प्र1.
एक इतिहासकार के रूप में अगले पृष्ठ पर प्रस्तुत कलाकृतियों को ध्यान से देखें। मौर्य युग के लोगों और जीवन के बारे में आप इनसे क्या निष्कर्ष निकाल सकते हैं?
उत्तर
इतिहासकार वस्तुओं को उसी तरह पढ़ता है जैसे आप वाक्य पढ़ते हैं। पृष्ठ 110–111 की प्रत्येक कलाकृति क्या बताती है, देखिए —
| कलाकृति | क्या दिखता है | मौर्यकालीन जीवन के विषय में क्या पता चलता है |
|---|---|---|
| चित्र 5.21 टेराकोटा की नर्तकी | अलंकृत शिरोभूषा, सँवारे केश, भारी आभूषण, लहराता अधोवस्त्र | नृत्य और संगीत जीवन का अंग थे; लोग वेशभूषा और आभूषण के प्रति सजग थे; कुशल स्वर्णकार थे |
| चित्र 5.22 टेराकोटा की देवी | अलंकृत शिरोभूषा और फैली हुई भुजाओं वाली आकृति | घरेलू उपासना — केवल विशाल स्मारकों में नहीं; मिट्टी की ऐसी मूर्तियाँ साधारण परिवार भी रख सकते थे |
| चित्र 5.23 चँवर धारण किए यक्षी | अत्यंत परिष्कृत पत्थर, आगे-बगल-पीछे तीनों दृश्य, हार, चँवर | निपुण मूर्तिकार; चँवर राजसेवा का प्रतीक है, अतः कला धर्म और राजसत्ता दोनों की सेवा में थी |
| चित्र 5.24 सप्तमातृका पट्टिका | एक ही पट्टिका पर पंक्तिबद्ध सात मातृ-देवियाँ | मातृदेवी की उपासना — और शीर्षक कहता है ‘एक सतत परंपरा’, अर्थात् कुछ विश्वास 2,000 वर्ष से चले आ रहे हैं |
| चित्र 5.25 टेराकोटा के घोड़े का सिर | अत्यंत अलंकृत लगाम | अश्वों का महत्व — युद्ध, परिवहन और प्रतिष्ठा के लिए — और साज बनाने का विकसित शिल्प; संभवतः बच्चों का खिलौना भी |
| चित्र 5.20 सारनाथ का स्तंभ-शीर्ष | चार सिंह, नीचे वलय में हाथी, बैल, घोड़ा और सिंह तथा धर्मचक्र; दर्पण जैसी पॉलिश | मौर्यकालीन पॉलिश अद्भुत तकनीकी कौशल थी; राजसत्ता और बुद्ध की शिक्षा एक साथ प्रदर्शित |
| चित्र 5.26 साँची का महास्तूप | ईंटों का विशाल मूल ढाँचा, बाद में पत्थर से विस्तारित, वेदिका और तोरण | राज्य विशाल निर्माण परियोजनाएँ संगठित कर सकता था; बौद्ध धर्म को राजाश्रय था; स्तूप, चैत्य और विहार उपासना, अध्ययन और ध्यान के लिए |
| चित्र 5.27 धौली का शैल-हाथी | जीवंत चट्टान से तराशा आदमकद हाथी, पास ही अशोक का शिलालेख | मूर्तिकला का उपयोग जन-संचार के लिए — कला और संदेश वहीं, जहाँ से लोग गुज़रते थे |
| चित्र 5.29 आहत सिक्के | अनेक चिह्नों से अंकित चाँदी के टुकड़े | मुद्रा-आधारित अर्थव्यवस्था, तीव्र व्यापार, और सिक्कों के भार व शुद्धता की राजकीय गारंटी |
इतिहासकार के निष्कर्ष, संक्षेप में:
- समाज समृद्ध और विशेषज्ञतापूर्ण था — मूर्तिकार, कुम्हार, स्वर्णकार, साज बनाने वाले, धातुकर्मी सभी अपने शिल्प से जीविका चलाते थे।
- टेराकोटा जनसाधारण की कला थी और पॉलिश किया पत्थर राज्य की; इसलिए हमें साधारण और राजसी दोनों जीवन दिखाई देते हैं।
- स्त्रियाँ बार-बार दिखती हैं — नर्तकी, देवी, यक्षी के रूप में — अतः कला और उपासना दोनों में उनका केंद्रीय स्थान था।
- धार्मिक जीवन विविध था — मातृदेवियाँ और यक्षियाँ बौद्ध स्तूपों के साथ-साथ।
- राज्य इतना सशक्त और संपन्न था कि स्मारक बनवा सके, सिक्के ढाल सके और चट्टानें तराशवा सके।
सुझाव: अच्छा इतिहासकार यह भी बताता है कि वस्तुएँ क्या नहीं बता सकतीं। ये कलाकृतियाँ इसलिए बचीं क्योंकि वे पकी मिट्टी और पत्थर की थीं। वस्त्र, लकड़ी, भोजन और निर्धनों के घर नष्ट हो गए — इसलिए यह चित्र सच्चा तो है, पूर्ण नहीं।