प्र1.
अशोक ने अपने एक अभिलेख में अपने अधिकारियों के आचरण संबंधित विस्तृत निर्देश दिए हैं। उन्होंने यह सुनिश्चित करने की व्यवस्था की कि अधिकारी निष्पक्षता से कार्य करें। निम्नलिखित अनुवाद को पढ़िए और बताइए कि क्या ये उपाय साम्राज्य के प्रबंधन में सहायक सिद्ध हुए होंगे? यदि हाँ, तो कैसे? ‘देवानामपिय’ के आदेशानुसार— अधिकारियों और नगर न्यायाध्यक्षों को यह निर्देश दिया गया है— (...) तुम लोग अनेक सहस्र प्राणियों के ऊपर नियुक्त किए गए हो। तुम्हें मनुष्यों का स्नेह अर्जित करना चाहिए। सब मनुष्य मेरी संतान के समान हैं। जिस तरह मैं चाहता हूँ कि मेरी संतान इस लोक और परलोक दोनों में मंगल और सुख प्राप्त करे, उसी तरह मैं सब मनुष्यों के लिए कामना करता हूँ। (...) तुम्हें निष्पक्षता से न्याय करना चाहिए। (...) इन सबका मूल क्रोध का त्याग और धैर्य का पालन है। (...) यह लेख यहाँ इसलिए लिखवाया गया है कि नगर के न्याय शासक हमेशा सावधान रहें कि मनुष्यों को कभी अकारण कैद या यातना न दी जाए। (...) और इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु मैं प्रत्येक पाँचवें वर्ष एक नम्र और दयालु महामात्र भेजूँगा जो इसकी खोज करने के बाद ..., यह देखेगा कि मेरे आदेशों का पालन किया जाता है या नहीं।
उत्तर
हाँ — बहुत हद तक। ध्यान से देखिए तो अशोक ने केवल नैतिक उपदेश नहीं दिया; उन्होंने चार पुर्ज़ों वाली एक छोटी व्यवस्था खड़ी की है।
| अभिलेख क्या करता है | उसके अपने शब्द | इससे साम्राज्य-प्रबंधन में सहायता कैसे |
|---|---|---|
| आचरण का स्पष्ट मानक तय करता है | “तुम्हें निष्पक्षता से न्याय करना चाहिए”; “क्रोध का त्याग और धैर्य का पालन” | दूरस्थ प्रांतों के अधिकारियों को ठीक-ठीक पता था कि उनसे क्या अपेक्षित है। अस्पष्ट अपेक्षाएँ मनमानी को जन्म देती हैं। |
| आदेश के साथ कारण भी देता है | “सब मनुष्य मेरी संतान के समान हैं… उसी तरह मैं सब मनुष्यों के लिए कामना करता हूँ” | जो अधिकारी कारण को स्वीकार कर ले, वह तब भी उचित आचरण करता है जब कोई देख न रहा हो। केवल भय निरीक्षक के जाते ही समाप्त हो जाता है। |
| नियम को सार्वजनिक रूप से उत्कीर्ण कराता है | “यह लेख यहाँ इसलिए लिखवाया गया है कि…” | यही सबसे तीक्ष्ण भाग है। सामान्य जन नियम सुन सकते थे और अपने अधिकार जानते थे। अब कोई अधिकारी यह नहीं कह सकता था कि सम्राट ने क्रूरता की अनुमति दी है। |
| निरीक्षण की व्यवस्था करता है | “प्रत्येक पाँचवें वर्ष एक नम्र और दयालु महामात्र भेजूँगा” | बिना जाँच का नियम केवल इच्छा है। भ्रमणशील निरीक्षक — और वह भी जानबूझकर सौम्य चुना गया — मानक को वास्तविक बनाता है। |
| सबसे बड़े अत्याचार से रक्षा करता है | “मनुष्यों को कभी अकारण कैद या यातना न दी जाए” | अन्यायपूर्ण कैद ही प्रजा को विद्रोही बनाती है। उसे रोकना विद्रोह दबाने से सस्ता है। |
यह व्यवस्था कहाँ अपर्याप्त रहती:
- पाँच वर्ष लंबा अंतराल है। दो निरीक्षणों के बीच कोई कठोर न्यायाध्यक्ष बहुत क्षति कर सकता था।
- अधिकांश लोग पढ़ नहीं सकते थे। अभिलेख तभी काम करता जब कोई पढ़कर सुनाए — और वह प्रायः वही अधिकारी होता जिस पर निगरानी थी।
- स्वतंत्र न्यायपालिका नहीं थी। महामात्र सम्राट का ही अधिकारी था; अपील के लिए अलग न्यायालय नहीं था।
- यह एक व्यक्ति की इच्छा पर टिकी थी। अध्याय कहता है कि अशोक के उत्तराधिकारी साम्राज्य को एकजुट नहीं रख सके — जो व्यवस्था शीर्ष के व्यक्तित्व पर निर्भर हो, वह दुर्बल होती है।
ऐसा क्यों: साम्राज्य उतना ही अच्छा होता है जितने अच्छे उसके अधिकारी, क्योंकि सम्राट हर जगह नहीं हो सकता। अशोक का उत्तर तीन बातों का मेल है — सार्वजनिक मानक, कारण सहित आदेश, और नियमित निरीक्षण — और मोटे तौर पर आधुनिक प्रशासन आज भी इसी विधि से अधिकारियों को उत्तरदायी बनाए रखने का प्रयास करते हैं।