अन्वेषण अध्याय 5 आइए पता लगाएँ

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
उपर्युक्त शिल्प-पट्टिका का सूक्ष्म अवलोकन करें। आप इनमें कितने प्रकार के शस्त्रों की पहचान कर सकते हैं? आपको लोहे के कौन-कौन से उपयोग दिखाई देते हैं?
उत्तर

ध्यान से देखने पर लगभग पाँच-छह प्रकार के शस्त्र तथा रक्षा-सामग्री पहचानी जा सकती है।

पट्टिका में दिखाई देने वाले शस्त्र और साज-सामान:

  • लंबे भाले / बरछे — पैदल सैनिकों की भीड़ में सबसे अधिक; कई कंधों पर तिरछे रखे हैं।
  • तलवारें — छोटी, चौड़ी फलक वाली, पैदल सैनिकों और घुड़सवारों दोनों के पास।
  • धनुष-बाण — घिरे हुए नगर के आस-पास और सैनिकों की पंक्तियों में धनुर्धर दिखते हैं।
  • ढालें — बाएँ हाथ पर आयताकार और गोलाकार ढालें।
  • फरसे / अंकुशाकार शस्त्र — नगर-द्वार के पास कुछ आकृतियों के हाथों में।
  • अंकुश — हाथियों पर बैठे महावतों के हाथ में; शत्रु का शस्त्र नहीं, पर युद्ध की अनिवार्य सामग्री।
  • शिरस्त्राण (हेलमेट) तथा हाथियों-घोड़ों का साज।

लोहे के दिखाई देने वाले उपयोग:

पट्टिका की वस्तुलोहे का उपयोग किसमें
भाले की नोक, तलवार का फलक, बाण के फल, फरसे की धारशस्त्र — काँसे से हल्के और तेज, इसलिए सैनिक अधिक देर तक चला सकते थे
ढाल की धार और मध्य-चक्र, शिरस्त्राण, कवच के जोड़रक्षा-साधन
रथ के पहियों की हाल, धुरी, कीलें और पट्टियाँवाहन और परिवहन
अश्वों की लगाम की कड़ियाँ, अंकुश, साज के छल्लेपशु-संचालन
नगर-द्वार, दरवाज़ों की पट्टियाँ, परकोटे, घेराबंदी की सामग्रीनिर्माण और दुर्गीकरण
ऐसा क्यों: इससे पिछला पृष्ठ मगध के विषय में यही कहता है। निकटवर्ती पर्वतीय क्षेत्रों के लौह अयस्क ने मगध को एक साथ दो वस्तुएँ दीं — लोहे के हल, जिनसे फसल बढ़ी, और हल्के, तेज लोहे के शस्त्र, जिनसे सेना सशक्त हुई। कथा के आरंभ में इरा के पिता लोहार हैं, जिन्होंने “कई तलवारों को गढ़ने में सहायता” की है। अधिशेष अन्न और लोहे के शस्त्र — यही साम्राज्य का सूत्र है।
प्र2.
शिल्प-पट्टिका के बाएँ भाग में कलश के ऊपर एक छत्र रखा हुआ है, जिसमें बुद्ध के अवशेष रखे हैं। आपके विचार में ऐसा क्यों किया गया होगा?
उत्तर

क्योंकि भारतीय कला में छत्र सर्वोच्च सम्मान और प्रभुसत्ता का प्रतीक है — छत्र राजा के ऊपर धारण किया जाता था। अवशेष-कलश के ऊपर रखा छत्र बिना शब्दों के कह देता है कि जो ले जाया जा रहा है, वह राजोचित, पवित्र और सर्वोपरि है।

तीन स्तरों पर इसका अर्थ —

  1. राजकीय सम्मान। शोभायात्रा में छत्र सम्राटों पर धारण किया जाता था। कलश पर रखा छत्र बुद्ध को नीचे लड़ते राजाओं से भी बड़ा, आध्यात्मिक प्रभु घोषित करता है।
  2. रक्षा और श्रद्धा। छत्र अपने नीचे की वस्तु की रक्षा करता है। यह बताता है कि अवशेष केवल ले जाने योग्य नहीं, रक्षा करने योग्य हैं।
  3. पूरे युद्ध की व्याख्या। पट्टिका में सेनाएँ बुद्ध के अवशेष पाने के लिए कुशीनारा की घेराबंदी कर रही हैं। छत्र दर्शक को बता देता है कि राजा एक छोटे कलश के लिए युद्ध क्यों करेंगे — ये अवशेष भूमि से भी अधिक मूल्यवान माने जाते थे।
क्या आप जानते हैं? आगे चलकर छत्र स्तूप का ही अंग बन गया — पृष्ठ 111 के चित्र 5.26 में साँची के महास्तूप के शिखर पर पत्थर का छत्र देखा जा सकता है।
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