अन्वेषण अध्याय 5 महत्वपूर्ण प्रश्न

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
साम्राज्य क्या होता है?
उत्तर

साम्राज्य अनेक छोटे राज्यों या क्षेत्रों का वह समूह है, जिन पर कोई एक शक्तिशाली शासक — अथवा शासकों का समूह — अपनी शक्ति का प्रयोग करता है, प्रायः उन पर युद्ध करके। ‘एंपायर’ शब्द लैटिन इंपीरियम से बना है, जिसका अर्थ है ‘सर्वोच्च शक्ति’।

ध्यान देने योग्य बात यह है कि छोटे राज्य समाप्त नहीं होते। उनके अपने शासक बने रहते हैं, परंतु वे सम्राट के करद राज्य बन जाते हैं — वे धन, स्वर्ण, अन्न, पशु, हाथी अथवा अन्य बहुमूल्य वस्तुएँ भेंट के रूप में देते हैं, जो समर्पण, निष्ठा या सम्मान का प्रतीक होता है, और सम्राट की अधिसत्ता स्वीकार करते हैं। सम्राट संपूर्ण भूभाग पर अपनी राजधानी से शासन करता है, जो प्रायः आर्थिक और प्रशासनिक शक्ति का सबसे बड़ा केंद्र होती है।

प्राचीन संस्कृत ग्रंथों में ‘सम्राट’ के लिए प्रयुक्त शब्द यही बात तीन प्रकार से कहते हैं —

शब्दअर्थ
सम्राज्‘सबका स्वामी’ अथवा ‘सर्वोच्च शासक’
अधिराज‘अधिपति’
राजाधिराज‘राजाओं का राजा’
ऐसा क्यों: राज्य भूमि और जन की एक इकाई है। साम्राज्य बहुस्तरीय होता है — राजाओं के ऊपर एक राजा। यही अतिरिक्त स्तर सेना, प्रशासन, सड़कों और कोष की माँग करता है, और यही स्तर साम्राज्य को टिकाए रखना इतना कठिन बना देता है।
प्र2.
साम्राज्यों का उदय कैसे हुआ और उन्होंने भारतीय सभ्यता को कैसे आकार दिया?
उत्तर

साम्राज्यों का उदय महाजनपदों की पारस्परिक प्रतिस्पर्धा से हुआ और उन्होंने भारत को हर स्तर पर — राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक — आकार दिया।

उदय कैसे हुआ (अध्याय की अपनी कथा):

  1. सोलह महाजनपदों में मगध आगे निकल गया — गंगा के उपजाऊ मैदान, इमारती लकड़ी और हाथियों वाले वन, निकटवर्ती पर्वतों से लौह अयस्क, तथा परिवहन के लिए गंगा और सोन नदियाँ।
  2. अजातशत्रु जैसे राजाओं ने इसे शक्ति का प्रमुख केंद्र बनाया; फिर महापद्म नंद ने अनेक छोटे राज्यों का एकीकरण किया और सिक्के जारी किए।
  3. लगभग 321 सा.सं.पू. में कौटिल्य के मार्गदर्शन में चंद्रगुप्त मौर्य ने नंदों को उखाड़ फेंका और उत्तरी मैदानों से दक्कन के पठार तक साम्राज्य फैलाया।
  4. अशोक (268–232 सा.सं.पू.) ने इसे सुदूर दक्षिण को छोड़कर लगभग संपूर्ण उपमहाद्वीप तक विस्तृत कर दिया।

उन्होंने क्या दिया:

स्तरसाम्राज्यों ने क्या बदला
राजनीतिकविशाल भूभाग पर राजनीतिक एकता, अधिकारियों का विस्तृत प्रशासन, तथा छोटे राज्यों के बीच युद्धों में कमी
आर्थिकसुरक्षित व्यापारिक मार्ग, सिक्कों का व्यापक प्रयोग, समान माप-तौल, कराधान, अकाल से बचाव हेतु अन्न-भंडार
सामाजिकसुनियोजित नगर, स्व-संचालित श्रेणियाँ, संदेश ले जाने वाले दूत, अग्नि से बचाव के लिए जल-पात्र
सांस्कृतिकस्तूप, चैत्य और विहार, चमकदार पॉलिश किए स्तंभ, टेराकोटा कला, बुद्ध के संदेश का विदेशों तक प्रसार, और ब्राह्मी लिपि — भारत की सभी क्षेत्रीय लिपियों की जननी
क्या आप जानते हैं? अशोक के सारनाथ स्तंभ-शीर्ष के चार सिंह आज भी प्रतिदिन आपके सामने आते हैं — वह शीर्ष भारत का राष्ट्रीय प्रतीक है और उसका धर्मचक्र हमारे राष्ट्रीय ध्वज के मध्य में अंकित है।
प्र3.
राज्य से साम्राज्य बनने में कौन-कौन से तत्व सहायक हुए?
उत्तर

छह तत्व, और मगध के पास ये सभी एक साथ थे।

तत्वयह कैसे सहायक हुआमगध का उदाहरण
उपजाऊ भूमि और अधिशेष अन्नअतिरिक्त अन्न सेना का पेट भरता है और लोगों को शिल्प के लिए मुक्त करता हैसंसाधनों से समृद्ध गंगा के मैदान; वर्ष में दो फसलें
लोहालोहे के हल से कृषि-उत्पादन बढ़ा; हल्के और तेज धार वाले शस्त्रों से सेना सशक्त हुईनिकट के पर्वतीय क्षेत्रों से लौह अयस्क एवं खनिज
वनदुर्ग, नौकाओं और गाड़ियों के लिए इमारती लकड़ी; युद्ध हेतु हाथीमगध के चारों ओर सघन वन
नदियाँ और व्यापारिक मार्गसस्ता परिवहन, अधिक व्यापार, शासक को अधिक करगंगा और सोन नदियाँ; उत्तरापथ
सुदृढ़ अर्थव्यवस्था और कोषसैनिकों का वेतन, अश्वों-हाथियों का पालन, सड़कों और नौकाओं का निर्माणमहापद्म नंद ने सिक्के जारी किए; व्यापार फल-फूल रहा था
योग्य नेतृत्व एवं कूटनीतिजो युद्ध नहीं दिला सकता, वह संधि और गठबंधन दिला देते हैंअजातशत्रु, फिर कौटिल्य के मार्गदर्शन में चंद्रगुप्त
ऐसा क्यों: विजय महँगी होती है। सैनिकों को भोजन, वस्त्र, शस्त्र और वेतन चाहिए; हाथियों-घोड़ों की देखभाल चाहिए; सड़कें और नौकाएँ बनानी पड़ती हैं। इसलिए वही राज्य साम्राज्य बन पाता है जिसके पास पहले से अधिशेष संसाधन और चलती हुई अर्थव्यवस्था हो। सैन्य शक्ति आर्थिक शक्ति का परिणाम है, उसका विकल्प नहीं।
प्र4.
छठी शताब्दी सा.सं.पू. से दूसरी शताब्दी सा.सं.पू. तक का जीवन कैसा था?
उत्तर

यह उत्तर भारत में गहन परिवर्तन का काल था — नए राज्य, नए नगर, नए सिक्के और विश्व के दो महान गुरु।

ग्रामीण जीवन: जनसंख्या का बड़ा भाग कृषि करता था। वर्ष में दो फसलें बोई जाती थीं, क्योंकि ग्रीष्म और शीत दोनों ऋतुओं में वर्षा होती थी; इसलिए अकाल कम पड़ते थे और अन्न-भंडार भरे रहते थे। मेगस्थनीज लिखता है कि समीप युद्ध होने पर भी किसान सुरक्षित रहते थे और कृषि बाधित नहीं होती थी।

नगरीय जीवन: पाटलिपुत्र शासन और वाणिज्य का प्रमुख केंद्र था — प्रासाद, सार्वजनिक भवन, सुनियोजित सड़कें और उन पर संकेतक, दो मंजिल तक ऊँचे लकड़ी के घर, तथा आग लगने की स्थिति के लिए नियमित अंतराल पर रखे जल-पात्र। संदेश एक स्थान से दूसरे स्थान तक दूत ले जाते थे। नगरों में लोहार, कुम्हार, बढ़ई, स्वर्णकार तथा अन्य शिल्पकार रहते थे, और उनके साथ अधिकारी एवं व्यापारी भी।

वेशभूषा: लोग सूती वस्त्र पहनते थे — नीचे का वस्त्र घुटनों से नीचे टखनों तक और ऊपरी वस्त्र कंधों पर डाला हुआ। कुछ लोग अलंकृत चमड़े के जूते पहनते थे, जिनके तलवे मोटे होते थे ताकि वे लंबे दिखें।

विचारों का संसार: बुद्ध और महावीर अजातशत्रु के समकालीन थे; नंदों के काल में पाणिनि ने 3,996 सूत्रों वाली अष्टाध्यायी की रचना की; और अशोक के समय तक प्राकृत में लिखे शिलालेख चट्टानों और स्तंभों से पढ़कर सुनाए जाने लगे थे।

स्वयं जाँचिए: पृष्ठ 86–87 पर इरा का वर्णन फिर पढ़िए — खाई और चलसेतु, लकड़ी के परकोटे और अट्टालिकाएँ, चीन के रेशम और दक्षिण के मसालों-रत्नों से भरा बाज़ार, गली के कलाबाज़। इनमें से हर विवरण की पुष्टि अध्याय में आगे पुरातत्व या ग्रीक विवरणों से होती है।
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