प्र1.
व्यापारिक मार्गों के मानचित्र का अवलोकन करें। उन भौगोलिक विशेषताओं की पहचान करें, जिन्होंने व्यापारियों को उपमहाद्वीप में यात्रा करने में सहायता की।
उत्तर
चित्र 5.5 को उसके पीछे के धरातलीय रंगों के साथ देखिए — मार्ग मैदानों, नदी-घाटियों, दर्रों और तटों का अनुसरण करते हैं और ऊँचे पर्वतों तथा घने वनों से बचते हैं।
| भौगोलिक विशेषता | सहायता कैसे मिली | मानचित्र में कहाँ |
|---|---|---|
| गंगा का मैदान | समतल, उपजाऊ, जल से भरपूर — पैदल और गाड़ियों के लिए सबसे सरल भूमि | बैंगनी उत्तरापथ इसी पर है — तक्षशिला → हस्तिनापुर → श्रावस्ती → काशी → पाटलिपुत्र → चंपा → ताम्रलिप्ति |
| नदियाँ | नौकाएँ भारी माल सस्ते में ले जाती थीं; तट जल भी देते थे और दिशा भी | गंगा; तथा पाठ का यह कथन कि गंगा और सोन ने मगध को व्यापारिक लाभ दिया |
| उत्तर-पश्चिम के पर्वतीय दर्रे | हिंदूकुश–हिमालय की दीवार में एकमात्र द्वार, जो भारत को मध्य एशिया और भूमध्यसागर से जोड़ते थे | तक्षशिला तक आता और मानचित्र से आगे बढ़ता मार्ग |
| विंध्य तथा दक्कन के दर्रे व घाटियाँ | दक्षिणी मार्ग को पठार चढ़ने के बजाय पार करने देते थे | पीला दक्षिणापथ — कौशांबी → उज्जयिनी → प्रतिष्ठान की ओर |
| लंबा समुद्रतट और प्राकृतिक बंदरगाह | दूरस्थ देशों तक समुद्री व्यापार; बंदरगाह स्थल-मार्गों को जहाज़ों से जोड़ते थे | पश्चिम में भरुकच्छ, सोपारा, द्वारका; प्रायद्वीप के चारों ओर ताम्रलिप्ति, कलिंगनगर, कावेरीपट्टनम, मुचिरि, मदुरै |
| अरब सागर और बंगाल की खाड़ी | मानसूनी पवनें पालवाले जहाज़ों को भारत तक लाती और ले जाती थीं | दोनों सागर मानचित्र पर अंकित हैं, और दोनों पर बंदरगाह |
स्वयं जाँचिए: दोनों मार्गों के नाम ही दिशा बता देते हैं — उत्तर + पथ = उत्तरापथ, अर्थात् उत्तर का महामार्ग; दक्षिण + पथ = दक्षिणापथ, अर्थात् दक्षिण का मार्ग।