प्र1.
कौटिल्य कहते हैं, “एक राजा को अपनी प्रजा के कल्याण को बढ़ावा देकर अपनी शक्ति में वृद्धि करनी चाहिए, क्योंकि शक्ति ग्राम-क्षेत्र से आती है, जो समस्त आर्थिक गतिविधियों का स्रोत है। (राजा को) ग्रामीण क्षेत्र में उन लोगों पर विशेष अनुग्रह करना चाहिए, जो लोगों को लाभ पहुँचाने वाले कार्य करते हैं, जैसे – तटबंध या सड़क-पुल बनाना, गाँवों का सौंदर्यीकरण करना अथवा उनकी रक्षा करने में सहायता प्रदान करना।” आपके अनुसार ग्रामीण क्षेत्र का विशेष ध्यान रखना क्यों महत्वपूर्ण था? (संकेत – इस अध्याय के आरंभ में आपने जो पढ़ा है, उस पर पुनः विचार कीजिए।)
उत्तर
क्योंकि साम्राज्य की शक्ति वास्तव में ग्राम-क्षेत्र से ही आती थी। अध्याय के आरंभ की शृंखला देखिए —
उपजाऊ ग्राम-क्षेत्र → अधिशेष अन्न → सैनिकों का पोषण और शिल्पकारों की मुक्ति
शिल्प + कृषि-उपज → व्यापार की वस्तुएँ → अधिक व्यापार → कोष में अधिक कर
भरा कोष → सेना, अधिकारी, सड़कें → साम्राज्य टिका रहता है
शिल्प + कृषि-उपज → व्यापार की वस्तुएँ → अधिक व्यापार → कोष में अधिक कर
भरा कोष → सेना, अधिकारी, सड़कें → साम्राज्य टिका रहता है
छह ठोस कारण:
- अन्न। सेना अन्न पर चलती है। अध्याय कहता है कि वर्ष में दो फसलें होती थीं, अकाल कम पड़ते थे और अन्न-भंडार भरे रहते थे — दीर्घ अभियान इसी से संभव होते हैं।
- कर-राजस्व। कृषि “साम्राज्य के लिए राजस्व का महत्वपूर्ण स्रोत थी”। ग्राम नहीं तो कोष नहीं।
- जनशक्ति। सैनिक, भारवाहक, गाड़ीवान और शिल्पकार — सब गाँवों से आते थे।
- कच्चा माल। इमारती लकड़ी, औषधियाँ, हाथी, लौह अयस्क और खनिज — जैसा इरा पृष्ठ 86 पर बताती है, ये वनों और पर्वतों से आते थे।
- निष्ठा। संतुष्ट ग्राम-क्षेत्र विद्रोह नहीं करता और आक्रमणकारी का स्वागत नहीं करता। अध्याय के अंत में प्रांतों का असंतोष साम्राज्य के पतन का कारण गिनाया गया है।
- लोक-निर्माण संपत्ति बढ़ाते हैं। तटबंध जल रोकते हैं, सड़क-पुल व्यापार चलाते हैं, रक्षा से ग्रामवासी पलायन नहीं करते — प्रत्येक कार्य अगले वर्ष का राजस्व बढ़ाता है। इन्हें बनाने वालों पर अनुग्रह सबसे सस्ता निवेश है।
ऐसा क्यों: कौटिल्य यहाँ दयालुता की बात नहीं, व्यावहारिकता की बात कर रहे हैं। वाक्य का क्रम ध्यान से पढ़िए — “राजा को अपनी प्रजा के कल्याण को बढ़ावा देकर अपनी शक्ति में वृद्धि करनी चाहिए।” कल्याण राजा का उपकार नहीं, उसकी अपनी शक्ति का स्रोत है। उनका मूल दर्शन भी यही कहता है — “अपनी प्रजा की प्रसन्नता में राजा की प्रसन्नता निहित है, प्रजा की भलाई में उसकी भलाई है।”
क्या आप जानते हैं? सोहगौरा ताम्रपत्र अभिलेख (चौथी–तीसरी शताब्दी सा.सं.पू., उत्तर प्रदेश) में अकाल से बचाव हेतु अन्न-भंडार की स्थापना का उल्लेख है — यही नीति का ठोस, भौतिक प्रमाण।