प्र1.
हमने ब्राह्मी लिपि में लिखी प्राकृत भाषा का उल्लेख किया है। इसका क्या अर्थ है? सरल शब्दों में, भाषा वह है जो हम बोलते हैं, जबकि लिपि वह है जिसमें हम एक भाषा को लिखते हैं। क्या आप हमारे दैनिक जीवन में इसके उदाहरण सोच सकते हैं?
उत्तर
हाँ — भारत ऐसे उदाहरणों से भरा है। प्रतिदिन का प्रमाण यह है कि एक लिपि अनेक भाषाएँ लिख सकती है और एक भाषा एक से अधिक लिपियों में लिखी जा सकती है।
एक लिपि, अनेक भाषाएँ:
| लिपि | इसमें लिखी जाने वाली भाषाएँ |
|---|---|
| देवनागरी | हिंदी, मराठी, नेपाली, कोंकणी, संस्कृत, मैथिली, बोडो |
| रोमन (लैटिन) | अंग्रेज़ी, फ़्रेंच, जर्मन, स्पेनिश — और मोबाइल पर टाइप की गई हिंदी ‘kaise ho’ |
| फ़ारसी-अरबी | उर्दू, कश्मीरी, फ़ारसी, अरबी |
| बांग्ला | बांग्ला, असमिया, मणिपुरी |
एक भाषा, एक से अधिक लिपियाँ:
- संस्कृत आज देवनागरी में छपती है, परंतु बांग्ला, ग्रंथ, शारदा, तेलुगु आदि लिपियों में भी लिखी जाती रही है।
- कोंकणी देवनागरी, रोमन और कन्नड लिपियों में लिखी जाती है।
- पंजाबी भारत में गुरुमुखी में और पाकिस्तान में फ़ारसी-अरबी लिपि में लिखी जाती है।
- सिंधी देवनागरी और फ़ारसी-अरबी दोनों में लिखी जाती है।
- हिंदी के संदेश प्रतिदिन रोमन लिपि में टाइप किए जाते हैं।
दैनिक जीवन में कहाँ देखें: रेलवे स्टेशन का नाम-पट्ट, जिस पर वही नाम राज्य की भाषा, हिंदी और अंग्रेज़ी में लिखा होता है; करेंसी नोट, जिस पर राशि अनेक भाषाओं में लिखी होती है; मील का पत्थर; अपने नगर की दुकान का दो लिपियों वाला बोर्ड।
यहाँ इसका महत्व: इसीलिए अशोक का चयन बुद्धिमत्तापूर्ण था। उन्होंने प्राकृत चुनी — वह भाषा जो भारत के अनेक भागों में वास्तव में बोली जाती थी — और उसे ब्राह्मी में लिखवाया, जिसे लोग पढ़ सकते थे; “ब्राह्मी भारत की सभी क्षेत्रीय लिपियों की जननी मानी जाती है।” भाषा कान तक पहुँची, लिपि आँख तक। ‘महान संचारक’ को दोनों चाहिए।
यह कीजिए: अपना नाम दो लिपियों में लिखिए। ध्वनि नहीं बदलेगी, केवल आकृतियाँ बदलेंगी। भाषा और लिपि का पूरा अंतर बस इतना ही है।