कुतूहल अध्याय 11 और भी सीखें

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
वर्षा जल संचयन भारत में एक सदियों पुरानी परंपरा है। अपने राज्य या देश के अन्य भागों में उपयोग की जा रही कुछ पारंपरिक वर्षा जल संचयन विधियों का पता लगाइए।
उत्तर

भारत के हर क्षेत्र ने अपनी वर्षा, मृदा और ढलान के अनुसार अपनी विधि विकसित की। इस तालिका में अपने राज्य की विधि खोजिए और फिर किसी बुजुर्ग से उसके बारे में पूछिए।

विधिराज्य / क्षेत्रकार्य करने का ढंग
बावड़ी / बावलीराजस्थानसीढ़ीदार गहरा कुआँ; वर्षा जल के साथ पास की झीलों, तालाबों और नदियों से रिसने वाला जल भी संचित— तूरजी का झालरा, जोधपुर (चित्र 11.4 ख); चाँद बावड़ी, आभानेरी
वावगुजरातसीढ़ीदार बावड़ी— पाटन की रानी की वाव (विश्व धरोहर) और अडालज की वाव
टाँका और कुंडपश्चिमी राजस्थानआँगन के नीचे भूमिगत टाँका, जिसमें ढलवाँ सतह से वर्षा जल आता है; पेयजल ठंडा बना रहता है
जोहड़ और खड़ीनराजस्थान (अलवर, जैसलमेर)ढलान पर मिट्टी का बाँध; खेत में बहते जल को बुवाई तक रोकने वाला मेड़-बंधा
विरदाकच्छ, गुजरातनिचली भूमि में उथले कुएँ, जहाँ मीठा वर्षा जल खारे जल के ऊपर तैरता रहता है
आहर–पइनबिहार (मगध)पइन नालियाँ जल को तीन ओर से बँधे आहर जलाशय तक पहुँचाती हैं
एरी (तालाब)तमिलनाडुगाँव के तालाबों की शृंखला; एक का अतिरिक्त जल दूसरे को भरता है, अतः वर्षा व्यर्थ नहीं जाती
केरे, कल्याणी, पुष्करिणीकर्नाटकगाँव के तालाब तथा सीढ़ीदार मंदिर-कुंड
फड़ और बंधारामहाराष्ट्र (नासिक, धुले)नाले पर पत्थर का बंधारा जल को नहरों द्वारा खेतों के खंडों तक पहुँचाता है
हवेली पद्धतिमध्य प्रदेश (बुंदेलखंड)पूरे वर्षा-काल में छोटी मेड़ों द्वारा वर्षा जल खेत में ही रोका जाता है
कटास, मुंडा, बंधाओडिशा, झारखंडढलान के ऊपरी भाग में मिट्टी के तालाब, जिनसे नीचे के खेतों की सिंचाई होती है
कुहल / कूल, नौला, गूलहिमाचल प्रदेश, जम्मू, उत्तराखंडहिमनद के नाले से निकली पत्थर की छोटी नहरें; नौला स्रोत पर बना सीढ़ीदार कुंड है
जिंगलद्दाखदिन में पिघले हिमनद-जल को एकत्र करने वाला टाँका, जिसका उपयोग शाम को होता है
बाँस टपक सिंचाईमेघालयचीरे हुए बाँस की नलियाँ झरने का जल बूँद-बूँद करके पान और काली मिर्च के पौधों तक पहुँचाती हैं
जाबो (रूजा)नागालैंडपहाड़ी की चोटी पर वर्षा जल रोककर, पशु-बाड़े से होते हुए सीढ़ीदार खेतों और मछली-तालाबों तक
सुरंगमकेरल, कासरगोडलेटराइट पहाड़ी में खोदी गई सुरंग, जो चट्टान से रिसने वाला जल एकत्र करती है
चेरुवु, कुंटातेलंगाना, आंध्र प्रदेशगाँव के तालाब और छोटे पोखर, जिन्हें मिशन काकतीय के अंतर्गत पुनर्जीवित किया गया

परियोजना कैसे प्रस्तुत करें: कोई एक विधि चुनिए, उसका नामांकित रेखाचित्र बनाइए, और लिखिए कि वह कहाँ उपयोग होती है, कैसे बनती है, उसकी देखभाल कौन करता है, और आज भी काम करती है या नहीं। यदि आपके पास ऐसी कोई संरचना हो तो उसका चित्र भी लगाइए।

आधुनिक रूप: छत से वर्षा जल संचयन (चित्र 11.4 क) इसी विचार का पाइप वाला रूप है— छत का जल छन्ने से होकर संग्रह टंकी या रिचार्ज गड्ढे में जाता है। भारत के अनेक नगरों में अब नए भवनों के लिए यह अनिवार्य है।
प्र2.
वायु प्रदूषण आपके स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव डाल सकता है। अपने से बड़े या समुदाय के सदस्यों के साथ बातचीत कर अपने स्थानीय क्षेत्र में वायु प्रदूषण के मुख्य स्रोतों की पहचान कर जाँच करें। आप निष्कर्षों के आधार पर दो व्यावहारिक उपाय सुझाइए जिनका उपयोग कर आपका विद्यालय या समुदाय वायु प्रदूषण कम कर सकता है।
उत्तर

भाग क— जाँच कैसे करें

  1. एक छोटी प्रश्नावली बनाइए (6–8 प्रश्न)— जैसे: क्या पिछले बीस वर्षों में यहाँ की हवा बदली है? क्या आपको या घर में किसी को खाँसी, साँस फूलना, आँखों से पानी आना या दमा होता है? क्या यह किसी विशेष मौसम में बढ़ता है? आपके अनुसार इसका कारण क्या है?
  2. 10 से 15 लोगों से बात कीजिए— दादा-दादी, पड़ोसी, मुख्य सड़क का दुकानदार, यातायात पुलिसकर्मी, विद्यालय का माली, और यदि संभव हो तो कोई चिकित्सक या आशा कार्यकर्ता।
  3. स्वयं अवलोकन कीजिए— सड़क की ओर वाली खिड़की की चौखट पर सफेद कपड़ा फेरिए और भीतरी खिड़की पर भी; दोनों की धूल की तुलना कीजिए। यह भी नोट कीजिए कि धुँआ कब सबसे अधिक होता है (सुबह का यातायात, शाम को कचरा जलाना, कटाई के बाद पराली जलाना)।
  4. सब कुछ तालिका में लिखिए और गिनिए कि कितने लोगों ने कौन-सी समस्या बताई।

भाग ख— ऐसी जाँच में प्रायः क्या मिलता है

बताई गई स्वास्थ्य समस्यापहचाने गये स्थानीय स्रोत
खाँसी, गले में खराश और बार-बार जुकाममुख्य सड़क पर वाहनों का धुँआ
साँस फूलना और दमा, जाड़ों में अधिककचरा, सूखी पत्तियाँ और प्लास्टिक जलाना
आँखों में जलन और पानी आनानिर्माण स्थलों और कच्ची सड़कों की धूल
सिरदर्द और थकानडीजल जेनरेटर, ईंट-भट्ठे या पास के कारखाने की चिमनी
रसोई में धुँआ, वृद्ध महिलाओं की आँखों में जलनलकड़ी, कोयले या उपलों पर खाना बनाना
फसल कटाई के बाद खाँसी बढ़नाखेतों में पराली जलाना

भाग ग— दो व्यावहारिक उपाय (अपने निष्कर्षों के अनुसार दो चुनिए)

  1. विद्यालय में “वाहन-मुक्त दिवस” और पैदल-दल। सप्ताह में एक दिन दो किलोमीटर के भीतर रहने वाले सभी विद्यार्थी पैदल या साइकिल से आएँ; शेष वाहन साझा करें। अभिभावकों से कहिए कि प्रतीक्षा करते समय इंजन बंद रखें— गेट पर “इंजन बंद कीजिए” का बोर्ड लगाइए।
  2. विद्यालय और मोहल्ले में “जलाना नहीं, खाद बनाना” का नियम। दो कूड़ेदान रखिए, सूखी पत्तियों और रसोई के कचरे को जलाने के बजाय गड्ढे में खाद बनाइए और वह खाद विद्यालय के बगीचे को दीजिए। साथ में चारदीवारी के किनारे वृक्षारोपण कीजिए, क्योंकि पेड़ धूल रोकते और कार्बन डाइऑक्साइड सोखते हैं।
बातचीत क्यों आवश्यक है: पुस्तक के आँकड़े दूर के लगते हैं; किंतु जब कोई पड़ोसी कहता है “बचपन में यहाँ से पहाड़ियाँ दिखाई देती थीं”, तब परिवर्तन वास्तविक लगने लगता है— और यह भी सीखने को मिलता है कि प्रमाण केवल मापकर नहीं, पूछकर भी जुटाए जाते हैं।
प्र3.
उन महत्वपूर्ण खनिजों और चट्टानों का पता लगाइए जिनका उपयोग आपके गाँव/कस्बे या नगर में विभिन्न प्रयोजनों के लिए किया जाता है। उनके नाम और उपयोग सूचीबद्ध कीजिए।
उत्तर

यह कैसे करें: कॉपी लेकर अपने क्षेत्र में घूमिए। विद्यालय का फर्श, मंदिर की दीवारें, सड़क के किनारे के पत्थर, सड़क की गिट्टी, कोई निर्माण स्थल और हार्डवेयर की दुकान देखिए। राजमिस्त्री या दुकानदार से पूछिए कि प्रत्येक सामग्री क्या है और कहाँ से आती है।

चट्टानें— क्या देखना है

चट्टानकहाँ दिखेगीभारत में कहाँ से आती है
ग्रेनाइटरसोई की स्लैब, फर्श की पट्टियाँ, मंदिरों के स्तंभ, स्मारककर्नाटक, तेलंगाना, तमिलनाडु, राजस्थान
संगमरमरफर्श, मूर्तियाँ, मंदिर-कार्य, मेज का ऊपरी भागमकराना और किशनगढ़ (राजस्थान)
बलुआ पत्थरभवनों की दीवारें, नक्काशीदार छज्जे, फर्शधौलपुर और जोधपुर (राजस्थान)
स्लेटछत (चित्र 11.6), फर्श, लिखने की पट्टीकांगड़ा (हिमाचल प्रदेश), मार्कापुर (आंध्र प्रदेश)
लेटराइटब्लॉक काटकर ईंट की तरह उपयोग (चित्र 11.7)केरल, तटीय कर्नाटक, गोवा, कोंकण, ओडिशा
चूना पत्थरसीमेंट का कच्चा माल; पुताई के लिए चूनाराजस्थान, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश, गुजरात
बेसाल्ट (काली चट्टान)सड़क की गिट्टी, रेल पटरी की गिट्टी, भवन-पत्थरदक्कन पठार— महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश
बजरी और रेतकंक्रीट, प्लास्टर, गारानदी-तल और हर नगर के पास की खदानें

खनिज— वे किस रूप में हमारे पास आते हैं

खनिज / धातुउपयोगमुख्यतः कहाँ से
लौह अयस्क → लोहा और इस्पातग्रिल, गेट, भवन की छड़ें, औजार, वाहन, रेल पटरीओडिशा, छत्तीसगढ़ (बैलाडीला), झारखंड, कर्नाटक, गोवा
बॉक्साइट → ऐलुमिनियमबर्तन, खिड़की के फ्रेम, पन्नी, वायुयान का ढाँचा, विद्युत तारओडिशा (पंचपटमाली), झारखंड, गुजरात, छत्तीसगढ़
ताँबा अयस्क → ताँबाविद्युत तार, बर्तन, मंदिर की घंटियाँखेतड़ी (राजस्थान), सिंहभूम (झारखंड), मलाजखंड (मध्य प्रदेश)
सोना और चाँदीआभूषण, तथा मोबाइल फोन के भीतर के सूक्ष्म संपर्ककोलार और हट्टी (कर्नाटक)
मैंगनीजमजबूत इस्पात बनाना, शुष्क सेलओडिशा, बालाघाट (मध्य प्रदेश), नागपुर–भंडारा (महाराष्ट्र)
अभ्रकविद्युत रोधन, प्रसाधन, रंग-रोगनकोडरमा (झारखंड), नेल्लोर (आंध्र प्रदेश), राजस्थान
जिप्समप्लास्टर ऑफ पेरिस, फॉल्स सीलिंग, सीमेंटराजस्थान, तमिलनाडु
नमकभोजन बनाना और परिरक्षणसाँभर झील (राजस्थान); गुजरात और तमिलनाडु के तटीय नमक-क्षेत्र
यह सूची क्या सिखाएगी: आपके चारों ओर की लगभग हर कठोर वस्तु भारत में कहीं न कहीं भूमि से निकाली गई चट्टान या खनिज से आरंभ हुई है— और इनमें से हर एक अनवीकरणीय है। इसीलिए अध्याय कहता है कि चट्टानों और खनिजों का संरक्षण करें तथा उनका दायित्वपूर्ण उपयोग करें।
अपनी ओर से एक स्तंभ जोड़िए: “क्या इसका पुनः उपयोग या पुनर्चक्रण हो सकता है?” लोहा, ऐलुमिनियम और ताँबा पिघलाकर फिर उपयोग किए जा सकते हैं— इससे खनिज भी बचता है और उसे खोदने में लगने वाला ईंधन भी।
प्र4.
आप एक इकोक्लब मॉनिटर हैं। अपने शिक्षक की सहायता से अपने विद्यालय में वृक्षारोपण अभियान का आयोजन कीजिए। इस गतिविधि के आयोजन के लिए आवश्यक चरणों की सूची बनाइए। लगाए गये वृक्षों के नाम और उनके महत्त्व को सूचीबद्ध करते हुए एक पृष्ठ की रिपोर्ट तैयार कीजिए।
उत्तर

भाग क— अभियान के आयोजन के चरण

  1. अनुमति लीजिए और तिथि तय कीजिए। लिखित प्रस्ताव लेकर प्रधानाचार्य से मिलिए। वर्षा-ऋतु का आरंभ सबसे उपयुक्त है— जुलाई का वन महोत्सव सप्ताह सर्वोत्तम है, क्योंकि नए पौधों को प्राकृतिक वर्षा मिल जाती है।
  2. स्थान का सर्वेक्षण कीजिए। विद्यालय में घूमकर मोटे नक्शे पर अंकित कीजिए कि पेड़ कहाँ लग सकते हैं— चारदीवारी के साथ, खेल के मैदान के पीछे, गेट के पास। पानी की पाइप के ऊपर या बिजली के तारों के नीचे स्थान न चुनिए।
  3. सही पेड़ चुनिए। अपने क्षेत्र के अनुकूल स्थानीय प्रजातियाँ लीजिए और फलदार, फूलदार तथा छायादार पेड़ों का मिश्रण रखिए।
  4. पौधे और सामग्री जुटाइए। वन विभाग की नर्सरी, नगरपालिका या स्थानीय नर्सरी से माँगिए— प्रायः पौधे निःशुल्क मिल जाते हैं। फावड़े, झारी, खाद, तथा बाँस या पुरानी जाली के ट्री-गार्ड एकत्र कीजिए।
  5. टोलियाँ बनाइए। प्रत्येक पौधे पर दो विद्यार्थी और प्रत्येक समूह के साथ एक शिक्षक। काम बाँटिए— खोदना, लगाना, पानी देना, नाम-पट्टी लगाना, छायाचित्र लेना, रिपोर्ट लिखना।
  6. गड्ढे एक दिन पहले खोदिए— लगभग 45 cm चौड़े और 45 cm गहरे— और उनमें कंपोस्ट या गोबर की खाद मिलाइए।
  7. निर्धारित दिन रोपण कीजिए। पॉलीथीन की थैली सावधानी से हटाइए ताकि जड़ का पिंड न टूटे, पौधा सीधा रखिए, मिट्टी भरकर दबाइए, तुरंत पानी दीजिए, और ट्री-गार्ड तथा नाम-पट्टी लगाइए।
  8. देखभाल की योजना बनाइए— यही सबसे महत्वपूर्ण चरण है। पूरे वर्ष के लिए, गरमी की छुट्टियों सहित, पानी देने की बारी तय कीजिए। जिस पौधे को कोई पानी न दे, वह व्यर्थ गया पौधा है।
  9. रिकॉर्ड रखिए और उत्साह बनाइए। प्रत्येक पौधे का उसकी टोली के साथ छायाचित्र लीजिए, हर महीने ऊँचाई मापिए, और “पेड़ गोद लेने” का छोटा प्रमाणपत्र-समारोह कीजिए।

भाग ख— नमूना एक-पृष्ठीय रिपोर्ट

रिपोर्ट: वृक्षारोपण अभियान, वन महोत्सव सप्ताह

तिथि: 12 जुलाई  स्थान: विद्यालय की चारदीवारी एवं पिछला बगीचा  लगाए गये पौधे: 30  प्रतिभागी: कक्षा 6–8 के 60 विद्यार्थी, 5 शिक्षक, 2 माली

लगाया गया वृक्षसंख्याउसका महत्त्व
नीम6औषधीय पत्तियाँ, दातुन के लिए टहनियाँ, कीटों से बचाव, घनी छाया
पीपल2बहुत दीर्घजीवी, प्रचुर ऑक्सीजन, पक्षियों का घर; भारत में पूजनीय
बरगद1विशाल छाया, फल पक्षियों और चमगादड़ों का भोजन; हमारा राष्ट्रीय वृक्ष
आँवला4विटामिन सी से भरपूर फल— वही नेलिकाई जो अज्जी का परिवार इकट्ठा करता है
आम3फल, छाया और इमारती लकड़ी
जामुन3मनुष्यों और पक्षियों के लिए फल; जड़ें अधिक जल सोखती हैं और मृदा थामती हैं
गुलमोहर3तेजी से बढ़ने वाला, चटकीले फूल, साइकिल स्टैंड पर अच्छी छाया
सहजन (मुनगा)4पत्तियाँ और फलियाँ अत्यंत पौष्टिक; शीघ्र बढ़ता है
करी पत्ता और तुलसी4रसोई और औषधीय उपयोग; कक्षाओं के पास गमलों के लिए उपयुक्त

देखभाल: कक्षा 6-अ सोमवार और गुरुवार को, 6-ब मंगलवार और शुक्रवार को पानी देगी; अवकाश के दिन माली। प्रत्येक माह की पहली तारीख को हर पौधे की ऊँचाई मापकर इकोक्लब की पंजिका में लिखी जाएगी।

हमने क्या सीखा: पौधा लगाने में एक सुबह लगती है; उसे जीवित रखने में एक वर्ष। हरित आवरण बढ़ाना एक आयोजन नहीं, एक आदत है।

स्थानीय पेड़ ही क्यों: नीम, पीपल या जामुन यहाँ की मृदा और वर्षा के अनुकूल पहले से हैं, एक बार जम जाने पर कम देखभाल माँगते हैं, और स्थानीय पक्षियों तथा कीटों का पोषण करते हैं। बाहर से लाया गया सजावटी पेड़ सुंदर तो लग सकता है, किंतु जीवन को कहीं कम सहारा देता है।
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