कुतूहल अध्याय 11 पाठ्य प्रश्न

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
जल को प्रदूषित करने वाली मानवीय गतिविधियों को पहचानिए। कक्षा में अपने मित्रों के साथ चर्चा कीजिए कि आप जल प्रदूषण को कम करने के लिए क्या उपाय कर सकते हैं।
उत्तर

पुस्तक में दो बातें बताई गई हैं— जल स्रोतों में कचरा फेंकना और घरों तथा उद्योगों का अपशिष्ट उनमें डालना। शेष गतिविधियाँ ये हैं।

मानवीय गतिविधियह जल को कैसे प्रदूषित करती है
बिना शोधन किए मल-जल और नालियों का पानी नदियों में छोड़नागंदगी और रोगाणु मिल जाते हैं; जल से दुर्गंध आने लगती है और मछलियाँ मर जाती हैं
कारखानों का अपशिष्ट— रंग, अम्ल, तेल, रसायनऐसे हानिकारक पदार्थ मिल जाते हैं जो स्वयं समाप्त नहीं होते
खेतों में अधिक उर्वरक और कीटनाशक डालनावर्षा उन्हें बहाकर तालाबों और नदियों में ले जाती है
तालाब-नदी में कपड़े, पशु और वाहन धोनासाबुन, अपमार्जक और चिकनाई जल में मिल जाते हैं
नदियों में प्लास्टिक थैलियाँ, रैपर, मूर्तियाँ और पूजा-सामग्री डालनाप्लास्टिक वर्षों तक तैरता रहता है और प्रवाह रोकता है
जल स्रोत के पास खुले में शौचरोगाणु जल में मिलकर बीमारियाँ फैलाते हैं
नावों और जहाजों से तेल का रिसावतेल की पतली परत फैलकर जलीय पौधों और मछलियों को मार देती है

हम क्या कर सकते हैं (कक्षा में चर्चा कर चुनिए):

  • तालाब, नहर या नदी में रैपर, बोतल या बचा भोजन कभी न फेंकें— उन्हें कूड़ेदान तक ले जाएँ।
  • अपमार्जक कम मात्रा में उपयोग करें और कपड़े नदी-किनारे के बजाय घर पर धोएँ।
  • मूर्तियाँ और पूजा के फूल नदी के स्थान पर अलग बने कुंड में विसर्जित करें।
  • विद्यालय और मोहल्ले की नालियाँ साफ और खुली रखें।
  • स्वच्छता सप्ताह में पोस्टर और नुक्कड़ नाटक करें; नदी या झील की सफाई अभियान में भाग लें।
यह इतना महत्वपूर्ण क्यों है: प्रदूषित जल किसी भी सजीव के उपभोग के लिए उपयुक्त नहीं होता— न हमारे लिए, न पशुओं के लिए, न उसमें रहने वाली मछलियों के लिए। और मृदु जल के स्रोत तो पहले से ही सीमित हैं।
प्र2.
आप जल संरक्षण की कौन-कौन सी विभिन्न विधियाँ सोच सकते हैं?
उत्तर

जल संरक्षण का अर्थ है— जल का विवेकपूर्ण उपयोग और जितना संभव हो उतना जल वापस लौटाना। इसकी तीन श्रेणियाँ हैं:

विधिक्या करें
कम उपयोग करेंआवश्यकता न होने पर नल बंद रखें; बाल्टी से नहाएँ; रिसाव ठीक कराएँ; कटोरे में सब्जी धोएँ; मशीन पूरी भरकर चलाएँ
पुनः उपयोग (पुनःचक्रण)खंगालने का जल और आर.ओ. से निकला जल पौधों, फर्श और शौचालय में उपयोग करें
जल लौटाएँ (संचयन)छत से वर्षा जल संचयन; रिचार्ज गड्ढे और सोख्ता गड्ढे; चेक डैम, तालाब और बावड़ियाँ; कुछ भूमि बिना पक्की छोड़ें ताकि वर्षा भूमि में समा सके
खेती में कम व्ययखेत भरने के बजाय टपक (ड्रिप) और फव्वारा सिंचाई; सूखी पत्तियों की पलवार
जल स्वच्छ रखेंप्रदूषण रोकना भी संरक्षण है— स्वच्छ जल ही उपयोग योग्य बना रहता है
यह आवश्यक क्यों है: मृदु जल के स्रोत सीमित होने के कारण भारत के अनेक भागों में जल की कमी है। कुछ स्थानों पर लोगों को पीने का पानी लाने के लिए बहुत दूर चलना पड़ता है। सभी के पास जल की समान उपलब्धता नहीं है— इसलिए जल का विवेकपूर्ण उपयोग केवल समझदारी नहीं, न्याय भी है।
प्र3.
आप जल संचयन की इन पारंपरिक पद्धतियों को अपने आस-पास खोजें। इसके बारे में और अधिक जानने के लिए अपने शिक्षकों और अभिभावकों से बातचीत करें।
उत्तर

पाइप और पंप आने से बहुत पहले भारत के हर क्षेत्र ने वर्षा जल पकड़ने और संचित करने की अपनी विधि विकसित कर ली थी। पता लगाइए कि इनमें से कौन-सी आपके क्षेत्र की है।

पारंपरिक विधिक्षेत्रयह कैसे कार्य करती है
बावड़ी / बावलीराजस्थानसीढ़ीदार गहरा कुआँ; वर्षा जल के साथ आस-पास की झीलों-तालाबों से रिसने वाला जल भी संचित करता है— जैसे तूरजी का झालरा, जोधपुर
वावगुजरातसीढ़ीदार बावड़ी— पाटन की रानी की वाव तथा अडालज की वाव
जोहड़, टाँका, खड़ीन, कुंडराजस्थानमिट्टी का छोटा बाँध; आँगन के नीचे भूमिगत टाँका; खेत में बहते जल को रोकने वाला मेड़-बंधा
आहर–पइनबिहार (मगध)पइन नामक नालियाँ नदी और वर्षा का जल आहर नामक जलाशय तक पहुँचाती हैं
एरी / केरे, कल्याणीतमिलनाडु, कर्नाटकगाँव के तालाबों और मंदिर-कुंडों की शृंखला, जो एक के बाद एक भरते जाते हैं
फड़ और बंधारामहाराष्ट्रनाले पर बना पत्थर का बंधारा जल को नहरों द्वारा खेतों तक ले जाता है
कुहल / कूल, नौला, गूलहिमाचल प्रदेश, जम्मू, उत्तराखंडहिमनद के नाले से निकाली गई छोटी नहरें; स्रोत पर बना सीढ़ीदार पत्थर का कुंड
बाँस टपक सिंचाई, जाबोमेघालय, नागालैंडचीरे हुए बाँस की नलियों से झरने का जल; पहाड़ी सीढ़ीदार खेतों में वर्षा का संचयन
सुरंगम, जिंग, विरदाकेरल, लद्दाख, कच्छ (गुजरात)लेटराइट पहाड़ी में खोदी गई सुरंग; हिमनद के पिघले जल का टाँका; रेतीले गड्ढे में उथला कुआँ

यह कार्य कैसे करें: दादा-दादी या किसी बुजुर्ग पड़ोसी से पूछिए कि गाँव या मोहल्ले में तालाब, जोहड़, बावड़ी, केरे या मंदिर-कुंड था या नहीं; उसकी देखभाल कौन करता था; और क्या आज भी उसमें जल रहता है। फिर उसका सरल रेखाचित्र बनाकर पाँच पंक्तियाँ लिखिए।

क्या आप जानते हैं? बावड़ी में केवल वर्षा का जल ही नहीं, आस-पास की झीलों, तालाबों और नदियों से रिसकर आने वाला जल भी संचित होता है। इसके लिए खाइयों की भीतरी दीवारें पत्थर के टुकड़ों से इस प्रकार बनाई जाती हैं कि उनमें से जल रिस सके।
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