| अ | उत्तर | ब | क्यों |
|---|---|---|---|
| (1) अक्षांश | (ख) | उत्तर एवं दक्षिण में अलग-अलग जलवायु बनाता है। | अक्षांश सूर्य की किरणों का कोण तय करता है — इसीलिए दक्षिण में कन्याकुमारी पूरे वर्ष गर्म और उत्तर में श्रीनगर ठंडा रहता है |
| (2) ऊँचाई | (ग) | ऊँचे स्थानों को अधिक ठंडा रखता है। | ऊँचाई पर वायुदाब और घनत्व घटते हैं और तप्त धरातल दूर होता है — ऊटी बनाम कोयंबटूर |
| (3) समुद्र से निकटता | (घ) | तापमान को प्रभावित करता है। | समुद्र तापमान को नियंत्रित करता है — मुंबई का ताप परिसर लगभग 14°C, नागपुर का 34°C |
| (4) मानसूनी पवन | (क) | भारत में गर्मी के दौरान नमीयुक्त पवन को लाता है। | दक्षिण-पश्चिम मानसून महासागर से नम वायु को तप्त भूभाग की ओर खींचता है, जो वर्षा बनकर गिरती है |
अन्वेषण अध्याय 3 प्रश्न और क्रियाकलाप
अद्यतन2026-09-05
मौसम वह है जिसे हम प्रतिदिन या हर घंटे अनुभव करते हैं — वर्षा, तेज धूप या तेज हवा। यह समय-समय पर परिवर्तित होता रहता है।
जलवायु मौसम का वह प्रतिरूप है जो किसी क्षेत्र या प्रदेश में लंबे समय तक — कम से कम कई दशकों तक — अनुभव किया जाता है। यह प्रतिरूप क्षेत्रानुसार अलग-अलग होता है और सामान्यतया स्थिर बना रहता है।
| मौसम | जलवायु | |
|---|---|---|
| अवधि | घंटे या दिन | तीन दशक या उससे अधिक |
| स्थिरता | निरंतर बदलता है | लंबे समय तक स्थिर |
| क्या बताता है | आज की वर्षा, धूप, हवा | किसी क्षेत्र में तापमान, वर्षण और पवन की दशा का प्रतिरूप |
| उदाहरण | ‘आज जयपुर में बहुत तेज हवा है’ | ‘जयपुर की जलवायु अर्ध-शुष्क से शुष्क है’ |
क्योंकि समुद्र तापमान को नियंत्रित करता है। भूमि ऊष्मा का अवशोषण शीघ्रता से करती है और शीघ्रता से छोड़ भी देती है; समुद्र ऊष्मा धीरे-धीरे अवशोषित करता है और धीरे-धीरे ही छोड़ता है।
| ऋतु | समुद्र क्या करता है | तट पर प्रभाव |
|---|---|---|
| ग्रीष्म | समुद्र ऊष्मा धीरे अवशोषित करता है, इसलिए भूमि से ठंडा रहता है | समुद्री पवन तटीय क्षेत्र को ठंडा करती है — गर्मियाँ बहुत गर्म नहीं होतीं |
| शीत | समुद्र ऊष्मा धीरे छोड़ता है, इसलिए भूमि से गर्म रहता है | समुद्री पवन तटीय क्षेत्र को गर्म करती है — सर्दियाँ बहुत ठंडी नहीं होतीं |
तट से स्थल की ओर बढ़ते ही तापमान अधिक चरम होता जाता है — ग्रीष्म में अधिक और शीत में कम। अध्याय की अपनी जोड़ी इसे सिद्ध करती है :
ताप परिसर = 32 − 18 = 14°C
नागपुर (तट से दूर) : ग्रीष्म 44°C तक, शीत ≈ 10°C
ताप परिसर = 44 − 10 = 34°C
अक्षांश एक ही, फिर भी नागपुर का परिसर 20°C अधिक चौड़ा।
मानसूनी पवनें ही भारत को उसकी पाँचवीं ऋतु और अधिकांश जल देती हैं। ये दो विपरीत चरणों में काम करती हैं।
| ग्रीष्म / दक्षिण-पश्चिम मानसून | शीत / उत्तर-पूर्व मानसून | |
|---|---|---|
| दाब | तप्त एशियाई भूभाग = निम्न दाब; ठंडा महासागर = उच्च दाब | ठंडा भूभाग = उच्च दाब; अपेक्षाकृत गर्म महासागर = निम्न दाब |
| पवन की दिशा | महासागर से स्थल की ओर | स्थल से महासागर की ओर |
| क्या लाती है | नमी, जो गर्म भूभाग पर संघनित होती है | शुष्क वायु — पर इनका एक भाग बंगाल की खाड़ी से नमी ग्रहण कर लेता है |
| परिणाम | भारी मानसूनी वर्षा; जून के आरंभ में दक्षिणी सिरे पर, जुलाई के मध्य तक पूरे उपमहाद्वीप पर | दक्षिण भारत में ठंडा शुष्क मौसम, किंतु पूर्वी और दक्षिणी भारत के कुछ भागों में वर्षा |
भारतीय जलवायु पर इनका प्रभाव :
- ये भारत को एक विशिष्ट वर्षा ऋतु देती हैं, जो विश्व के अधिकांश भागों में नहीं होती।
- ये पूर्वी भारत और दक्षिणी प्रायद्वीप की उष्णकटिबंधीय जलवायु की आर्द्र और शुष्क अवधियाँ बनाती हैं।
- स्थलाकृति के साथ मिलकर ये देश को बाँट देती हैं : पश्चिमी घाट के पश्चिमी ढलानों पर भारी वर्षा (उष्ण आर्द्र), जबकि पीछे दक्कन पठार पर कम और अंतरालों वाली वर्षा (अर्ध-शुष्क)।
- ये पूरे कृषि-वर्ष को नियंत्रित करती हैं — “नदियाँ जल से भर जाती हैं, मिट्टी में नमी आ जाती है, फसलें उगती हैं और जीवन फलता-फूलता है।”
दोनों में पाँच कारकों में से दो तीव्र रूप से भिन्न हैं — अक्षांश और ऊँचाई — और दोनों एक ही दिशा में काम करते हैं।
| कारक | चेन्नई | लेह |
|---|---|---|
| अक्षांश | निम्न — दक्षिणी प्रायद्वीप में, भूमध्य रेखा के निकट, इसलिए किरणें लगभग लंबवत और ऊर्जा केंद्रित | उच्च — सुदूर उत्तर, इसलिए किरणें तिरछी, बड़े क्षेत्र पर फैली और वायुमंडल के लंबे मार्ग से क्षीण |
| ऊँचाई | तटीय मैदान पर, लगभग समुद्र तल के बराबर | हिमालय में बहुत ऊँचाई पर — विरल वायु और तप्त धरातल से बहुत दूर, इसलिए कहीं अधिक ठंडा |
| समुद्र से निकटता | बंगाल की खाड़ी के तट पर, इसलिए समुद्र तापमान को नियंत्रित करता है — कड़ाके की सर्दी नहीं पड़ती | पूर्णतः भीतरी क्षेत्र, कोई नियंत्रक समुद्र नहीं, इसलिए सर्दियाँ अत्यंत कठोर |
| जलवायु का प्रकार | उष्णकटिबंधीय — लगभग पूरे वर्ष गर्म, आर्द्र, उत्तर-पूर्व मानसून से वर्षा | अल्पाइन — अत्यधिक ठंडी बर्फीली शीत ऋतु और शीतल ग्रीष्म |
लेह — उच्च अक्षांश + बहुत अधिक ऊँचाई + तट से बहुत दूर → ठंडा
पुस्तक के अंत में दिए भौतिक मानचित्र पर प्रत्येक नगर खोजिए, देखिए वह किस प्रकार की भूमि पर है, और फिर पृष्ठ 48 की सूची से उसकी जलवायु पढ़ लीजिए।
| नगर | कहाँ स्थित है | जलवायु | कारक कैसे काम करते हैं |
|---|---|---|---|
| लेह | हिमालय में बहुत ऊँचाई पर (लद्दाख), मुख्य शृंखलाओं के पार, तट से बहुत दूर | अल्पाइन — शीत मरुस्थल | बहुत अधिक ऊँचाई और उच्च अक्षांश इसे ठंडा बनाते हैं; पर्वत मानसून को रोक देते हैं, इसलिए यह अत्यंत शुष्क भी है — शीतल ग्रीष्म और जमा देने वाली, बर्फीली सर्दियाँ |
| चेन्नई | पूर्वी तट पर, बंगाल की खाड़ी के किनारे | उष्णकटिबंधीय | निम्न अक्षांश से पूरे वर्ष तेज धूप; समुद्र ताप परिसर छोटा और वायु आर्द्र रखता है; उत्तर-पूर्व मानसून से अक्टूबर–दिसंबर में मुख्य वर्षा |
| दिल्ली | उत्तरी मैदानों में, समुद्र से बहुत दूर | उपोष्ण कटिबंधीय | नियंत्रित करने वाला समुद्र नहीं, इसलिए ग्रीष्म अत्यधिक गर्म और शीत ठंडी; पश्चिम से आती गर्म शुष्क पवनें ताप लहर और उत्तर की ठंडी पवनें शीत लहर लाती हैं; वर्षा दक्षिण-पश्चिम मानसून से |
| पणजी | पश्चिमी तटीय पट्टी पर, ठीक पीछे पश्चिमी घाट | उष्णकटिबंधीय आर्द्र | समुद्र पूरे वर्ष तापमान सम रखता है; पश्चिमी घाट दक्षिण-पश्चिम मानसून को ऊपर उठाकर भारी वर्षा कराता है — चावल और मसालों के अनुकूल |
कैसे बनाएँ। चित्र 3.9 की तरह भारत के दो रेखा-मानचित्र साथ-साथ बनाइए — एक पर क) ग्रीष्म ऋतु और दूसरे पर ख) शीत ऋतु लिखिए। समुद्र से भीतर आती पवनों के लिए एक रंग और भूमि से बाहर जाती पवनों के लिए दूसरा रंग लीजिए।
| ग्रीष्म वाले मानचित्र पर | शीत वाले मानचित्र पर |
|---|---|
| उत्तर-पश्चिम भारत / एशियाई भूभाग पर निम्न दाब लिखिए | भूभाग पर उच्च दाब लिखिए |
| अरब सागर और बंगाल की खाड़ी पर उच्च दाब लिखिए | अपेक्षाकृत गर्म महासागर पर निम्न दाब लिखिए |
| समुद्र से स्थल की ओर तीर बनाइए : एक शाखा अरब सागर से पश्चिमी घाट से टकराती हुई, दूसरी बंगाल की खाड़ी से पूर्वोत्तर में मुड़कर हिमालय के साथ उत्तर-पश्चिम की ओर | स्थल से समुद्र की ओर तीर बनाइए, जो उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम की ओर जाएँ |
| उन्हें दक्षिण-पश्चिम मानसून नाम दीजिए; लिखिए ‘नम पवनें — भारी वर्षा’ | उन्हें उत्तर-पूर्व मानसून नाम दीजिए; लिखिए ‘शुष्क पवनें’, और एक तीर बंगाल की खाड़ी पार करते हुए दिखाइए जो नमी लेकर कोरोमंडल तट पर वर्षा करता है |
| आगमन की तिथियाँ लिखिए : दक्षिणी सिरा जून का आरंभ → पूरा देश जुलाई के मध्य तक | लिखिए ‘अक्टूबर–दिसंबर, पूर्वी और दक्षिणी भारत के कुछ भागों में वर्षा’ |
पोस्टर कैसे बनाएँ। चित्र यूँ ही बिखेरिए मत — पोस्टर को ऐसा आकार दीजिए जो स्वयं कुछ कहे। सबसे अच्छा तरीका है वर्ष का एक वृत्त, जिसमें प्रत्येक त्योहार अपने महीने पर रखा हो, ताकि देखते ही समझ आ जाए कि त्योहार कृषि-पंचांग के साथ चलते हैं।
अच्छे पोस्टर में हर त्योहार के लिए इतना अवश्य हो : नाम, राज्य या क्षेत्र, महीना/ऋतु, और एक पंक्ति में वह किस कृषि-घटना का उत्सव है — साथ में चित्र या रेखाचित्र।
नमूना उत्तर — अध्याय के चित्र 3.11 के ग्यारह त्योहार, वर्ष के क्रम में :
| त्योहार | कहाँ | कब | किसका उत्सव |
|---|---|---|---|
| लोहड़ी | पंजाब | 13 जनवरी | सबसे कड़ाके की ठंड का अंत; गन्ने और रबी की फसल; मूँगफली-रेवड़ी के साथ अलाव |
| मकर संक्रांति | पूरे भारत में | 14–15 जनवरी | सूर्य का उत्तरायण — दिन बड़े होने लगते हैं; पतंगबाजी |
| पोंगल | तमिलनाडु | जनवरी मध्य | धान की फसल; नए मिट्टी के बर्तन में नया चावल उबालना, मट्टु पोंगल पर बैलों का सम्मान |
| लोसुंग | सिक्किम | दिसंबर | फसल ऋतु का अंत, सिक्किमी नववर्ष |
| गुडी पड़वा | महाराष्ट्र | मार्च–अप्रैल | वसंत और नववर्ष; रबी की फसल घर आ चुकी होती है |
| बैसाखी | पंजाब, हरियाणा | 13–14 अप्रैल | गेहूँ की फसल; खेतों में भांगड़ा और गिद्दा |
| बिहू (रोंगाली) | असम | अप्रैल मध्य | कृषि वर्ष और बुवाई ऋतु का आरंभ |
| हेमिस | लद्दाख | जून–जुलाई | छोटी गर्म ऋतु में, जब ऊँचे दर्रे खुले होते हैं |
| ओणम | केरल | अगस्त–सितंबर | दक्षिण-पश्चिम मानसून के अंत की फसल; नौका दौड़ और ओणसद्या |
| छठ पूजा | बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश, झारखंड | अक्टूबर–नवंबर | खरीफ की फसल के बाद सूर्य को धन्यवाद; नदी में खड़े होकर अर्घ्य |
| अवि शीतकालीन महोत्सव | अरुणाचल प्रदेश | शीत ऋतु | ठंडे महीनों का सामुदायिक उत्सव, नृत्य और पारंपरिक वेशभूषा के साथ |
अच्छी डायरी-प्रविष्टि में क्या चाहिए: तिथि और स्थान, उत्तम पुरुष (‘मैं’), सामान्य आशाओं के स्थान पर ठोस काम, एक चिंता, और प्रकृति का एक संकेत कि वर्षा आ रही है — यह अंतिम स्पर्श आपके उत्तर को सीधे पृष्ठ 56 से जोड़ देता है।
नमूना उत्तर:
28 मई — गाँव कोंढवा, महाराष्ट्र
कुएँ के पास वाला अमलतास दस दिन पहले खिल गया था, और कल शाम चींटियाँ अपने अंडे लेकर मेड़ पर लंबी कतार में ऊपर जा रही थीं। दादाजी कहते थे कि इसका अर्थ है वर्षा निकट है। रेडियो कहता है मानसून केरल पहुँच चुका है, तो शायद हमारे पास दो सप्ताह हैं।
आज ऊपर वाले खेत की जुताई पूरी कर ली और ढेलों को धूप में तपने दिया; कल उसे समतल करूँगा, ताकि पानी बहकर मिट्टी न ले जाए। पूर्व की ओर की मेड़, जो पिछले वर्ष टूट गई थी, बाँध दी है, और सड़क से तालाब तक जाने वाली छोटी नाली साफ कर दी है — वह प्लास्टिक और काँटों से भरी पड़ी थी।
सोयाबीन का बीज खरीदकर अटारी में सूखा रखा है, कीड़ों से बचाने को नीम के पत्तों के साथ। मैंने अभी बोया नहीं है, और पड़ोसी चाहे जो करें, मैं जल्दी नहीं करूँगा। दो वर्ष पहले पहली बौछार पर आधे गाँव ने बो दिया था और फिर तीन सप्ताह वर्षा ही नहीं हुई — सब सूख गया और बीज का पैसा भी गया। इस बार वर्षा जम जाने की प्रतीक्षा करूँगा।
अभी बाकी है : गोशाला की टपकती छत ठीक करना, पंप के लिए एक पाइप लाना और बैलों को दिखाना। यदि इस बार वर्षा अच्छी रही तो सहकारी समिति का ऋण चुका दूँगा और शायद एक पुराना छिड़काव-यंत्र भी ले लूँ।
वर्षा समय पर आए, और एक साथ न आए।
निबंध की रूपरेखा — पाँच छोटे अनुच्छेद : (1) आपदा का नाम और एक वास्तविक उदाहरण, (2) कारण — प्राकृतिक और मानवीय, (3) लोगों, पेड़-पौधों, जानवरों और अर्थव्यवस्था पर प्रभाव, (4) व्यक्ति, समुदाय और सरकार के उपाय, (5) समापन वाक्य।
नमूना उत्तर — बाढ़
यह क्या है। जब शुष्क भूमि पर जल का अति प्रवाह होने लगता है, तो बाढ़ आती है। ऐसा भारी वर्षा से हो सकता है, जब सतह पर इतना जल बह निकले कि भूमि उसे सोख न पाए, या तब जब नदियों और झीलों में इतना जल जमा हो जाए कि वह बाहर बहने लगे और किनारे टूट जाएँ। प्रायः बाढ़ मानसून के दौरान आती है और असम, बिहार, उत्तर प्रदेश, केरल तथा आंध्र प्रदेश विशेष रूप से संवेदनशील हैं। 2013 में उत्तराखंड में एक अलग प्रकार की बाढ़ आई : कई दिनों की लगातार भारी वर्षा से हिमनदीय विस्फोट हुआ, फिर भूस्खलन हुए, केदारनाथ मंदिर के आस-पास का क्षेत्र नष्ट हो गया और लगभग 6000 लोगों — जिनमें अधिकतर तीर्थयात्री थे — की मृत्यु हुई।
कारण। प्राकृतिक कारण हैं भारी मानसूनी वर्षा, हिम-जल से भरी नदियाँ, धीमे निकास वाली समतल भूमि, और हिमनदीय झीलों का अवरोध तोड़ना। मानवीय कारण क्षति को कहीं अधिक बढ़ा देते हैं : ऊपरी क्षेत्रों में वनों की कटाई, जिससे वर्षा नंगे ढलानों से तेजी से बह आती है; जलमार्गों पर अतिक्रमण करता निर्माण; शहरों की जल निकासी पर अत्यधिक बोझ; कंक्रीट और डामर की सतहें जो जल को भूमि में सोखने नहीं देतीं; और जलवायु परिवर्तन, जो हिमनदों को तेजी से पिघला रहा है और वर्षा को अधिक चरम बना रहा है।
प्रभाव। लोग घर और कभी-कभी जीवन खो देते हैं; परिवार राहत शिविरों में रहते हैं और दूषित जल पीते हैं, जिससे बीमारियाँ फैलती हैं। खड़ी फसल सड़ जाती है और किसानों तथा श्रमिकों की पूरे वर्ष की आय चली जाती है, जिससे वे नगरों की ओर पलायन करते हैं। पशुधन डूब जाता है। सड़कें, पुल, विद्यालय और बिजली की लाइनें नष्ट हो जाती हैं, और जो धन नया बनाने में लगता, वह पुराने की मरम्मत में चला जाता है। खाद्यान्न सबके लिए महँगा हो जाता है और मुद्रास्फीति बढ़ती है — बाढ़ सैकड़ों किलोमीटर दूर की रसोइयों में भी महसूस होती है।
क्या किया जा सकता है।
| व्यक्ति | समुदाय | सरकार |
|---|---|---|
| नाली में प्लास्टिक कभी न फेंकें; कागज और मूल्यवान वस्तुएँ ऊँचाई पर रखें; चेतावनी संकेत और ऊँची जगह तक का रास्ता सीखें; वृद्ध पड़ोसियों को समय रहते हटाने में सहायता करें | मानसून से पहले नालियाँ और नहरें साफ करें; गाँव के तालाब पुनर्जीवित करें; ढलानों और किनारों पर वृक्ष लगाएँ; जलमार्गों पर अवैध निर्माण का विरोध और सूचना दें; बचाव तथा प्राथमिक चिकित्सा का प्रशिक्षण चलाएँ | बाढ़ पूर्वानुमान और पूर्व-चेतावनी तंत्र; नदियों की गाद निकालना और नाले चौड़े करना; तटबंधों का निर्माण और रखरखाव; भवन-नियमों का कड़ा पालन और अतिक्रमण हटाना; हिमालयी हिमनदीय झीलों की निगरानी; एन.डी.आर.एफ. को सुसज्जित और तैयार रखना; शीघ्र राहत और फसल बीमा |
निष्कर्ष। बाढ़ का आरंभ वर्षा से होता है, जिसे कोई रोक नहीं सकता। किंतु वर्षा को आपदा बनाती है एक बंद नाली, एक कटा हुआ जंगल और नदी के मार्ग में बना एक घर — और इनमें से हर एक मनुष्य का लिया हुआ निर्णय है। इसीलिए जलवायु की समझ महत्वपूर्ण है : वह जल को हटाती नहीं, पर बता देती है कि कहाँ खड़े नहीं होना चाहिए।