जीवाश्म ईंधन के जलने से जलवायु क्यों प्रभावित होती है?
उत्तर
क्योंकि इससे हरितगृह गैसें प्रकृति की तुलना में कहीं अधिक तेजी से निकलती हैं, और ये गैसें सूर्य की गर्मी को रोक लेती हैं।
हरितगृह प्रभाव। यह प्राकृतिक और आवश्यक है; समस्या यह है कि हमने कुछ ही शताब्दियों में यह कंबल मोटा कर दिया।
पृथ्वी के प्राकृतिक कार्बन चक्र में कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) और अन्य गैसें धीरे-धीरे वायुमंडल में उत्सर्जित होती हैं और सूर्य से प्राप्त गर्मी को रोकती हैं।
यह प्राकृतिक हरितगृह प्रभाव पृथ्वी को जीवन के लिए आवश्यकतानुसार गर्म रखता है। इसके बिना हमारा ग्रह जमा हुआ होता।
किंतु उद्योग, परिवहन और कृषि जैसी मानवीय गतिविधियों ने कुछ ही शताब्दियों में इन गैसों की भारी मात्रा छोड़ दी — मुख्यतः कोयला, पेट्रोलियम तेल और प्राकृतिक गैस जलाकर।
यह तीव्र वृद्धि अतिरिक्त गर्मी को रोक लेती है, जिससे तेजी से वैश्विक तापन होता है।
वैश्विक तापन उन जलवायु प्रतिरूपों को बाधित कर देता है जिन पर हजारों वर्षों से पेड़-पौधों, जानवरों और मानव समाजों ने स्वयं को अनुकूलित किया था।
जीवाश्म ईंधन ही क्यों: कोयला, तेल और गैस वह कार्बन है जिसे पौधों और जीवों ने लाखों वर्ष पहले हवा से निकालकर मिट्टी, शैल और समुद्र के नीचे बंद कर दिया था। उन्हें जलाने का अर्थ है वह सारा प्राचीन कार्बन दो शताब्दियों में वापस हवा में लौटा देना। कार्बन नया नहीं है — गति नई है, और जीवधारी इतनी गति से स्वयं को नहीं ढाल सकते।
स्वयं जाँचिए: अध्याय का भारतीय उदाहरण — 2025 के आरंभ में देश का औसत तापमान सामान्य से 1 से 3 डिग्री सेल्सियस अधिक था, जिससे सर्दी बहुत कम और हल्की रही और कृषि उत्पादन तथा अनेक लघु उद्योग प्रभावित हुए।
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