क्योंकि खोज के अलग-अलग चरणों में अलग-अलग लोगों ने इसे बार-बार नाम दिया — और हर नाम यह दर्ज करता है कि उस समय तक क्या ज्ञात था।
| नाम | कहाँ से आया | क्या दावा करता है — और उसका मूल्य |
|---|---|---|
| हड़प्पा सभ्यता | हड़प्पा से, जो 1920–21 में इस सभ्यता का पहला उत्खनित नगर था; इसीलिए इसके निवासी हड़प्पावासी कहलाते हैं | तटस्थ और सुरक्षित। यह किसी क्षेत्र का नहीं, एक पुरास्थल का नाम है, इसलिए नई खोज इसे गलत सिद्ध नहीं कर सकती — यही कारण है कि पुरातत्ववेत्ता इसे पसंद करते हैं |
| सिंधु सभ्यता | सिंधु नदी से, जिसके किनारे हड़प्पा और मोहनजो-दड़ो मिले | सही, पर अधूरा। अनेक पुरास्थल सिंधु के आस-पास हैं ही नहीं |
| सिंधु घाटी सभ्यता | वही नदी, साथ में ‘घाटी’ — यह शब्द तब चला जब केवल सिंधु के पुरास्थल ज्ञात थे | अप्रचलित। मानचित्र (चित्र 6.3) दिखाता है कि सभ्यता “सिंधु क्षेत्र से बहुत आगे तक फैली हुई थी”। पुस्तक जान-बूझकर इसका प्रयोग नहीं करती |
| सिंधु-सरस्वती सभ्यता | दोनों नदी-प्रणालियाँ — सिंधु और सरस्वती (आज की घग्गर-हाकरा) | सबसे सटीक। अकेली सरस्वती की द्रोणी में दो महानगर (राखीगढ़ी, गँवेरीवाला), अनेक छोटे नगर (फरमाना, कालीबंगा) और कुछ अन्य नगर (भिर्राना, बनावली) हैं — तथा मानचित्र पर पुरास्थलों की सर्वाधिक सघनता भी |
महत्व — इन नामों से तीन बातें सीखने को मिलती हैं।
- नाम भी एक प्रमाण है, जिसकी अपनी तिथि होती है। ‘सिंधु घाटी’ बताता है कि 1920 के दशक में लोग क्या जानते थे, यह नहीं कि सत्य क्या है।
- हर नाम एक छिपा दावा करता है। ‘सिंधु’ कहते ही आपने चुपचाप कह दिया कि यह सभ्यता एक नदी की थी। ‘सिंधु-सरस्वती’ कहते ही आपने उसका दूसरा आधा भाग लौटा दिया।
- ज्ञान बढ़ता है, इसलिए नाम बदलने पड़ते हैं। “इस प्रकार की खोजें आज भी जारी हैं” — राखीगढ़ी, धौलावीरा, भिर्राना और लोथल तब अज्ञात थे जब पहला नाम दिया गया।