दूसरी बात सही है — पृथ्वी घूर्णन कर रही है और सूर्य केवल घूमता हुआ प्रतीत होता है।
क्रियाकलाप 12.1 का चक्रीय हिंडोला इसका निर्णय कर देता है। वामावर्त दिशा में घूमते हिंडोले पर बैठे हुए आपको प्रत्येक वृक्ष और भवन दक्षिणावर्त दिशा में घूमता प्रतीत होता है — बाएँ ओर से प्रकट होकर दाएँ ओर से ओझल होता हुआ। आप भली-भाँति जानते हैं कि वृक्ष स्थिर हैं, गतिमान आप हैं।
पृथ्वी पर हमारी स्थिति भी ऐसी ही है — केवल गति धीमी है और पैमाना बहुत बड़ा। पृथ्वी हमें लगभग 24 घंटे में पश्चिम से पूर्व की ओर एक चक्कर लगवा देती है, इसलिए सूर्य पूर्व में हमारी दृष्टि में आता है और पश्चिम में ओझल हो जाता है।
ऐसा क्यों होता है: गति सदैव किसी अन्य वस्तु के सापेक्ष आँकी जाती है। पृथ्वी का एकसमान घूर्णन हमें अनुभव नहीं होता, अतः हम गति का श्रेय सूर्य को दे देते हैं। इसे आभासी गति कहते हैं — चंद्रमा और तारे भी इसी कारण गतिमान प्रतीत होते हैं।
क्या आप जानते हैं? आर्यभट ने पाँचवीं शताब्दी में इसे नाव के उदाहरण से समझाया था — आगे बढ़ती नाव में बैठा व्यक्ति स्थिर वस्तुओं को पीछे की ओर जाता हुआ देखता है। उन्होंने एक पूर्ण घूर्णन का समय लगभग 23 घंटे 56 मिनट 4.1 सेकंड बताया था, जो आज के स्वीकृत मान के आश्चर्यजनक रूप से निकट है।