी सभ्यता’ अब अप्रचलित माना जाता है।”
प्र2.
सिंधु-सरस्वती सभ्यता की उपलब्धियों का सार देते हुए संक्षिप्त रिपोर्ट (150 से 200 शब्द) लिखिए।
उत्तर

पहले रूपरेखा बनाइए, फिर लिखिए। 150–200 शब्दों में लगभग छह वाक्य आते हैं, इसलिए छह उपलब्धियाँ चुनिए और हर एक के साथ एक तथ्य दीजिए।

वाक्यउपलब्धिजो तथ्य अवश्य दीजिए
1कब और कहाँमहानगर लगभग 2600 से 1900 सा.सं.पू., सिंधु और सरस्वती के किनारे
2नगर-योजनासुनियोजित योजना; चारों दिशाओं की ओर चौड़ी सड़कें; किलेबंदी; ऊपरी और निचला नगर
3जल प्रबंधनसड़कों के नीचे ढकी नालियाँ; मोहनजो-दड़ो में लगभग 700 कुएँ; धौलावीरा में 73 मीटर का जलाशय
4शिल्प और धातु विज्ञानकार्नेलियन मनके, शंख की चूड़ियाँ, तांबा और कांस्य
5व्यापारसूसा में मनके, ओमान में कंघा, लोथल का 217 मीटर का बंदरगाह, हजारों मुहरें
6कृषि और समाजयूरेशिया में कपास उगाने वाले प्रथम; निर्माण की समान गुणवत्ता; युद्ध के हथियार नहीं
नमूना उत्तर (लगभग 185 शब्द) :
“सिंधु-सरस्वती सभ्यता, जिसे हड़प्पा सभ्यता भी कहा जाता है, भारत की पहली सभ्यता थी। इसके महानगर लगभग 2600 से 1900 सा.सं.पू. तक सिंधु और सरस्वती नदियों के किनारे फले-फूले और यह विश्व की सबसे पुरानी सभ्यताओं में से एक है।
इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि नगर-योजना थी। मोहनजो-दड़ो, हड़प्पा, धौलावीरा और राखीगढ़ी जैसे नगर सुनियोजित योजना के अंतर्गत बने, जिनमें चारों दिशाओं की ओर उन्मुख चौड़ी सड़कें, किलेबंदी तथा ऊपरी और निचला नगर थे। उल्लेखनीय है कि छोटे और बड़े घरों के निर्माण की गुणवत्ता एक समान थी।
उनका जल प्रबंधन असाधारण था। घरों के स्नानागार सड़कों के नीचे बहने वाली नालियों से जुड़े थे; मोहनजो-दड़ो में लगभग 700 ईंट के कुएँ थे और धौलावीरा में कम से कम छह जलाशय, जिनमें सबसे बड़ा 73 मीटर लंबा था।
हड़प्पावासी कुशल कारीगर थे — उन्होंने कार्नेलियन मनकों में छेद किए, शंख की चूड़ियाँ बनाईं और कांस्य के उपकरण तथा प्रतिमाएँ ढालीं — और स्थल, नदी तथा समुद्र के मार्ग से सक्रिय व्यापार किया; उनके मनके ईरान के सूसा में मिले हैं और लोथल में 217 मीटर लंबा बंदरगाह था।
वे अनेक फसलें उगाते थे और यूरेशिया में कपास उगाने वाले प्रथम थे। सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि उन्होंने युद्ध का कोई हथियार नहीं छोड़ा।”
रिपोर्ट लंबी नहीं, ठोस होनी चाहिए : हर वाक्य में एक निश्चित संख्या रखिए। ‘उनकी जल-व्यवस्था अच्छी थी’ एक राय है; ‘मोहनजो-दड़ो में लगभग 700 ईंट के कुएँ’ इतिहास है।
प्र3.
कल्पना कीजिए कि आपको हड़प्पा से कालीबंगा तक यात्रा करनी है। आपके पास विभिन्न विकल्प क्या हैं? क्या आप प्रत्येक विकल्प में लगने वाले समय का अनुमान लगा सकते हैं?
उत्तर

पहले चित्र 6.3 पर दोनों नगर ढूँढ़िए। हड़प्पा आज के पाकिस्तानी पंजाब में रावी नदी पर है; कालीबंगा उससे दक्षिण-पूर्व में, आज के राजस्थान में सरस्वती (घग्गर) पर।

सीधी रेखा में दूरी : लगभग 180 कि.मी.
नदियों के साथ चलने वाला वास्तविक मार्ग : लगभग 250–300 कि.मी.

क. लगभग 2500 सा.सं.पू. के हड़प्पाई यात्री के विकल्प

विकल्पअनुमानित गति~280 कि.मी. में समयटिप्पणी
पैदल20–25 कि.मी. प्रतिदिनलगभग 12–14 दिनसबसे सस्ता और सबसे प्रचलित तरीका। बोझ हो तो और अधिक समय
बैलगाड़ी से15–20 कि.मी. प्रतिदिनलगभग 15–19 दिनपैदल से धीमी, पर सामान ढो सकती है। हड़प्पाई गाड़ियाँ मिट्टी के प्रतिरूपों से ज्ञात हैं
कुछ दूरी नाव सेधारा के साथ 25–40 कि.मी. प्रतिदिन; धारा के विरुद्ध बहुत धीमीलगभग 10–15 दिन, बीच में पैदल चलना अलगरावी से नीचे, फिर सरस्वती की ओर। ऋतु पर निर्भर — वर्षा के बाद नदियाँ भरी होती हैं
मिला-जुला — सबसे संभावितजहाँ नदी सहायक हो वहाँ नाव, अन्यत्र गाड़ी या पैदललगभग दो सप्ताहवास्तविक व्यापारी हर हिस्से में सबसे तेज साधन चुनते

ख. आज के विकल्प

  • सड़क मार्ग से, यदि रास्ता खुला हो : लगभग 350–400 कि.मी., कार से 6–8 घंटे
  • रेल और सड़क से : बदलावों सहित लगभग एक दिन।
  • असली बाधा दूरी नहीं है। हड़प्पा पाकिस्तान में है और कालीबंगा भारत में, इसलिए आज इस यात्रा के लिए वीज़ा और सीमा पार करना आवश्यक है — और उसमें उन चौदह दिनों से कहीं अधिक समय लग सकता है जो एक हड़प्पाई व्यापारी को लगते थे।
प्रश्न का मर्म : हड़प्पा से कालीबंगा एक व्यापारी लगभग पखवाड़े में पहुँच जाता था, और दोनों नगरों में एक जैसी ईंटें, एक जैसे बाट और एक जैसी मुहरें मिलती हैं। इसका अर्थ है कि ये अलग-थलग कस्बे नहीं, एक जुड़ा हुआ जाल थे — और इस अध्याय में ‘सभ्यता’ का यही अर्थ है। और यह कि आज एक सीमा उस जाल को दो टुकड़ों में काट देती है, यह स्वयं ध्यान देने योग्य इतिहास है।
स्वयं जाँचिए : पृष्ठ 89 के चित्र 6.3 में नीचे बाईं ओर छपी मापनी (स्केल) का उपयोग कीजिए और स्केल से दोनों बिंदुओं के बीच की दूरी नापिए। आपका उत्तर सीधी रेखा में लगभग 180 कि.मी. के आस-पास आना चाहिए। मापनी से दूरी का अनुमान लगाना अभ्यास योग्य कौशल है।
प्र4.
कल्पना कीजिए कि यदि हड़प्पा के किसी पुरुष या महिला को हम आज के भारत के सामान्य रसोईघर में ले आते हैं, तो उन्हें सबसे बड़े चार या पाँच आश्चर्य क्या लगेंगे?
उत्तर

पहले यह देखिए कि उन्हें क्या परिचित लगेगा, ताकि आश्चर्य उभरकर सामने आएँ। गेहूँ और जौ का आटा, दाल, दही, हल्दी, अदरक, केला, मिट्टी के पात्र, चक्की और तवा — ये सब उन्हें जाने-पहचाने लगेंगे। अब आश्चर्य :

क्र.आश्चर्यवे चकित क्यों होंगे
1घुंडी घुमाते ही आ जाने वाली आग — गैस चूल्हावे लकड़ी या उपले की आग पर पकाते थे, जिसे जलाना और सँभालना पड़ता था। बिना ईंधन, बिना धुएँ और बिना राख की लौ उन्हें जादू लगेगी
2घर के भीतर नल से, जब चाहे तब आता जलवे प्राचीन विश्व के सबसे बड़े जल-अभियंता थे — कुएँ, नालियाँ, जलाशय, महास्नानागार। पर घर के भीतर दाब के साथ आता जल वे कभी नहीं कर सके, और इसका मूल्य वे सबसे अधिक समझेंगे
3रेफ्रिजरेटर — गरम देश में एक ठंडा बक्साउनके संसार में भोजन को खराब होने से बचाने का कोई उपाय नहीं था, सिवाय सुखाने, नमक लगाने और जल्दी खा लेने के। जुलाई में सर्दी बना देने वाला बक्सा उस कमरे की सबसे विचित्र वस्तु होगी
4कभी न देखा हुआ भोजन : आलू, टमाटर, मिर्च, चाय, चीनीये सब 1900 सा.सं.पू. के बहुत बाद भारत पहुँचे — मिर्च, आलू और टमाटर तो अमेरिका से लगभग 500 वर्ष पहले। आज की रसोई की मूल वस्तुएँ उनके लिए बिल्कुल अनजानी होंगी
5इस्पात, प्लास्टिक और काँच — और छपे हुए पैकेटवे तांबा, कांस्य, पत्थर, शंख, हाथी दाँत और टेराकोटा जानते थे। इस्पात का कुकर, प्लास्टिक की बोतल और लिखावट वाला बंद पैकेट — हर एक नई सामग्री भी है और नया विचार भी

यदि शिक्षक एक और आश्चर्य पूछें : चारों ओर फैली लिखावट — पैकेटों पर, कैलेंडर पर, मशीनों पर। उनकी अपनी लिपि थी, पर हमारी उन्हें अपठनीय लगेगी — ठीक वैसे ही जैसे उनकी हमें।

नमूना उत्तर : “पहला आश्चर्य गैस चूल्हा होगा, क्योंकि उनके यहाँ आग लकड़ी से आती थी और उसे सँभालना पड़ता था। दूसरा नल होगा : हड़प्पावासियों ने कुएँ, नालियाँ और जलाशय बनाए थे, इसलिए घर के भीतर बहता स्वच्छ जल उन्हें सबसे अधिक प्रभावित करेगा। तीसरा रेफ्रिजरेटर होगा, गरम देश में एक ठंडा बक्सा। चौथा स्वयं भोजन होगा — आलू, टमाटर, मिर्च, चाय और चीनी, जो उनके भारत में थे ही नहीं। पाँचवाँ इस्पात और प्लास्टिक होगा, जो उन्होंने कभी नहीं देखे। पर हल्दी, अदरक और दाल उठाकर वे ठीक-ठीक जान जाएँगे कि उनका क्या करना है।”
यह प्रश्न वास्तव में निरंतरता का है : देखने में खेल लगता है, पर यह आपसे अलग करवाता है कि क्या बदला (तकनीक और सामग्री) और क्या नहीं बदला (अनाज, मसाले, दाल, रोटी, चक्की)। चार हजार वर्षों ने रसोई बदल दी; भोजन-सूची उतनी नहीं बदली।
प्र5.
इस अध्याय के सभी चित्रों पर दृष्टि डालते हुए उन आभूषणों / हाव-भावों / वस्तुओं की सूची बनाइए, जो अभी भी 21वीं शताब्दी में परिचित प्रतीत होती हैं।
उत्तर

अध्याय के चित्र एक-एक करके देखिए। सूची अधिकांश विद्यार्थियों की अपेक्षा से लंबी निकलती है।

वर्गक्या-क्या दिखता हैकहाँ
आभूषणपूरी बाँह ढँकने वाली चूड़ियाँ — ‘नर्तकी’ की, और पृष्ठ 85 के छायाचित्र में बैठी महिला की
हार और मनकों की मालाएँ
कार्नेलियन मनके, जो आज भी गुजरात में बनते और बिकते हैं
शंख की चूड़ियाँ, जो भारत के कई भागों में आज भी पहनी जाती हैं
चित्र 6.15.4; चित्र 6.1; चित्र 6.10
हाव-भाव‘नमस्ते’ — हथेलियाँ जोड़े बैठी टेराकोटा मूर्ति, ठीक वैसे जैसे आज लोग अभिवादन करते हैं
कमर पर हाथ रखने की, आज भी बिल्कुल आधुनिक लगने वाली मुद्रा
चित्र 6.15.5; चित्र 6.15.4
दैनिक उपयोग की वस्तुएँकंघा (हाथी दाँत का, लगभग 7 से.मी. — आज के कंघे जैसा ही आकार)
दर्पण
पट्टियों और आकृतियों वाला चित्रित पात्र
छैनी
क्रमबद्ध बाट
सीटी
गोटियों वाला खेल-बोर्ड
चित्र 6.11; 6.14.1; 6.14.2; 6.14.4; 6.14.3; 6.14.6; 6.14.5
खेतीहल — “जिनमें से कुछ का उपयोग आधुनिक समय में भी किसानों द्वारा किया जाता है”चित्र 6.9, बनावली से
प्रतीक और कथाएँस्वस्तिक, जो आज भी द्वारों और बहीखातों पर बनाया जाता है
प्यासे कौए की कहानी, जो आज भी बच्चों को सुनाई जाती है
बैल, जो आज भी भारतीय कला की परिचित आकृति है
चित्र 6.15.2; चित्र 6.15.6; चित्र 6.13.2
रसोई मेंहल्दी, अदरक और केला तथा दुग्ध उत्पाद — पात्रों के अवशेषों सेपृष्ठ 97
यह सूची क्या सिद्ध करती है : अध्याय का अंतिम दावा — “हड़प्पा की संस्कृति एवं प्रौद्योगिकी अधिकांशत: बची रही और यह भारतीय सभ्यता के अगले चरण में पहुँच गई”। नगर लगभग 1900 सा.सं.पू. में खाली हो गए, पर कंघा, चूड़ी, नमस्ते, हल, कौए की कहानी और हल्दी कभी खाली नहीं हुए। यह विश्व के सबसे लंबे अटूट सांस्कृतिक धागों में से एक है।
परियोजना का सुझाव : ‘तब’ और ‘अब’ नाम से दो स्तंभों वाला भित्ति-चित्र बनाइए। बाएँ स्तंभ में हड़प्पाई वस्तु का चित्र चिपकाइए और दाएँ में अपने घर की उसी वस्तु का छायाचित्र — कंघा, चूड़ी, सीटी, खेल-बोर्ड, हल्दी का डिब्बा। दोनों को साथ देखने से निरंतरता जितनी जल्दी समझ आती है, उतनी किसी और तरीके से नहीं।
प्र6.
धौलावीरा के जलाशयों की प्रणाली क्या सोच प्रतिबिंबित करती है?
उत्तर

देखिए कि यह प्रणाली वास्तव में थी क्या : कम से कम छह विशाल जलाशय, पत्थरों से बने या सीधे चट्टान काटकर, सबसे बड़ा 73 मीटर लंबा, और अधिकांश भूमिगत नालियों से जुड़े हुए, जिससे कुशल जल संचयन और वितरण हो सके — वह भी कच्छ के रन में, भारत के सबसे शुष्क क्षेत्रों में से एक।

उन्होंने क्या बनायायह कौन-सी सोच दिखाता है
संकट आने से पहले ही, लगभग मरुस्थल में जलाशयदूरदर्शिता और योजना। वे अगले वर्ष के, और उसके अगले वर्ष के जल की चिंता कर रहे थे
एक नहीं, छहसावधानी। यदि एक सूख जाए या उसकी सफाई करनी पड़े, तब भी नगर के पास जल रहे — आज के ‘बैकअप’ जैसी ही सोच
ठोस चट्टान में हाथ से 73 मीटर का कुंड काटनाऐसी वस्तु में विशाल सामूहिक श्रम लगाने की तत्परता, जिससे कोई लाभ नहीं, केवल सुरक्षा मिलती है
भूमिगत नालियों से जुड़ावअभियांत्रिकी बुद्धि। वर्षा का जल जहाँ गिरे वहीं पकड़कर वहाँ पहुँचाना जहाँ आवश्यकता है — यह वर्षा जल संचयन है, इस शब्द के गढ़े जाने से चार हजार वर्ष पहले
ऐसी प्रणाली जिसकी सफाई और रख-रखाव अनिवार्य थाअनुशासन और नागरिक संगठन। किसी को इसे पीढ़ी-दर-पीढ़ी चालू रखना था
जल पूरे नगर के लिए, किसी एक घर के लिए नहींसामुदायिक सोच — जल को साझा संसाधन मानकर सामूहिक रूप से प्रबंधित करना

एक वाक्य में : ये जलाशय जल के प्रति आदर, दीर्घकालिक योजना और सामूहिक उत्तरदायित्व की सोच दिखाते हैं — ऐसा समाज जिसने अपने कठोर पर्यावरण को ईमानदारी से पढ़ा और आशा के भरोसे बैठने के बजाय उसी के भीतर जीने के लिए स्वयं को संगठित किया।

यह केवल प्रशंसा की बात क्यों नहीं है : कच्छ आज भी जल की कमी से जूझता है, और भारत के बड़े भाग भी। आधुनिक गुजरात और राजस्थान ने ठीक यही विचार फिर अपनाया है — चेक-डैम, गाँव के तालाब, छत का वर्षा जल संचयन। शुष्क भूमि के लिए हड़प्पावासियों का उत्तर यह नहीं था कि जल दूर से लाया जाए, बल्कि यह कि जो गिरता है उसे पकड़ो और सँभालो। यह सोच नई नहीं है, दोबारा खोजी गई है।
विचार कीजिए : अंतत: यह भी पर्याप्त नहीं हुआ — लगभग 2200 सा.सं.पू. से जलवायु शुष्क हुई और लगभग 1900 सा.सं.पू. में नगर छोड़ दिए गए। अच्छी योजना पर्यावरण के विरुद्ध समय दिला सकती है, उसे हरा नहीं सकती।
प्र7.
मोहनजो-दड़ो में ईंटों से निर्मित 700 कुओं की गणना की गई है। ऐसा लगता है कि उनका नियमित रूप से रख-रखाव किया जाता रहा और अनेक शताब्दियों तक उनका उपयोग किया जाता रहा। निहितार्थों पर चर्चा कीजिए।
उत्तर

इस एक वाक्य में तीन अलग तथ्य हैं — 700, रख-रखाव और अनेक शताब्दियाँ। हर एक का अपना निहितार्थ है।

तथ्यउसका निहितार्थ
एक ही नगर में लगभग 700 कुएँजल हर घर से थोड़ी ही दूरी पर उपलब्ध था — पूरे नगर के लिए एक कुआँ नहीं। अनेक मोहल्लों और संभवत: अनेक घरों के अपने कुएँ थे। इसका अर्थ है कि जल हर नागरिक की मूल आवश्यकता माना गया, कोई विशेषाधिकार नहीं
ईंटों से निर्मितगंभीर अभियांत्रिकी। ईंट की परत किनारों को गिरने से रोकती है और ऊपर का गंदा जल भीतर रिसने नहीं देती — अर्थात कुएँ टिकाऊपन और स्वच्छता को ध्यान में रखकर बने थे, जल्दबाजी में खोदे नहीं गए
नियमित रख-रखावकोई उत्तरदायी अवश्य था। कुएँ एक-दो वर्ष में ही भर जाते और गंदे हो जाते हैं, यदि उनकी सफाई न हो। नियमित रख-रखाव का अर्थ है नगर प्रशासन या सुदृढ़ सामुदायिक व्यवस्था, और ऐसे लोग जो जानते थे कि गंदा जल रोग लाता है
अनेक शताब्दियों तक उपयोगस्थायित्व। यह व्यवस्था पीढ़ियों के शासकों को पार कर गई, वे जो भी रहे हों। इसका यह भी अर्थ है कि भूजल स्तर विश्वसनीय था — जब तक अंतत: वह विश्वसनीय नहीं रहा

कुओं के साथ नालियाँ रखिए और चित्र पूरा हो जाता है। स्वच्छ जल 700 कुओं से भीतर आता था; गंदा जल सड़कों के नीचे की ढकी नालियों से बाहर जाता था। यह एक पूरा नगरीय जल-चक्र है — आपूर्ति और निकासी, दोनों की योजना एक साथ, तीसरी सहस्राब्दी सा.सं.पू. के नगर में।

तुलना करने योग्य बात : भारत के अनेक कस्बों में नल का जल और ढकी सीवर व्यवस्था पिछले सौ वर्षों में ही आई है, और कहीं-कहीं अब भी दोनों नहीं हैं। मोहनजो-दड़ो में उसकी अपनी तकनीक में इसका समतुल्य चार हजार वर्ष से भी पहले था — और वह सदियों तक चलता रहा। सचमुच प्रभावशाली बात रख-रखाव है। एक बार बना देना उसे तीन सौ वर्ष तक सँभालने से कहीं आसान है।
चर्चा : कक्षा से पूछिए कि आपके विद्यालय की पानी की टंकी कौन साफ करता है, नल कौन ठीक करता है और उसका खर्च कौन उठाता है। फिर पूछिए कि मोहनजो-दड़ो में ये काम कौन करता था। कोई नहीं जानता — और इसीलिए 700 कुएँ पुरातत्ववेत्ताओं को इतना बेचैन करते हैं।
प्र8.
सामान्यत: यह कहा जाता है कि हड़प्पावासियों में नागरिकता का उच्च भाव था। इस कथन के महत्व पर चर्चा कीजिए। क्या आप इससे सहमत हैं? वर्तमान भारत के महानगरों के नागरिकों के साथ इसकी तुलना कीजिए।
उत्तर

नागरिकता का भाव अर्थात साझा स्थानों और साझा व्यवस्थाओं की चिंता करना — सड़क, नाली, जल आपूर्ति, पड़ोसी की सुविधा — केवल अपने घर की नहीं।

इस कथन के पक्ष में प्रमाण

अध्याय का प्रमाणयह क्या दिखाता है
घरों के स्नानागार सड़कों के नीचे की सार्वजनिक नाली-प्रणाली से जुड़ेहर घर ने अपना निजी अपशिष्ट साझा व्यवस्था में जोड़ा और उसके नियम स्वीकार किए
नालियाँ सड़कों के नीचे और ढकी हुईअपशिष्ट दृष्टि से दूर बहा दिया जाता था — किसी को सड़क पर कूड़ा डालने की छूट नहीं थी
चौड़ी सड़कें, चारों दिशाओं की ओर उन्मुख; उनके किनारे बने घरकिसी ने सार्वजनिक सड़क में अतिक्रमण नहीं किया। निजी निर्माण ने सार्वजनिक स्थान का सम्मान किया
छोटे और बड़े घरों की एक जैसी निर्माण गुणवत्तासबके लिए एक ही मानक — बी.बी. लाल का “आपसी सामंजस्य”, शोषण नहीं
लगभग 700 कुएँ और धौलावीरा के छह जलाशय, नियमित रख-रखाव के साथसाझा संपत्ति की दीर्घकालिक सामूहिक देखभाल
न युद्ध के हथियार, न सेना, न युद्ध का निशानविवाद हिंसा के बिना सुलझाए जाते थे — नागरिकता के भाव का सबसे व्यापक रूप
हड़प्पाई घर सार्वजनिक नाली से कैसे जुड़ता था — एक अनुप्रस्थ काट घर स्नानागार (ढलान वाला फ़र्श) दीवार से निकास सड़क — चौड़ी और खुली रखी गई चारों दिशाओं की ओर उन्मुख सड़क के नीचे बहती ढकी नाली नीचे की भूमि झरोखा निजी अपशिष्ट सार्वजनिक व्यवस्था में मिलता है — और उस व्यवस्था की सफाई किसी को करनी पड़ती है। हर घर में दोहराया गया यही जोड़ ‘नागरिकता का भाव’ है।
पृष्ठ 94 में वर्णित और चित्र 6.7 में लोथल पर छायाचित्रित हड़प्पाई व्यवस्था : स्नानागार → निकास → सड़क के नीचे ढकी नाली।

क्या मैं सहमत हूँ? हाँ — एक ईमानदार शर्त के साथ। नागरिकता के भाव के भौतिक प्रमाण बहुत मजबूत हैं, और वे ठोस प्रमाण हैं : नालियाँ झूठ नहीं बोलतीं। पर ‘भाव’ शब्द से सावधान रहना चाहिए, जो लोगों के मन के भीतर की बात सुझाता है। हमें वास्तव में जो दिखता है, वह एक व्यवस्था है। खंडहरों से यह नहीं कहा जा सकता कि हर हड़प्पावासी प्रसन्नता से अपनी नाली साफ करता था, या कोई कठोर प्राधिकारी उससे करवाता था। दोनों स्थितियों में नाली स्वच्छ ही मिलती।

वर्तमान भारत के महानगरों से तुलना

हड़प्पाई नगरआज का बड़ा भारतीय नगर
जहाँ हम पीछे हैंहर सड़क के नीचे ढकी नालियाँ; सड़कें खुली और साफसड़कों पर कूड़ा और प्लास्टिक; खुली और जाम नालियाँ; फुटपाथ और सड़कों पर अतिक्रमण
जहाँ हम पीछे हैंअमीर-गरीब के घरों की एक जैसी निर्माण गुणवत्ताएक ही नगर में अत्यंत असमान आवास
जहाँ हम आगे हैंसबसे बड़े नगर में भी संभवत: 30–40 हजार लोगलाखों लोग, और साथ में वाहन, उद्योग तथा इलेक्ट्रॉनिक कचरा — कहीं अधिक कठिन समस्या
जहाँ हम आगे हैंअज्ञात; अधिकारों का कोई अभिलेख नहींनगरपालिका कानून, निर्वाचित निगम, शिकायत का अधिकार, और स्वच्छ भारत जैसे अभियान
निष्पक्ष निष्कर्ष : हड़प्पावासियों ने अपने आकार के अनुपात में जितनी अच्छी सार्वजनिक व्यवस्थाएँ बनाईं, उतनी आज के अधिकांश भारतीय नगर अपने आकार के अनुपात में नहीं बना पाए — और इससे भी बड़ी बात यह कि उन्होंने उन्हें सदियों तक चलाए रखा। पर उनका काम छोटा था और हमारा कहीं अधिक जटिल। सीख यह नहीं कि अतीत बेहतर था; सीख यह है कि नगर तभी चलता है जब निजी आदतें सार्वजनिक व्यवस्थाओं का सम्मान करें। यह मोहनजो-दड़ो में सच था और आपकी गली में भी सच है।
कक्षा-गतिविधि : विद्यालय के चारों ओर एक चक्कर लगाइए और तीन चीज़ें गिनिए — खुली नालियाँ, फुटपाथ पर कूड़ा, और अवरुद्ध या अतिक्रमित पैदल पथ। फिर एक अनुच्छेद में लिखिए कि 4000 सामान्य संवत् में आपके मुहल्ले की खुदाई करने वाला पुरातत्ववेत्ता आपकी नागरिकता के भाव के बारे में क्या निष्कर्ष निकालेगा। यह अभ्यास सोचने पर विवश कर देता है।
क्या यह उपयोगी रहा? त्रुटि बताएँ