अन्वेषण अध्याय 6 आइए पता लगाएँ

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
लोथल के पात्र पर दर्शाई गई कहानी को पूरा कीजिए। आपके विचार से इस कहानी को 4,000 से अधिक वर्षों से क्यों याद किया जाता रहा?
उत्तर

यह कहानी प्यासे कौए की है — और लोथल के पात्र का चित्रण (चित्र 6.15.6) ठीक वही क्षण दिखाता है जब कौए को उपाय सूझता है। पूरी कहानी इस प्रकार है :

गरम दिन में एक कौआ प्यास से व्याकुल है।
उसे एक पात्र मिलता है जिसकी तली में थोड़ा-सा जल है — उसकी चोंच वहाँ तक नहीं पहुँचती
वह न पात्र गिरा सकता है, न तोड़ सकता है।
तभी उसे उपाय सूझता है : वह एक-एक करके कंकड़ उठाकर पात्र में डालता है।
हर कंकड़ के साथ जल ऊपर उठता जाता है … और अंत में ऊपर आ जाता है।
कौआ जल पीता है और उड़ जाता है।
सीख : जहाँ बल हार जाता है, वहाँ बुद्धि जीत जाती है।

यह पात्र इतना महत्वपूर्ण प्रमाण क्यों है। हड़प्पाई कलाकार ने पात्र पर बैठा कौआ नहीं बनाया — वह केवल एक चित्र होता। चित्रण में ऊँचा सँकरा पात्र और उसमें नीचे तक उतरा जल दिखाया गया है, अर्थात चित्रकार यह मानकर चल रहा था कि शेष कहानी आप पहले से जानते हैं। जो चित्र कहानी को मान लेता है, वह इस बात का प्रमाण है कि कहानी पहले से प्रसिद्ध थी।

यह 4,000 से अधिक वर्षों तक कैसे याद रही? लेखन से नहीं — हड़प्पाई लिपि पढ़ी नहीं जा सकी, और यह कहानी बहुत बाद तक लिखी नहीं गई। यह श्रुति परंपरा से बची, और सभ्यता की विशेषताओं की सूची में ‘श्रुति परंपराओं’ का उल्लेख है ही। इसके चार कारण :

  • छोटी है और उसके केंद्र में एक स्पष्ट चित्र है — पक्षी, पात्र, कंकड़, चढ़ता जल। याद रखना आसान, दोहराना आसान।
  • यह बच्चों को सुनाई जाती है, और बच्चे बड़े होकर अपने बच्चों को सुनाते हैं। यह संसार की सबसे मजबूत कड़ी है।
  • इसकी सीख हर युग में काम की है — धैर्य और बुद्धि बल से बड़े हैं।
  • इसके लिए किसी सामग्री की आवश्यकता नहीं। कोई भी दादी कहीं भी सुना सकती है। भवन के विपरीत, कहानी ढोने में कुछ खर्च नहीं होता।
क्या आप जानते हैं? यही कहानी बाद में यूनान की ईसप-कथाओं में और भारतीय कथा-संग्रहों में मिलती है, और आज भी कक्षा 1–2 की पुस्तकों में छपती है। जब आप इसे किसी छोटे भाई-बहन को सुनाते हैं, तो आप चार हजार वर्ष लंबी उस शृंखला की एक कड़ी होते हैं जो लोथल के कुम्हार के चाक से शुरू हुई थी।
यह अकेला पात्र इतिहासकारों के लिए क्यों बहुमूल्य है : यह उन गिनी-चुनी जगहों में से एक है जहाँ हमें हड़प्पाई वस्तु नहीं, हड़प्पाई विचार दिखाई देता है। ईंटें बताती हैं कि वे कैसे बनाते थे; कौए वाला पात्र बताता है कि वे अपने बच्चों को क्या सिखाना ज़रूरी समझते थे।
प्र2.
‘नर्तकी’ की लघु प्रतिमा पर विचार कीजिए। इस लघु प्रतिमा की भाव-भंगिमा से आप क्या समझते हैं? पूरी बाँह को ढँकने वाली उसकी उन चूड़ियों को ध्यान से देखिए, जो गुजरात और राजस्थान के क्षेत्रों में अभी भी महिलाएँ पहनती हैं। इस अध्याय में आपने और कहाँ पर इस तरह से चूड़ियाँ पहनने को चिह्नित किया है। इससे हमें क्या निष्कर्ष निकालना चाहिए?
उत्तर

भाव-भंगिमा। ‘नर्तकी’ (चित्र 6.15.4) मोहनजो-दड़ो से प्राप्त कांस्य प्रतिमा है, केवल 10.8 से.मी. ऊँची — आपकी हथेली से भी छोटी। उसकी मुद्रा देखिए :

  • एक हाथ कमर पर, कोहनी बाहर; सिर पीछे की ओर और थोड़ा एक तरफ झुका; एक पैर मुड़ा हुआ, भार दूसरे पैर पर।
  • उसके पास बहुमूल्य वस्त्र नहीं — उसके आभूषण ही उसका शृंगार हैं : एक हार और चूड़ियाँ।

यह मुद्रा आत्मविश्वासी, सहज, निश्चिंत और कुछ चंचल लगती है — जैसे कोई नृत्य की दो गतियों के बीच ठहरा हो। प्राचीन कला महत्वपूर्ण व्यक्तियों को प्राय: कठोर और औपचारिक मुद्रा में दिखाती है; यह प्रतिमा वैसी नहीं है। इसीलिए खोज के समय से आज तक यह छोटी-सी कांस्य आकृति लोगों को मोहती रही है — साढ़े चार हजार वर्ष पुरानी, फिर भी पूरी तरह जीवंत।

चूड़ियाँ। वे उसकी लगभग पूरी बाईं बाँह को कलाई से कंधे तक ढँके हुए हैं, और दाहिनी कलाई पर भी कुछ हैं — जोड़ा नहीं, पूरी पंक्ति।

इस अध्याय में और कहाँ इस तरह चूड़ियाँ पहनी दिखती हैं? अध्याय के पहले ही पृष्ठ, पृष्ठ 85 के चित्र 6.1 पर लौटिए — धौलावीरा के ‘किला’ क्षेत्र के उत्तरी प्रवेश द्वार का छायाचित्र। सामने बैठी कच्छी वेशभूषा वाली महिला ने पूरी बाँह ढँकने वाली सफ़ेद चूड़ियाँ पहन रखी हैं — ठीक प्रतिमा की तरह। वह आज की जीवित महिला है, जो एक हड़प्पाई नगर के भीतर बैठी है।

‘नर्तकी’ (चित्र 6.15.4)चित्र 6.1, पृष्ठ 85 की महिला
काललगभग 4,500 वर्ष पहले, मोहनजो-दड़ोआज, धौलावीरा (कच्छ, गुजरात) में
चूड़ियाँएक बाँह पर कलाई से कंधे तकपूरी बाँह पर पंक्तिबद्ध
आज भी प्रचलित?हाँ — “जो गुजरात और राजस्थान के क्षेत्रों में अभी भी महिलाएँ पहनती हैं”, अर्थात ठीक उन्हीं क्षेत्रों में जहाँ धौलावीरा और कालीबंगा हैं

हमें क्या निष्कर्ष निकालना चाहिए? यह कि हड़प्पाई संस्कृति हड़प्पाई नगरों के साथ समाप्त नहीं हुई। अध्याय का अंतिम अनुच्छेद यह शब्दों में कहता है — “हड़प्पा की संस्कृति एवं प्रौद्योगिकी अधिकांशत: बची रही और यह भारतीय सभ्यता के अगले चरण में पहुँच गई” — और ये दो चित्र इसे प्रमाण से कहते हैं। पहनावे की एक रीति भारत के उसी भू-भाग में, स्त्री से स्त्री तक, चार हजार वर्षों से चली आ रही है।

यह संयोग नहीं, मजबूत तर्क क्यों है : समानता अस्पष्ट नहीं है। यह एक विशिष्ट आभूषण को विशिष्ट ढंग से पहनने की रीति है, और वह उसी भौगोलिक क्षेत्र में बची है जहाँ पुरास्थल हैं। निरंतरता का दावा करने से पहले इतिहासकार ठीक यही तिहरा मेल खोजते हैं — वही वस्तु, वही रीति, वही स्थान। इस अध्याय के अन्य उदाहरण भी यही कहते हैं : नमस्ते की मूर्ति, स्वस्तिक वाली मुहर, प्यासे कौए की कहानी, पात्रों में हल्दी और अदरक, और वह हल जिसका आकार आधुनिक किसान आज भी काम में लाते हैं।
एक बात का ध्यान रखिए : ‘नर्तकी’ नाम खोजने वाले पुरातत्ववेत्ताओं ने दिया था, हड़प्पावासियों ने नहीं। हम वास्तव में नहीं जानते कि वह नर्तकी थी — केवल इतना कि मुद्रा में गति का भाव है। इसलिए लिखिए “‘नर्तकी’ नाम से जानी जाने वाली प्रतिमा”, ठीक वैसे ही जैसे पुस्तक लिखती है कि मूर्ति को “प्राय: ‘पुरोहित राजा’ कहा जाता है (यद्यपि यह मालूम नहीं है कि यह प्रतिमा किसकी है)”।
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