कुतूहल अध्याय 12 पाठ्य प्रश्न

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
आपने यह भी देखा होगा कि सूर्य पूर्व में उदित होता है और पश्चिम में अस्त होता है। क्या आपने कभी यह सोचा है कि ऐसा क्यों होता है?
उत्तर

ऐसा इसलिए होता है क्योंकि पृथ्वी पश्चिम से पूर्व की ओर घूर्णन करती है। अतः आकाश में स्थिर प्रत्येक पिंड विपरीत दिशा में — पूर्व से पश्चिम की ओर — गतिमान प्रतीत होता है।

विषुवत रेखा पर स्थित किसी स्थान की कल्पना कीजिए। पृथ्वी के पूर्व की ओर घूमने पर वह स्थान अंधकार वाले भाग से प्रकाशमान भाग में प्रवेश करता है और सूर्य पूर्वी क्षितिज पर चढ़ता हुआ प्रतीत होता है। लगभग बारह घंटे बाद वही स्थान प्रकाश से बाहर निकल जाता है और सूर्य पश्चिमी क्षितिज के नीचे चला जाता प्रतीत होता है।

सूर्य दिन रात सूर्यास्त सूर्योदय घूर्णन: पश्चिम → पूर्व
सूर्य का प्रकाश सदैव पृथ्वी की आधी सतह पर पड़ता है। पृथ्वी के पश्चिम से पूर्व की ओर घूमने पर कोई स्थान पहले प्रकाशित भाग में आता है (सूर्योदय) और बाद में उससे बाहर चला जाता है (सूर्यास्त)।
स्वयं जाँचिए: अँधेरे कमरे में टॉर्च के प्रकाश में एक गेंद पकड़िए और उसे ऊपर से देखते हुए धीरे-धीरे वामावर्त घुमाइए। गेंद पर बना बिंदु प्रकाश में आता है और फिर अंधकार में चला जाता है — एक घूर्णन, एक दिन और एक रात।
प्र2.
जब हम पृथ्वी से देखते हैं तो सूर्य पूर्व दिशा में प्रकट होता हुआ प्रतीत होता है। यह आकाश में पूर्व से पश्चिम की ओर गति करता है और पश्चिम में ओझल हो जाता है। क्या यह इंगित करता है कि सूर्य आकाश में गतिमान है? अथवा यह भी तो हो सकता है कि पृथ्वी घूर्णन कर रही हो और सूर्य केवल घूमता हुआ प्रतीत हो रहा हो?
उत्तर

दूसरी बात सही है — पृथ्वी घूर्णन कर रही है और सूर्य केवल घूमता हुआ प्रतीत होता है।

क्रियाकलाप 12.1 का चक्रीय हिंडोला इसका निर्णय कर देता है। वामावर्त दिशा में घूमते हिंडोले पर बैठे हुए आपको प्रत्येक वृक्ष और भवन दक्षिणावर्त दिशा में घूमता प्रतीत होता है — बाएँ ओर से प्रकट होकर दाएँ ओर से ओझल होता हुआ। आप भली-भाँति जानते हैं कि वृक्ष स्थिर हैं, गतिमान आप हैं।

पृथ्वी पर हमारी स्थिति भी ऐसी ही है — केवल गति धीमी है और पैमाना बहुत बड़ा। पृथ्वी हमें लगभग 24 घंटे में पश्चिम से पूर्व की ओर एक चक्कर लगवा देती है, इसलिए सूर्य पूर्व में हमारी दृष्टि में आता है और पश्चिम में ओझल हो जाता है।

ऐसा क्यों होता है: गति सदैव किसी अन्य वस्तु के सापेक्ष आँकी जाती है। पृथ्वी का एकसमान घूर्णन हमें अनुभव नहीं होता, अतः हम गति का श्रेय सूर्य को दे देते हैं। इसे आभासी गति कहते हैं — चंद्रमा और तारे भी इसी कारण गतिमान प्रतीत होते हैं।
क्या आप जानते हैं? आर्यभट ने पाँचवीं शताब्दी में इसे नाव के उदाहरण से समझाया था — आगे बढ़ती नाव में बैठा व्यक्ति स्थिर वस्तुओं को पीछे की ओर जाता हुआ देखता है। उन्होंने एक पूर्ण घूर्णन का समय लगभग 23 घंटे 56 मिनट 4.1 सेकंड बताया था, जो आज के स्वीकृत मान के आश्चर्यजनक रूप से निकट है।
क्या यह उपयोगी रहा? त्रुटि बताएँ